भूमिहीन नहीं थे हम पहले

अमित: ये कहानियाँ 1997 में पश्चिम चंपारण ज़िले में गाँव की मीटिंग में सुनीं थीं। स्कूल के कमरे में एक दिवसीय मीटिंग के लिये इकट्ठे

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हम गरीब कैसे बने – 3 : महंगी पड़ी नमला को जुवार!

कुछ सुनी, कुछ आँखों देखी – अस्सी – नब्बे के दशक में पश्चिम मध्य प्रदेश के आलीराजपुर ज़िले में खेडुत मजदूर चेतना संगठ में काम

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आजच्या परिस्थितीबद्दल माझं मतं मांडत आहे | आज के हालातों पर मेरे विचार

उमेश ढुमणे: आपल्या देशात संविधान/लोकशाही आहे। डॉ। बाबासाहेबांनी सांगितलं आहे। संविधान कितीही चांगलं असो पण संविधान चालवणारे लोकं जर वाईट असतील तर आज जी परिस्थिती

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कविता: मेरे देश की आँखें- अज्ञेय

नहीं, ये मेरे देश की आँखें नहीं हैंपुते गालों के ऊपरनकली भवों के नीचेछाया प्यार के छलावे बिछातीमुकुर से उठाई हुईमुस्कान मुस्कुरातीये आँखें –नहीं, ये

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मेरे शहर में भी एक मंदिर बना दो !

प्रशीक वानखेड़े: मेरे शहर में भी एक मंदिर बना दो, हर मुश्किल का समाधान वही हैं। नष्ट होती फसलों का,  किसानों के टूटते हौंसलों का,

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आखिर हम लोग ऐसे क्यों हैं?

कोरोना महामारी के समय भी कालाबाज़ारी! अमित: आजकल एक बात बहुत चल रही है सोशल मीडिया में कि हमारे देश के लोग ऐसे क्यों हैं

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