युवानिया डेस्क :

यह लेख लोकमत पत्रिका में से पुनः प्रकाशित हुआ है –

माझे बालपण खेड्यात गेले. घरची परिस्थिती बेताचीच. वडील विणकाम करून लुगडं विणायचे. आई घरकाम करून कांड्या भरायची. मी शाळा करून त्यांच्या कामात मदत करीत होतो. शेतीची आणि मजुरीचीही कामे करीत होतो. मालकाचा विश्वास संपादन करणे, प्रामाणिकपणा, खरे बोलणे हा आई- वडिलांनी दिलेला संदेश कायम लक्षात ठेवला. ते पहिले गुरु.

मालक नावाचा माणूस फायदा, नफा, लाभ पाहत असतो. प्रसंगी तो शिव्या देतो, मारझोड करतो. यातून शोषणाचे प्रकार कळले. शोषणाची चीड निर्माण झाली. कष्टकऱ्यांचे प्रश्न, बालकामगार, बांधकाम मजूर, ठिय्या मजूर, शेतमजूर, वनमजूर, मोलकरीण यांचे प्रश्न आणि पिळवणूक दिसली. श्रमाची चोरी दिसली. शोषण आणि विषमता यांनी मला लढायला बाध्य केले. जन्मजात दारिद्र्य, या लढ्यातील अनुभव आणि भेटलेली भोळीभाबडी पण सच्ची माणसं माझे गुरू झाले. तेच लढ्याचा आधार झाले.

सभोवताल विणकरांचे मोर्चे, श्रमिकांची, महिलांची आंदोलने यासह अनेक आंदोलने सुरू होती. फार काही कळत नव्हतं तरी उत्सुकता स्वस्थ बसू देत नव्हती. शुभ्र पोशाखात भाषणं ठोकणाऱ्या नेत्यांचे बोलणे जिव्हारी लागत होते. यातूनच मजुरांचे संघटन, ठिय्या मजूर, अगरबत्ती कामगार, बालमजूर यांना संघटित करत गेलो. झोपडपट्टीवासीयांसाठी रस्ते, वीज, पाणी, जमिनीचे पट्टे आदी नागरी सुविधांसाठी आंदोलने करीत होतो. युवक क्रांती दलाशीही जोडला गेलो. ज्येष्ठ सामाजिक कार्यकर्त्या डॉ. रूपा कुलकर्णी विदर्भ मोलकरीण संघटनेच्या अध्यक्ष होत्या. मी सरचिटणीस होतो. कष्ट मोलकरणींच्या हक्कासाठी खूप आंदोलने केली. शेवटी त्यांच्यासाठी कायदा बनला. हे फार मोठे यश होते. भर पावसात विजयी रॅली निघाली. महिलांच्या लढ्यात मी एकटा पुरुष होतो. याच वेळी जल- जमीन जंगलाचे लढे ऐकत होतो. नर्मदेचा लढा गाजत होता. गोसीखुर्द धरणग्रस्ताच्या समस्या कानी पडत होत्या. गोसेखुर्दला पोहचलो. तिथल्या गावांना भेटी दिल्या. धरणग्रस्तांच्या लढ्यात रमलो. १९९१ चा तो काळ. २०१६ उजाडेपर्यंत दोन घास जेवायला सवड नव्हती. सभा, मेळावे, बैठका, मोर्चे, नदीत मानवी साखळी, नदीत डोंगा मोर्चा, चूल्हा जलाओ मोर्चा, जनावरांचा मोर्चा, आसूड मोर्चा, ताटवाटी, घाटी मोर्चा, जेलभरो, मुंडन आंदोलन अशी आंदोलने केली.

डॉ. बाबा आढाव, मेधा पाटकर आदींसोबत सभा संमेलने केली. फुले वाडा ते मंत्रालय पदयात्रा केली. नागपूर, मुंबई, दिल्लीत मोर्चे झाले. दीर्घ लढा द्यावा लागला. तेव्हा कुठे धरणग्रस्तांना जमिनीचा मोबदला मिळाला. संपूर्ण तारुण्य या आंदोलनात गेलं. बावनथडी, दिंदोड्या धरणग्रस्तांना मदत मिळवून दिली. लढ्याची वैचारिक बैठक आहे बुद्ध – फुले आंबेडकरांचा विचार. लोकशाही समाजवाद, संविधान मूल्य यावर निष्ठा.

विलास भोंगाडे: गोसेखुर्द प्रकल्पग्रस्त संघर्ष समिती व इतर लढ्यांचे कार्यकर्ते (गोसेखुर्द प्रकल्प पीड़ित संघर्ष समिति एवं अन्य आंदोलनों के कार्यकर्ता)

हिंदी अनुवाद –

गरीबी, परिस्थिति और आम आदमी ही मेरे गुरु बने

मेरा बचपन गाँव में बीता। घर की आर्थिक स्थिति सामान्य ही थी। पिता बुनाई करके साड़ी बुना करते थे। माँ घर-घर जाकर काम करके लकड़ियाँ भरती थी। मैं स्कूल जाने के बाद उनके काम में मदद करता था। खेती और मज़दूरी के भी काम करता था। मालिक का विश्वास जीतना, ईमानदारी और सच बोलना—ये माँ-बाप द्वारा दिए गए जीवन के संदेश थे, जिन्हें मैंने हमेशा याद रखा। वे ही मेरे पहले गुरु थे।

मालिक नामक व्यक्ति हमेशा फायदा, मुनाफा और लाभ देखता है। कभी-कभी वह गाली देता है, मारपीट भी करता है। इस सब से शोषण के प्रकार समझ में आए। शोषण के प्रति एक गहरी चिढ़ पैदा हुई। मेहनतकशों की समस्याएं, बाल मज़दूर, निर्माण मज़दूर, ठेले पर काम करने वाले मज़दूर, खेतिहर मज़दूर, वन मज़दूर, कामवाली बाई—इन सभी की समस्याएं और शोषण दिखाई दिया। मेहनत की चोरी साफ नजर आई। शोषण और असमानता ने मुझे लड़ने पर मजबूर किया। जन्मजात गरीबी, इस संघर्ष के अनुभव और जो भोले-भाले लेकिन सच्चे लोग मिले, वे मेरे गुरु बने। वे ही मेरे संघर्ष की ताकत बने।

चारों ओर बुनकरों के मोर्चे, मज़दूरों और महिलाओं के आंदोलन चल रहे थे। ज़्यादा कुछ समझ नहीं आता था, फिर भी एक उत्सुकता थी जो चैन से बैठने नहीं देती थी। सफेद कपड़े पहनकर भाषण देने वाले नेताओं की बातें दिल को छू जाती थीं। इन्हीं बातों से प्रेरणा लेकर हमने मज़दूरों का संगठन बनाया—ठेले पर काम करने वाले मज़दूर, अगरबत्ती मज़दूर, बाल मज़दूर—इन सभी को संगठित किया। झुग्गी बस्तियों के लिए सड़क, बिजली, पानी, ज़मीन के पट्टे आदि नागरिक सुविधाओं के लिए आंदोलन किए। ‘युवक क्रांति दल’ से भी जुड़ाव हुआ।

वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. रूपा कुलकर्णी उस समय ‘विदर्भ मोलकरीण संघटना’ की अध्यक्ष थीं और मैं महासचिव था। मेहनतकश घरेलू महिलाओं के अधिकारों के लिए कई आंदोलन किए। अंततः उनके लिए एक कानून बना, जो बहुत बड़ी उपलब्धि थी। तेज़ बारिश के बीच विजयी रैली निकाली गई। उस महिला आंदोलन में मैं अकेला पुरुष था। उसी समय “जल-जमीन-जंगल” के आंदोलनों की चर्चा सुन रहा था। नर्मदा बचाओ आंदोलन चर्चा में था। गोसेखुर्द बांध पीड़ितों की समस्याएं सुनाई दे रही थीं। गोसेखुर्द पहुँचा, वहाँ के गाँवों का दौरा किया और धरणग्रस्त (बांध पीड़ित) आंदोलन में रम गया। वह समय था 1991 का।

2016 तक तो दो वक़्त की रोटी के लिए भी समय नहीं था। सभाएं, मेलावे (ग्राम सभाएं), बैठकें, मोर्चे, नदी में मानव श्रृंखला, नदी में नौका मोर्चा, चूल्हा जलाओ मोर्चा, जानवरों का मोर्चा, कोड़े का मोर्चा, थाली-चम्मच मोर्चा, घाटी मोर्चा, जेल भरो आंदोलन, मुंडन आंदोलन—ऐसे अनगिनत आंदोलनों में भाग लिया।

डॉ. बाबा आढाव, मेधा पाटकर आदि के साथ सभाएं कीं, सम्मेलन किए। फुले वाडा से मंत्रालय तक पदयात्रा की। नागपुर, मुंबई, दिल्ली में मोर्चे निकाले। लंबा संघर्ष करना पड़ा। तब कहीं जाकर धरणग्रस्तों को ज़मीन का मुआवज़ा मिला। पूरा यौवन इसी आंदोलन में बीत गया। बावनथड़ी और दिंदोड्या बांध पीड़ितों को मदद दिलाई।

मेरे संघर्ष की वैचारिक नींव बुद्ध, फुले और आंबेडकर के विचार हैं। लोकतांत्रिक समाजवाद और संविधान के मूल्य ही मेरी निष्ठा हैं।

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