बरखा:

मैं बरखा हूँ, छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले के छोटे से गाँव से निकली लड़की। मेरा गाँव जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों से भरा-पूरा था। समय के साथ, जब अपनी दादी के साथ जलावन के लिए लकड़ी लाने जाती थी, तब पहली बार सुना, ‘फॉरेस्ट गार्ड आ जाएगा,’ ‘धीरे बोलो, चौकीदार घूम रहा होगा।’ तब सोचा कि गाँव हमारा, नदी हमारे गाँव की है, वो पहाड़ में हमारे गाँव की देवी है, तो यहाँ के जंगलों के लिए चौकीदार क्यों? फिर स्कूल में पर्यावरण के बारे में पढ़ी, तब पता चला कि जंगल तो ऑक्सीजन के लिए ज़रूरी हैं। घर में सुना था जंगल से तो चार-चिरोंजी, तेंदू, महुआ लाते हैं। फिर पर्यावरण में इसका महत्व समझाया गया, तो पता चला कि पृथ्वी पर जीवन ऑक्सीजन से है, जिसके लिए पेड़ चाहिए। बाद में पता चला कि उन पेड़ों की देखरेख के लिए वन विभाग है।

जब बड़ी हुई, घर में पापा के मुँह से सुना कि लोगों का जीवन जंगल से जुड़ा हुआ है पर कभी ज़्यादा ध्यान गया नहीं। धीरे-धीरे गाँव का जंगल खत्म हुआ। गाँव से पेड़ों को काटकर निकाल दिया गया। पूछने पर बताया कि वन विभाग का है। और आज मेरे गाँव में शाम होते ही जानवर बाहर आ जाते हैं। भालू और अन्य जानवरों का खतरा गाँव में बढ़ गया। जंगल अब खत्म ही हो गया। 

जब कॉलेज गई, सभी से विकास शब्द सुना। महसूस किया कि मैं जिस जगह से आई हूँ उसे ही पिछड़ा हुआ मानते हैं और शहर जो हैं, वो विकसित होते हैं। पर फिर भी विकास कभी समझ में नहीं आया। अच्छे स्कूल और कॉलेज जहाँ होते हैं, वहीं तो शहर होते हैं। जहाँ बिजली और पानी की सुविधा होती है, वहीं तो अच्छी जगह है, जहाँ के लोग सक्षम होते हैं। काफी समय लगा मुझे अपने आप को पिछड़ा हुआ मानने में, फिर मैं भी उनके जैसे बनने लगी। खेतों की फोटो लेने से सफर शुरू हुआ था, अब हँसी आती है कि ये सब भी किया है मैंने। फिर जब मैंने उन्हीं शहरी लोगों से सवाल पूछना शुरू किया कि ये सुविधा गाँव में भी तो हो सकती है, तो जवाब मिला, तो फिर वो गाँव थोड़ी हुआ, शहर ही बन जाएगा। मतलब पिछड़ापन ही गाँव की पहचान बन गया है, और वहाँ के लोगों को ही पिछड़ा या गँवार कहते हैं, ये वहीं पता चला।

जब मैंने काम करना शुरू किया उन्हीं आदिवासी परिवारों के बीच तो पता चला कि ये जंगल संसाधन नहीं, जीवन हैं और उनके जीवन का अभिन्न अंग हैं। ये भी पता चला कि वहाँ के आदिवासी समुदाय के बच्चे भी वन विभाग को जानते हैं। इसका आश्चर्य जीवन से कभी गया ही नहीं।

फिर कुछ कानूनी भाषा सीखी। लोगों के मुँह से ही वन अधिकार कानून और अधिकार जैसे कुछ शब्द सुने। फिर आँखों के सामने यह भी देखा है कि ये गाँव खाली करवाया जाएगा, क्योंकि यहाँ तो जानवर रहेंगे। यह सब बातों को गहराई से समझती, उससे पहले से ही जनसैलाब के साथ रैलियाँ देखीं, लोगों का जंगल के प्रति लगाव देखा। फिर सोच में भी पड़ गई कि वन विभाग के साथ लड़ाई क्यों है? पर जब वन विभाग के अधिकारीयों से मिली तो समझ आया की विभाग तो वनों में बसे लोगों को अतिक्रमणकारी के रूप में देखता है जिन्हें केवल खेती बढ़ाने के लिए जंगल खत्म करने से मतलब है। फिर वही सवाल विज्ञान का आया कि जंगल स्वयं अपने आप को जीवित रख सकता है, तो फिर ये विभाग की ज़रूरत ही क्यों है? और जब हसदेव और बस्तर के जंगल काटे जाते हैं, तो सड़कों पर केवल आदिवासी ही क्यों हैं?

यह भी बहुत सुना है कि कुछ आदिवासी लोगों ने दिसंबर 2005 के बाद जंगल काट दिए। लालच में आकर फिर उन्हें हटाया गया। उन्हें तो खेती करनी थी, जिससे उनका घर चलता, उनकी आर्थिक स्थिति सुधरती, तो क्या इससे उनका विकास नहीं होता? क्योंकि अब तक तो विकास के नाम पर जंगल काटना सुना और देखा था। मैं यह सवाल कभी पूछ नहीं पाई कि ये विकास किसका होगा और किसके लिए होगा? अगर वह उन आदिवासियों के लिए होगा, तो क्या उन्हें उनके ही घर से निकालकर उनका विकास किया जा सकता है? और क्या उन्हें ऐसा विकास चाहिए भी है या नहीं?

इसी तरह के कई सवालों के जवाब खोजते हुए आज मुझे दो साल हो गए हैं। सवाल बढ़ते जा रहे हैं और सवाल का जवाब एक अंधा विकास (किसका? पता नहीं!)

मैं ऐसी ही बातचीतों को सीखने-समझने के लिए एक शिविर में जुड़ी हूँ जिसका नाम सामाजिक परिवर्तन शाला है (एस.एस.सी.)। ये मेरा एस.एस.सी. (SSC) का दूसरा शिविर है और इन्हीं शिविरों ने मुझे एक जगह दी है, जहाँ मुझे अलग-अलग बातों को सोचने का मौका मिला है और इसी अनुभव में मेरे सवाल बढ़ते जा रहे हैं।

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