अफ़ाक:

कुछ दिन पहले एक सुबह पहाड़ों में बस से यात्रा कर रहा था। पहाड़ों में बस से यात्रा करने वाले लोग स्थानीय ही होते हैं। जो अपना बहुत-सा सामान और रोज़मर्रा का सामान साथ लेकर चलते हैं। मेरे साथ एक बुज़ुर्ग महिला लगभग एक घंटे बस में बैठकर यात्रा कर रही थी। मैंने देखा कि यात्रा करते हुए उसने तीन-चार बार अपने पानदान से पान पूरी शिद्दत से लगाया और पूरे चाव से चबर-चबर खाते हुए सहयात्रियों से बतियाती रही। उनको देखते हुए मुझे अपनी दादी की याद आ गई। वह भी पानदान रखती थी। हमारी दादी क्या, लगभग सभी घरों में पानदान होता था।

दादी के वक्त बैंक खाते नहीं हुआ करते थे। तो वह अपना पैसा रखती कहाँ थीं? तो हमारी दादी के पास एक बक्सा होता था, उसी में वह अपने रुपये-पैसे रखती थीं। लेकिन रोज़मर्रा में पैसों के उपयोग के लिए उनका अपना पानदान ही उनका बैंक था। जिसको वह जल्दी किसी को छूने नहीं देती थीं। बिना उनकी मर्ज़ी के कोई उनका पानदान छूता नहीं था। मैंने जब होश संभाला, तो दादी ज़्यादा बूढ़ी हो गई थीं। घर-बाहर वह कोई काम तो करती नहीं थीं, लेकिन उनके पास पैसा होता था और दादी के पास बातें बहुत थीं। उन्होंने बहुत काम किया था। खेती का काम पूरा जानती थीं। उनके बारे में बताती थीं। कहाँ क्या-क्या खेती होती थी, कितनी दूर से बोझा ढोकर हम लोग घर लाते थे। हमारे पास बहुत खेत था। पर मैंने या मेरी उम्र के किसी बच्चे ने हमारे घर में खेती होते हुए नहीं देखा था। हमारे पास दादी और मुन्नी बुआ द्वारा जो खेती-बाड़ी से संबंधित ज्ञान आया, वह इनका ही बताया हुआ था। खेती कम या खत्म होने के साथ ही दादी बताती थीं कि मैंने खुद भैंस पाली और दूध बेचने का काम किया। सब काम अपने बच्चों के साथ मिलकर करती थी। इस काम में दादा का कोई सहयोग नहीं मिलता था। दादा हमारे रेलवे में रेल इंजन बनाने का काम करते थे। वह ज़्यादा बाहर ही रहकर काम किए। दादी ने बताया कि बँटवारे के बाद जब रामनगर बसा, तो यहाँ दूध का काफी काम बढ़ गया और स्टेशन पास होने से भी दूध वहाँ भी जाता था। आगे दादी बताती ही रहती थीं कि उन्होंने क्या-क्या किया। घर के बाहर उन्होंने अपने पाँच बेटों के लिए पाँच दुकान बनाई थीं, जो अपनी मेहनत से बनाई थीं। हर बेटे के लिए एक दुकान थी। जिसको बनाने में रामनगर के सिंधी व्यापारी भागुमल थे, जिनके यहाँ दूध दिया जाता था। उनकी थोड़ी कर्ज़दार भी हो गई थीं। पर अपने काम से उनका पैसा धीरे-धीरे करके पूरा दे दिया।

यहाँ तक की जानकारी दादी द्वारा दी गई थी। न हमने अपने घर में खेती होते हुए देखा, न पशु पालते हुए देखा। इनके बारे में उनके पास बहुत बातें थीं। दादी यह भी बोलती थीं कि आजकल के मेहरारू का कुछु आवत नाही। ना खाना बनावे जाने, ना बच्चा पलब, कौनो सहूर नाही ना। यह बात वह अपनी बहुओं को बोलती थीं। वही बातें आज दादी की बहुएँ बिना बोले ही बोल रही हैं। उनके पास आजकल की बहुओं को बोलने के लिए जो ताकत चाहिए थी, वह थोड़ा कमज़ोर पड़ गई है। बोलना तो यह भी चाहती हैं, पर यह सिर्फ घर में काम करने वाली पहली पीढ़ी की बहुएँ हैं। दादी होते हुए इनके पास जितनी पावर होनी चाहिए, उसमें कमी है। यह कमी अपना खुद का कुछ काम न होना। इनके पास बैंक खाता है, पर खाते में खाक ही है।

अभी हम दादी की तरफ लौट चलते हैं। हमारी दादी के बहुत नाती, नतनी, पोता, पोती थे। शायद वह सभी के नाम भी जानती नहीं रही होंगी। ऐसा अभी की दादियों को देखकर लगता है। दो-चार बच्चों में ही गुस्सा करने लगती हैं, परेशान होने लगती हैं। गर्मियों की छुट्टी में हम 20-25 बच्चे लगभग एक-डेढ़ महीना साथ रहते थे। दिन भर मैदान में, छत पर, घर में खेलते, लड़ते और रोते रहते थे। दादी भी छत पर दौड़ने से बहुत चिल्लाती थीं। कहती थीं, “ई सब हमारा छतवा गिराई देहियें। नीचे उतरो, नीचे उतरो।” दादी को हमेशा लगता था, छत पर बच्चों के दौड़ने से छत गिर जाएगी। ज़्यादा बच्चे दादी के पास नहीं आते थे, पर मुझे बहुत ज़्यादा प्यार करती थीं। जब हम दादी के पास पहुँचते, तो ओरहना देब शुरू कर देत रहीं। कहें, “उन लोगन के साथ खेलत रहो, तुका छत पर ऊही लोग लाई जात हिं।” मेरी गलती को वह गलती ही नहीं मानती थीं। मैंने कुछ किया, तो किसी और पर वह बात डाल देती थीं। पानदान से अपना पान बनातीं और पानदान की डिबिया के नीचे जो रुपया-पैसा रखती थीं, उससे निकालकर हमको पैसा ज़रूर देती थीं।

दादी हमेशा पानदान को अपने साथ ही रखती थीं। मैं उसे बिना पूछे भी पानदान खोल सकता था। उनको पता भी चल जाए कि मैंने खोला है, तो भी कभी कुछ नहीं बोलती थीं। पानदान में जो रुपया था, वही उनकी पूँजी और बैंक था। मैंने कभी दादी को बहुत परेशान नहीं देखा। उनके पास अब उनके खेत नहीं बचे थे, उनके पास उनके जानवर नहीं थे। पानदानी बैंक में भी बहुत पैसा नहीं था। पर जितना मेरे जैसे बच्चे को ज़रूरत होती, उतना हमेशा मिल जाता था। इस पानदान बैंक का प्रयोग किसी एटीएम, पिन कोड से नहीं, प्यार से ही इस बैंक के ख़ज़ाने का प्रयोग हो सकता था।

Author

  • अफ़ाक, फैज़ाबाद उत्तर प्रदेश से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं। वह अवध पीपुल्स फोरम के साथ जुड़कर युवाओं के साथ उनके हक़-अधिकारों, आकांक्षाओ, और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर काम करते हैं।

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