अमित:
कितने समय से सोच रहे थे कि अठ्ठा जाना है, संगठन के पुराने साथियों से मिलना है। बस टलते-टलते रह गया और अचानक पिछले सप्ताह खबर मिली कि दहली चली गई। उसका खिलखिलाता चेहरा, फीकी पड़ी सफे़द छींट की लाल लूगड़़ी, गले में रानी के छापे वाले सिक्कों का हार पहने, गर्मजोशी से ज़िंदाबाद कहते हुए गले मिलना अब कभी नहीं हो सकेगा।
अलीराजपुर जिले के अठ्ठा गाँव की दहली एक असामान्य, हिम्मती महिला थी। वह अपने परिवार का भी खूंटा थी। अकल्पनीय गरीबी में भी हिम्मत से बच्चों को बड़ा किया क्योंकि उसका पति लाइलिया तो ज़रा ज़रा सी बात पर घबराने के लिये मशहूर था। मुझे याद है कि उनकी बहुत छोटी और नीची झोंपड़ी थी जिसमें अंधेरे में एक छोटी सी खाट का झूला था। उसी के पास बकरियाँ बंधी रहती थीं। उस समय बैल नहीं थे उनके पास, माँग कर खेती करते थे। अंदर एक चूल्हे वाला कमरा था। पुराने कपड़ों से बनी गोदड़ियां थीं। उसके घर गये तो उसने काली चाय पिलाई और कहा कि मेरा बहुत मन होता है तुमको घर बुलाकर खाना खिलाने का लेकिन शर्म आती है कि क्या खिलाऊं। कुछ होता ही नहीं खाने को। हमें भी बहुत शर्म आई और जानबूझ कर उससे रोटी मांग कर खाई।
दहली का परिवार मानकर जनजाति से था, इस नाम की जनजाति के लोग बहुत कम थे। वहाँ के लोग भी मानकरों को नाइका या धाणक जनजाति से कन्फ़्यूज़ करते थे। लेकिन मानकर अलग थे। मथवाड़ का देवाजिया भी मानकर था, वो भी दहली की ही तरह बहुत रौबीला इंसान था।
दहली की ज़मीन न के बराबर थी और वे गाँव के गोहरी थे अर्थात वे रोज़ सवेरे आस-पास के घरों के जानवर चराने ले जाते थे। शाम को दहली या उसके परिवार का कोई सदस्य एक बांस की टोकरी और एल्यूमिनियम का कटोरा लेकर उन सब घरों पर जाते थे। घरवाले, जो भी बना होता था – दाल, रोटी-सब्जी या बासी, उनकी टोकरी या कटोरे में रख देते थे। सब्जी, दाल तो सब मिक्सचर हो जाता था। दहली हंसती थी कि पेट में जाकर तो सब वैसे भी घेचरा होना ही है। क्या फ़र्क पड़ता है। हँसते हुए उसके सधे हुए सफ़ेद दांत निकलते थे, गालों में गढ्ढे पड़ जाते थे और आँखें पतली हो जाती थीं और आँखों की कोरों की चमड़ी सिकुड़ कर धारियाँ बना देती थीं। पूरे चेहरे से हँसती थी।
गरीब होने के बावजूद उसकी हिम्मत और व्यक्तित्व के कारण वह गाँव की औरतों की सलाहकार थी। वे सुवारनी भी थी जो बच्चा होने में महिलाओं की मदद करती थी। बाद में वन विभाग से टक्कर लेने में जो नेतृत्वकारी भूमिका दहली ने निभाई तो भीलाला आदिवासी मर्दों ने भी दहली को अपने नेता के रूप में स्वीकार किया और वह खेड़ुत मज़दूर चेतना संगठन की केन्द्रीय समिति की पहली महिला सदस्य बनी।
नीचे एक शुरूआती दौर के संघर्ष की कहानी साझा कर रहे हैं। यह न केवल पचिम मध्य प्रदेश बल्कि पूरे भारत में आज़ादी के बाद होने वाले आदिवासी संघर्षों के इतिहास की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण कहानी है, क्योंकि आज की युवा पीढ़ी को टंटिया भील, बिरसा मुण्डा और अपने बीच के संघर्षों से कोई परिचय नहीं है। सदियों से चले आ रहे सरकारी विभागों व ब्याज का धंधा करने वालों के ज़बरदस्त दमन और शोषण और आदिवासियों की ज़िंदगी पर उनके शिकंजे को तोड़ने के संघर्ष में दहली की अहम् भूमिका थी। आज जिस निडरता से आदिवासी युवा बाज़ारों की सड़कों पर चल पाते हैं बिना शहरियों के डर से और जिस बेबाकी से वे मंच से दहाड़ते हैं, उन्हे यह जानना बहुत ज़रूरी है कि दहली बाई और उनके सैंकड़ों साथियों ने डर और आतंक के माहौल को तोड़ कर ये सड़कें उनके लिये खुली करवाई हैं।
यह भी बताना और याद रखना ज़रूरी है कि अस्सी के दशक में वनों पर अपना हक जमाने वाले यह प्रारंभिक संघर्षों को जन्म देने वालों में से एक थीं। कूकड़ी पानिया बंद करो और झाड़ जंगल कुणीन छे, अमरो छे अमरो छे, के नारों से आलीराजपुर में शुरू हुआ यह संघर्ष बाद में पूरे मध्य प्रदेश में फैला। यह नारा आज देश के कोने कोने में लगाया जाता है। उस समय पुराने वन कानूनों के आधार पर ही सरकार काम करती थी। असलियत में स्थिती यह थी कि जंगल वन विभाग का था मतलब वन विभाग के कर्मचारी मालिक थे और सदियों से रहने वाले आदिवासी जंगल के चोर व सरकारी भाषा में अतिक्रमणकारी थे। लोग भी कहते थे कि हम सवेरे दांतुन तोड़ते ही जंगल का गुनाह कर देते हैं। हर काम के लिये लकड़ी चाहिये, चाहे जलावन हो या घर बनाने के लिये हो। इसलिये वन विभाग के नाकेदारों से झगड़ा करना तो दूर उन्हे नज़र भी नहीं आना चाहते थे।
ऐसी स्थितियों को तोड़ने का, सदियों से इन कर्मचारियों की दहशत और गुलामी से निकलने का संघर्ष था जिसे दहली जैसे लोगों नें देश के सबसे गरीब ज़िलों में से एक, आलीराजपुर में विंध्याचल की पहाड़ियों के एक छोटे से गाँव, अठ्ठा में शुरू किया। ऐसे ही संघर्षो की बुनियाद पर वन अधिकार कानून बना है जिसमें सरकार को लिखना पड़ा कि वे आदिवासियों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय को दूर करने के लिये यह कानून बनाकर आदिवासियों का जंगल उन्हे वापिस सौंप रहे हैं।
मरते दम तक दहली का यह जोश कायम था। दहली बाई को ज़िन्दाबाद, जोहार, सलाम।
खेत में गढ्ढे खोदने आये वनविभाग को भगाया
अलीराजपुर जिले के छोटी गेन्द्रा गाँव की स्कूल के एक छोटे से कमरे में हम रहते थे। बात अस्सी के दशक के शुरूआती सालों की होगी। सवेरे-सवेरे किसी ने आकर बताया कि रेंज वाले नेवाड़; जंगल की खेती में गढ्ढे खोदने आ रहे हैं। एक झटके में हमारा दिन शुरू हो गया। शुरू हो गया झगड़ा। अब मज़ा आयेगा।
खेमराज और मैं, दोनो तुरंत अठ्ठा के लिये रवाना हो गये। रास्ते भर अलग अलग संभावनाओ की अटकलें लगाते रहे। क्या करेंगे ? कैसे रोकेंगे ? नहीं रूकेगा तो क्या होगा ?…… संगठन, संघर्ष, उलगुलान ………
उत्साह से और रायसिंग के घर का टेकड़ा चढ़ने से, साँस फूल रही थी। हाँफते हुए रायसिंग के घर पहुँचे। वह अभी उठकर बैठा ही था। दरवाज़े के सामने तापणी के पास बैठा हाथ और पीठ सेक रहा था, मुँह लटकाकर। इस बखेडे़ के बोझ से दस साल बूढ़ा लग रहा था।
हम भी वहीं जाकर बैठेे। उसकी सूरत देखते ही तुरन्त तो हमारा भी उत्साह थोड़ा ठंडा पड़ गया। उसे जोश दिलाने के लिये ज़ोर से ज़िंदाबाद किया।
ज़िंदाबाद नहीं, अब मुर्दाबाद हो गया – रायसिंग की निराशा स्पष्ट थी। उसे लग रहा था कि नाकेदारों से झगड़ा मोल कर बहुत बड़ी गलती कर दी। उसी का यह नतीजा है। अब कुछ नहीं हो सकता। अब तो रेंज वाले गढ्ढे खोद ही देंगे। नेवाड खेती बंद हो जायेगी। अब तक जैसे वैसे नाकेदारों को पैसे और मुर्गियाँ खिलाकर खेती खेड़ तो रहे थे, अब तो कुछ नहीं हो सकता।
इस निराशा के सुर से बातचीत शुरु हुई। धीरे-धीरे, कुछ और लोग इकठ्ठे हो गये। रुपसिंह, गुलाब और नानसिंह भी आ गये। बातचीत होने लगी – देखो तुमने संगठन बनाकर नाकेदारों को रिवत देना बंद कर दिया। इससे वनविभाग की हर वर्ष की 2-3 लाख रुपये की कमाई बंद हो रही है तो वो तुम्हे तंग तो करेंगे ही। यह तो पता ही था कि वे कुछ न कुछ करेंगे। घबराने से क्या फ़ायदा। अब तो यह सोचना चाहिये कि अभी कैसे रोकें इन्हे?
इसी बीच लाइलिया और उसकी पत्नी दहली भी आ गये। दहली बहुत गुस्से में थी। उसने कहा कि इस नेवाड़ के कारण मेरे आदमी को बाँध-बाँध कर पीटा था। एक महीने तक खून की उल्टियां होती रहीं। नाकेदारों को बकरे और बैल बेच-बेच कर पैसे भरे हैं हमने। यह खेती तो बिल्कुल नहीं छोड़ूंगी चाहे कुछ भी हो जाये। दहली की बात से सभी को जोश आ गया।
रायसिंह को भी थोड़ी गर्मी आई। बातचीत में तय हुआ कि तीनों फलियाओं की सभी औरतें इकठ्ठा करके दहली की नेवाड़ में जाकर बैठ जायेंगी और जो मज़दूर आयेंगे गढ्ढे खोदने, उनसे कहेंगी कि वे गढ्ढे खोदने का काम न करें। नहीं तो गाँव में आपस में झगड़ा हो जायेगा।
ऐसा सोचकर सब चल दिये। गुलाब अपने फलिया की औरतों को इकट्ठा करने चला गया। घर -घर घूम कर वो औरतों को निकाल रहा था। गूठिया अपनी फलिया की औरतों को इकठ्ठा करने गया और दहली अपनी फलिया में। वो सबको यही बता रही थी कि आज यदि मेरे खेत मे गढ्ढे खोद दिये तो कल तुम्हारे खेत में भी आयेंगे। इसलिये सब को एक दूसरे की मदद करनी चाहिये। ऐसी बातें पहले से भी गाँव में चल रहीं थीं कि सबको एकता रखनी चाहिये। हिल मिल कर रहना चाहिये। एक घंटे में करीब पन्द्रह बीस औरतेें रायसिंह के घर इकठ्ठी हो गईं। पहले उन्हे डर लग रहा था। शर्म भी आ रही थी कि वो कैसे बोलेंगी नाकेदारों से। कहीं हमें पीटेंगे तो नहीं? ऐसे तो नहीं कहेंगे कि औरतें क्यों आई हैं? दहली समझा रही थी – आदमी अकेला थोड़े ही करता है खेती। हमारा भी तो पेट है – हम भी तो वही जुवार खाते हैं जो इस खेत में पकती है। हमारी भी तो खेती है यह। इसमें शर्म की कोई बात नहीं है। औरतों को देखकर आदमियों को भी जोश चढ़ गया। उनका डर भी कम हो गया। धीरे-धीरे दहली के पीछे सभी औरतें खेत की तरफ चल दीं। सब ने उन्हे ज़िंदाबाद किया।

कोई हँस रहीं थी। कुछ ज़ोर-ज़ोर से बोल रहीं थीं। जिंदाबाद कहती हुई घर से निकल पड़ीं। पहली बार वो ऐसा कुछ करने जा रहीं थीं। उन्हे नहीं पता था कि वे इतिहास रच रही हैं। पीछे से सब के आदमी उन्हें सिखा रहे थे – ये कहना, वो कहना, ऐसा करना, डरना मत, भिड़ जाना, दौड़ा देना, नहीं नहीं वहीं बैठ जाना…… बड़ी देर तक रंग बिरंगी ओढ़नियों की लाइन को जाते हुए सब लोग देखते रहे। वो खेत में उतरकर टेकड़ा चढ़ीं फिर नज़र से ओझल हो गईं। कुछ बच्चे भी उनके पीछे – पीछे देखने दौड़े और टेकड़े पर चढ़ कर बैठ गये।
बाकी आदमी वापिस घर में तापणी के चारो तरफ़ आ कर बैठ गये। बीड़ी बना बनाकर धुआं उड़ा रहे थे और बातें कर रहे थे कि क्या होगा। डिप्टी और नाकेदार क्या कहेंगे? क्या सोचेंगे? उन्हें कैसा लगेगा औरतों को देखकर – इसी तरह की अटकलें लगाते रहे। घबराहट को छुपाने के लिये सब बड़ी आवाज़ में बहादुरी की बातें कर रहे थे। दहली का पति जो सबसे ज़्यादा डरता था ज़्यादा ही ज़ोर से बोल रहा था। वो कह रहा था मैने जैसे ही सुना कि गढ्ढे खुदने वाले हैं खेत में, मेरी तो थर-थरी छूट गई भाई -में ते घब….बा्रई गियो।
थोड़ी देर में छतरसिंह को भेजा टेकड़े पर देखने के लिये कि क्या हो रहा है। जब तक दहली, सोनबाई व अन्य औरतों की टोली खेत में पहुँची नाकेदार मज़दूरों को लेकर वहाँ पहुँच चुके थे। औरतों नें दूर से ही मज़दूरों को चिल्ला चिल्ला कर कुछ कुछ कहना शुरु कर दिया। नाकेदार भी उन्हे गाली देने लगे – तुम्हारे बाप का जंगल है जो यहाँ खेती करते हो ? यह तो सरकार का जंगल है। सरकार का ऑर्डर है गढ्ढे खोदने का। हमारी मर्जी़ होगी वो ही करेंगे। क्या कर लोगे तुम? मज़दूर भी हँस रहे थे। अब निकल जायेगी सारी नेतागिरी। कूकड़ी महंगी पड़ेगी।
औरतें भी डट कर जवाब दे रही थीं। हमारे बूढ़े पीढ़ियों से इस जंगल में रह रहे हैं। वो यहीं पैदा हुए और यहीं मरे। तुम तो अभी आये हो। और आकर ट्रक भर भर के इसे काट कर ले गये। ये जंगल हमारा ही है, तुम्हारा नहीं है। तुम तो शहर में रहने वाले हो, जाओ शहर में रखो जंगल। यहाँगाँव में क्यों आते हो। मज़दूरों को भी बहुत बुरी भली सुनाई – तुम अनाज नहीं खाते क्या जो यहाँ खेतों का बर्बाद करने आये हो? तुम्हारे बच्चे नहीं हैं क्या पालने के लिये? आओ यहाँ हमारे पेट पर पहले गेती चलाओ फिर खोदने देंगे गढ्ढे।
दूर-दूर से बातों का युद्ध चल रहा था। सभी औरतें एक साथ ही ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रहीं थीं। औरतों का इतना दबंग, आक्रामक रुख देखकर मज़दूर तो बिलकुल चुप ही खड़े थे, नाकेदार भी नहीं समझ पा रहे थे कि औरतों के साथ क्या करें। आदमी होते तो मार पीट करते।
इतने में एक बहुत मजे़दार बात हुई। दहली के पैर में गोखरू का काँटा चुभ गया अैार उसके मन में शरारत आ गई। वो काँटा निकालने नीचे झुकी और चिल्लाती हुई ऐसे दिखाया जैसे पत्थर उठा रही हो – जैसे ही मज़दूरों ने उसे ऐसे झुके हुए देखा तो वे सब भागना शुरू हो गये। नाकेदार और डिप्टी भी भागते मज़दूरों को देखकर घबरा गये। डिप्टी चिल्लाता रहा, मत भागो मत भागो। परन्तु उसकी किसी ने एक न सुनी। फिर मज़दूरों के पीछे नाकेदार और डिप्टी भी दौड़े। औरतें भी हँसती हुई उनके पीछे दौडीं।
तभी दूर टेकड़े से देख रहा छतरसिंह कुछ चिल्लाया तो घर में बैठे लोग भी टेकडे़ की ओर भागे नाकादारों को देखने के लिए।
फिर औरतों ने खेत में ही सोचा कि शायद ये लोग, और अधिक नाकेदारों को लेकर वापिस आयेंगे तो वे वहीं खेत में बैठकर गीत गाने लगीं।
घर से कुछ आदमी दो-तीन डेगड़ियों में पानी भर कर खेत में ले गये। दोपहर तक औरतें वहीं बैठी रहीं। फिर जब लगा की अब वापिस नहीं आयेंगे तो सब घर आईं।
औरतों का उत्साह बहुत बढ़ गया था। बडे़ जोश से पूरा किस्सा घर वालों को सुना रहीं थीं। दहली मेम्बरानी की नाकेदारों को दौड़ाने की बात दूर दूर तक फैल गई। बहुत दिनों तक सबके घरों में इसी की बातें चलती रहीं।
रात को रायसिंह फिर जोश में जिंदाबाद कर रहा था – सवेरे का मुर्दाबाद तो बिलकुल भूल गया था। सभी लोगों को अपनी ताकत का अहसास हो गया और इस बात का भी कि नाकेदार और डिप्टी भगवान नहीं होते। ये भी इनसान ही हैं और ये भी डर कर अपने जैसे ही भागते हैं।
……….
इसके बाद जैसे-जैसे लोगों का हौसला बढ़ता गया मथवाड़ रेन्ज में आने वाले अठ्ठा व अन्य चालीस पचास गाँवों में भी संगठन को दहली और उसके साथियों नें बढ़ाया और आदिवासियों नें वन विभाग के आतंक से मुक्ति पाई। उनकी असली आज़ादी की लड़ाई की यह एक छोटी सी कहानी है।
बाद के वर्षों में जैसे-जैसे संगठन का काम बढ़ता गया दहली व अन्य गाँव की आदिवासी महिलाओं नें बायरा संगठ, महिला संगठन की शुरूआत की और गाँव-गाँव जाकर महिलाओं की मीटिंगें कर के उन्हे संगठित किया। नर्मदा आंदोलन के कार्यक्रमों में भी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया क्योंकि डूब में जाने वाले लोग भी संगठन के साथी थे तो उनका साथ तो देना ही था। साथ ही संगठन की सोच यह भी थी कि चाहे उनके गाँव बांध की डूब में नहीं जा रहे लेकिन सरकार की अन्य नीतियों से वे परेशान थे अतः उन्हे भी इस आंदोलन में भाग लेना चाहिये।
एक भार फिर दहली बाई को जोहार और ज़िंदाबाद। आधुनिक भारत में आदिवासियों को शोषण से मुक्ति दिलवाने और उनकी ज़िन्दगी को उनके तरीके से और इज़्ज़त से जीने के आंदोलनों की नींव रखने वाली योद्धा के रूप में इन्हे याद रखना चाहिये।

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