भूमिहीन नहीं थे हम पहले

अमित ये कहानियाँ 1997 में पश्चिम चंपारण ज़िले में गाँव की मीटिंग में सुनीं थीं। स्कूल के कमरे में एक दिवसीय मीटिंग के लिये इकट्ठे

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सभी को दिवाली की शुभकामनाएं

अमित: हमारा देश विविधताओं का देश है। सैंकड़ों समुदाय और उनकी सैंकड़ों संस्कृतियाॅं, भाषाएं, गीत और लोक कथाएँ। हज़ारों देवी-देवता और उनकी तरह-तरह की मज़ेदार

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शंकर गुहा नियोगी – जिन्हे देश के युवाओं का आइकॉन होना चाहिये

अमित: अब सोचता हूॅं कि ऐसा कैसे हुआ कि इतने सालों में कभी नियोगी से मिला ही नहीं? नियोगी से हम लोग कभी नहीं मिले

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हम गरीब कैसे बने – 3 : महंगी पड़ी नमला को जुवार!

कुछ सुनी, कुछ आँखों देखी – अस्सी – नब्बे के दशक में पश्चिम मध्य प्रदेश के आलीराजपुर ज़िले में खेडुत मजदूर चेतना संगठ में काम

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युवतियों और युवकों की दुनिया – ‘युवानिया’

अमित: कहा जा रहा है कि भारत विश्व के सबसे जवान देशों में से एक है। हमारी आबादी का एक तिहाई से अधिक हिस्सा, चौदह

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हम गरीब कैसे बने – 2 : “घर बखर सब आपका लेकिन डेहरी के अंदर पांव मत रखना!”

आदिवासियों से ज़मीन छिनने की कहानी अमित: मध्य प्रदेश के सतना ज़िले के श्री साधूराम से सुनकर अमित ने लिखी यह कहानी सतना ज़िले के

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