अमित: 

हमारी गौकरण भाई से पहली मुलाकात छत्तीसगढ़ के तिल्दा स्थित एकता परिषद के सेंटर पर हुई थी। हम लोग अक्सर वहाँ सामाजिक परिवर्तन शाला के शिविर करने जाते थे। उस जगह का खाना इतना स्वादिष्ट होता था कि हर साल कोशिश रहती थी कि कम से कम एक बार वहाँ जरूर जाया जाए।

इन्हीं शिविरों में एक बार गौकरण भाई को आतिथ्य और प्रबंधन की जिम्मेदारी मिली। उसी दौरान उनसे पहली बार परिचय हुआ। शुरुआती छाप यही रही कि वे बेहद शांत स्वभाव के इंसान थे। हम लोगों की अनगिनत छोटी-बड़ी समस्याओं का समाधान वे बिना किसी झुंझलाहट के करते और हमारे रहने-सहूलियत का ध्यान रखते। बातचीत में पता चला कि वे एकता परिषद के बहुत पुराने कार्यकर्ता थे और अस्सी के दशक से ही आदिवासियों और गरीबों के हक की लड़ाई में सक्रिय थे।

गौकरण भाई की सबसे बड़ी विशेषता थी—नाटक और संगीत। एकता परिषद की हर रैली में नए गीत गाना, नारे गढ़ना और नुक्कड़ नाटक करना उनकी जिम्मेदारी होती थी। वे इस काम में माहिर थे। सामाजिक मुद्दों पर उन्होंने अनगिनत नाटक लिखे, प्रस्तुत किए और गीत गढ़े। उनकी प्रस्तुति इतनी सजीव होती कि लोग देर तक प्रभावित रहते।

दूसरी बार जब हम एक और शिविर में गए, तो यह तय किया गया कि उनके के अनुभव का लाभ बच्चों को भी मिले। पाँच दिनों तक हर रोज़ एक नया समूह उनके साथ दो घंटे काम करता और शाम को एक छोटा नाटक प्रस्तुत करता। यह अद्भुत था कि इतनी कम तैयारी के बावजूद वे बच्चों से इतनी दमदार प्रस्तुति करवा देते थे—डायलॉग, अभिनय और अभिव्यक्ति सब कुछ।

मुझे याद है, एक शिविर में चर्चा का विषय था राजवंशों का गठन—कैसे कुछ वर्ग मजदूर और सेवा वर्ग बन गए, और कुछ वर्ग ऊँचे दर्जे पर पहुँच गए। उन्होनें ने इस पर बहुत सुंदर नाटक बनवाया। इसके अलावा उन्होंने एक एकल अभिनय भी किया था, जिसमें बिना बोले केवल हावभाव और देह-भाषा से गहरा चित्रण किया। प्रस्तुति के अंत में उनका चेहरा पसीने से लथपथ था, लेकिन दर्शक स्तब्ध थे। उन्होंने हमें “जय जगत” गीत भी सिखाया, जो एकता परिषद की प्रार्थना थी।

बाद में, जब वे सेवा से निवृत्त हुए, तो हमने उन्हें कई बार आधारशिला के साथ काम करने के लिए आमंत्रित किया। हमारी इच्छा थी कि वे हमारे सामाजिक विषयों पर भी नाटक तैयार करने में मदद करें। लेकिन उन्होंने विनम्रता से कहा—“अब खेती-बाड़ी और परिवार ही मेरी दुनिया है।”

हमें गहरा दुख हुआ जब अचानक खबर मिली कि वे अब हमारे बीच नहीं रहे। शायद हृदयाघात या ब्लड प्रेशर की वजह से उनका निधन हुआ। समाज ने एक सच्चा कलाकार और संवेदनशील कार्यकर्ता खो दिया—वह भी ऐसा कलाकार, जिसने लगभग चालीस वर्षों तक लोगों को जागरूक करने और चेतना जगाने के लिए अपनी कला को समर्पित कर दिया।

गौकरण भाई जैसे लोग अक्सर बड़े मंचों पर नहीं आते। वे जंगल में नाचते मोर की तरह होते हैं—जिन्हें देखने और सराहने वाले कम होते हैं। लेकिन उनकी प्रतिभा किसी बड़े पुरस्कार या सम्मान की मोहताज नहीं थी। दिल्ली जैसे शहरों में छोटे-छोटे कार्यों पर ख्याति बटोरने वालों को देख कर मन में यह कसक जरूर उठती है कि गोकर्ण भाई जैसे विलक्षण लोग उतनी पहचान क्यों नहीं पा सके।

हमारा दायित्व है कि ऐसे लोगों की स्मृति को संरक्षित करें, उनके काम को आगे बढ़ाएँ और उन्हें समाज के सामने लाएँ। अगले अंकों में हम कोशिश करेंगे कि गौकरण भाई के जीवन और कार्यों पर विस्तार से जानकारी लेकर उनका जीवन-चित्र प्रस्तुत किया जाए।

गौकरण भाई की कुछ खूबसूरत झलकियाँ:

गौकरण भाई द्वारा बनाई गयी प्रस्तुति को आप इस लिंक पर क्लिक कर देख सकते हैं :

Author

  • अमित, सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं और मध्य प्रदेश के बड़वानी ज़िले में एक वैकल्पिक शिक्षा के प्रयोग पर शुरू हुआ स्थानीय स्कूल – आधारशिला शिक्षण केन्द्र चलाते हैं।

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