जय श्रेया:

1983 था, वाराणसी का मेहदीगंज गाँव।
एक दलित बुनकर परिवार में मेरा जन्म हुआ।

घर में करघा गूँजता था, धागे खिंचते थे,
साड़ियाँ सजती थीं, यही दुनिया, यही भविष्य।
बस्ती मानती थी, पढ़ाई की दरकार नहीं,
जो चाहिए जीने को, करघे से निकल आता है।

उस बस्ती से स्कूल जाने वाला मैं पहला था।
स्कूल ने नाम नहीं, जाति पूछी।
दलित प्रमाण-पत्र बना, लंबे संघर्ष के बाद,
पर वह काग़ज़ सम्मान की गारंटी नहीं था।

अध्यापक हो या बच्चे
सब नाम से नहीं, जाति से पुकारते।
शादियों में अलग टाट-पट्टी,
साथ खेले दोस्तों के घर बर्तन छूने की मनाही।
पिता का दर्द मेरे भीतर धीरे-धीरे उतरता गया।

मैं स्कूल से भागने लगा,
तभी एक नाम सुना, नंदलाल मास्टर।
बेनीपुर उसरा पट्टी में
बुनाई में उलझे बच्चों को पढ़ाते थे वे।
मैं गया, मन को सुकून मिला,
देखते-देखते सबसे चर्चित छात्र बन गया।

वहाँ भी जाति से परेशान किया गया,
पर इस बार मैं भागा नहीं।
मैंने सोचा, समस्या से नहीं, समाज से लड़ना है,
और समाज को जागरूक करना है।

दस गाँवों में शिक्षण केंद्र बने,
मेरी एक पहचान बनी।
पर फिर एक समझ जागी,
केवल शिक्षा काफ़ी नहीं है।

गाँव-गाँव लोक समिति बनाई, महिलाएँ जुड़ीं।
उनका दर्द मेरे दर्द से अलग नहीं था,
एक तो महिला, ऊपर से दलित,
दोहरी चुनौती, दोहरी पीड़ा।

जन चेतना कला मंच बना, नुक्कड़ नाटक चले,
स्वयं सहायता समूह बने, सिलाई केंद्र खुले।
तीस गाँवों में लोक समिति एक मज़बूत संगठन बन गई।

2003 में मेहदीगंज में कोका-कोला प्लांट के सामने
बोतलें टूटीं, और एक बड़ा जन आंदोलन अंगड़ाई लेने लगा।
जेल, पदयात्राएँ, धरना, भूख हड़ताल,
मेधा पाटकर और देशभर के नेता आंदोलन की आँच में जुड़े।

समय बीता, आंदोलन धीमा पड़ा।
2008 में मनरेगा आया,
हमने लोगों को जागरूक किया,
और एक नाम तय हुआ, मनरेगा मज़दूर यूनियन।
जॉब कार्ड से मज़दूरी तक, संघर्ष का रास्ता।

2014 के बाद हमने तय किया,
एक समतामूलक समाज,
जहाँ जाति का बोझ न हो, जहाँ लिंग की बेड़ी न हो।

आज हर जाति के लोग सम्मान से बुलाते हैं,
मेरी बस्ती के लोग भी अब एक पंक्ति में बैठते हैं।

पर एक सच्चाई और उभरी,
महिलाओं के पास समय नहीं,
समझ विकसित करने का अवसर नहीं,
भेदभाव उनके जीवन की साँस बन चुका है।

दिसंबर 2018 में समता किशोरी युवा मंच बना,
60 गाँव, 2000 किशोरियाँ।
शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार, संविधान,
संघर्ष की तैयारी।

आज मनरेगा मज़दूर यूनियन
60 गाँवों में, 5000 मज़दूरों के साथ खड़ी है,
ज़्यादातर महिलाएँ।
स्थानीय नेतृत्व हमारी प्राथमिकता,
संगठन हमारा विश्वास,
रिश्ते और भरोसा हमारी ताक़त।

श्रम क़ानून बदले, मनरेगा कमज़ोर हुआ,
महिलाओं को फिर चारदीवारी में क़ैद करने की कोशिशें हुईं,
पर एक मज़बूत टीम तक़दीर बदल सकती है।
आज मेरी टीम मेरे सपनों को अपना सपना मानती है।

हम जानते हैं,
बदलाव जन आंदोलनों की कोख से जन्मेगा।
हमें विश्वास है,
एक दिन ग़रीब, मेहनतकश,
मज़दूर और महिलाओं का राज आएगा।

इसी विश्वास के साथ
हम लोगों को संगठित कर रहे हैं,
व्यवस्था परिवर्तन के लिए।

Author

  • श्रेया, बिहार से हैं और वर्तमान में दिल्ली में एक संस्था के साथ काम कर रही हैं। उन्हें फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी और लिखने का शौख है। वह अपनी रचनाओं और प्रलेखन में अपने अनुभवों और अवलोकन को सरल तरीके से दर्शाना पसंद करती हैं।

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One response to “करघे से क़लम तक, टाट-पट्टी से आंदोलन तक (सुरेश राठौर की कहानी)”

  1. Amit Bhatnagar Avatar
    Amit Bhatnagar

    बहुत अच्छा लिखा है। बहुत आसानी से पढ़ा गया और सुरेश जी के जीवन संघर्ष का मर्म समझ पाया।

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