हेमा जोशी:

नैनीताल ज़िले के भीमताल ब्लॉक में स्थित हेड़िया गाँव में लगभग 70 परिवार रहते हैं, जिनमें से अधिकांश लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन कर रहे हैं। एक समय था जब इस गाँव में खेती और पशुपालन प्रमुख आजीविका के साधन थे।

कुछ समय पहले तक गाँव की सभी महिलाएँ समूह बनाकर जंगल जाती थीं। वे अपने पशुओं के लिए चारा और लकड़ी लेकर लौटती थीं। पशुपालन गाँव की आजीविका का एक महत्वपूर्ण आधार था। क्यूंकी भीमताल में विकास भवन, ब्लॉक कार्यालय और अन्य संस्थानों के कारण दूध की अच्छी कीमत मिल जाती थी, जिससे लोगों की आय में कुछ सहारा मिल जाता।

लेकिन बदलते समय के साथ गाँव की तस्वीर बदलने लगी। अनियमित मानसून, बंदरों का बढ़ता आतंक और जलवायु परिवर्तन का असर खेती पर साफ दिखाई देने लगा। खेत सूखने लगे हैं और थोड़ी-बहुत मेहनत करके किसान अगर फसल उगाने की कोशिश भी करता है, तो उसे बंदर नष्ट कर देते हैं, जिस कारण धीरे-धीरे खेत बंजर छोड़ दिए गए हैं। दूसरी ओर, पर्यटन के बढ़ते दबाव के कारण खेती योग्य भूमि का एक बड़ा हिस्सा बाहरी लोगों द्वारा होटल और रिसॉर्ट बनाने के लिए खरीद लिया गया। आज गाँव के लोगों के पास खेती के अवसर कम होते जा रहे हैं और पशुपालन ही आजीविका का मुख्य साधन बचा है।

मगर पिछले कुछ वर्षों में जंगली जानवरों, विशेषकर बाघ के हमलों का खतरा लगातार बढ़ा है। चारा लेने जंगल जाने वाली महिलाओं के सिर पर हर समय मौत का साया मंडराता रहता है। हर दूसरे महीने किसी न किसी महिला को बाघ का शिकार बनना पड़ रहा है। 

इस गंभीर समस्या को लेकर ग्रामीणों ने कई बार वन विभाग के सामने धरना-प्रदर्शन किए और अपनी चिंता जताई, लेकिन अब तक कोई ठोस समाधान नहीं निकल पाया है। लोगों का कहना है कि जंगल जाना उनकी मजबूरी है, क्योंकि पशुओं के लिए चारा लाना और परिवार का पेट पालना उनके लिए आवश्यक है। ऐसे में वे हर दिन अपनी जान जोखिम में डालकर जंगल का रुख करते हैं लेकिन अब लोग जंगल जाने से डरने लगे हैं।

बढ़ते खतरे और घटती आय के कारण अब कई परिवार पशुपालन छोड़ने लगे हैं। आज गाँव की महिलाएँ आसपास के रिसॉर्ट, होटलों और घरों में मजदूरी करने को मजबूर हैं। पूरे दिन की मेहनत के बदले उन्हें लगभग 200 रुपये की मजदूरी मिलती है, जो परिवार की जरूरतों के सामने बहुत कम है।

महिलाओं की स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण है। एक ओर उन्हें घर से बाहर जाकर मज़दूरी करनी पड़ती है, तो दूसरी ओर घर लौटने के बाद बच्चों की देखभाल, खाना बनाना और अन्य घरेलू ज़िम्मेदारियाँ भी निभानी होती हैं। इसके अलावा काम के दौरान उनकी सुरक्षा भी एक बड़ा सवाल बनी हुई है। महिला समूहों और सामाजिक संगठनों की बैठकों में कई बार ऐसे मामले सामने आए हैं, जहाँ महिलाओं को शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है। लेकिन आर्थिक मजबूरियाँ उन्हें इन कठिन परिस्थितियों में भी काम जारी रखने के लिए विवश करती हैं।

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