राज कुमार और आफाक उल्लाह:
उत्तर प्रदेश का महाराजगंज ज़िला, बिहार और नेपाल से सटा हुआ है, इसे 2 अक्टूबर 1989 को गोरखपुर ज़िले से अलग कर बनाया गया था। यहाँ निचलौल ब्लाक के अंतर्गत आने वाली बैदौली ग्राम पंचायत आज़ादी के पहले तक जंगलों से घिरी थी, आज़ादी के बाद यहाँ पर मुख्य रूप से बनटागिया और भर समुदाय के लोगों ने आशियाना बनाया। धीरे-धीरे जंगल को गाँव व खेतों में परिवर्तित किया गया। इस गाँव के लोगों का मुख्य व्यवसाय मछली मारना, केकड़ा पकड़ना था। कुछ सालों बाद करीब 1956 में इस गाँव में मौर्य समुदाय से वास्ता रखने वाले कुछ और लोग आकर बसे। इनका काम था जंगल में मिलने वाले पौधों के बीज लाना और उनकी नर्सरी तैयार करना। शुरू में इस काम को कुछ घरों ने शुरू किया और धीरे-धीरे लगभग 88 घरों के लोग यह काम करने लग गए। बदलाव की बयार बहने लगी, इन परिवारों के बच्चों का उच्च शिक्षा से जुड़ाव हुआ। कोई वकालत, कोई शिक्षा और कोई सामाजिक व राजनीतिक क्षेत्र में निकले, लेकिन न जाने कौन सी आपदा ने करवट ली कि ये नर्सरियाँ धीरे-धीरे विलुप्त होती गई। जब रोज़गार खत्म हो हुआ तो बेरोज़गारी बढ़ती चली गई और जीवन-यापन मुश्किल होता देख, इस काम में लगे लोग धीरे-धीरे पलायन करने लगे।
लेकिन इन्हीं के बीच एक व्यक्ति ऐसा भी था जिसने ठान लिया था कि इसी रोज़गार के दम पर अपने परिवार का उच्च शिक्षा और खेल के क्षेत्र में भी लोहा मनवा कर दिखाएंगे। वृद्धि चंद मौर्य ने नर्सरी के काम को ही रोज़गार बनाया और अशोक नर्सरी के नाम से एक पौधों की नर्सरी शुरू की, जिसमें वन विभाग ने भी उन्हें काफी सहयोग किया, लेकिन वन विभाग द्वारा पौधों का सही रेट नहीं मिल पा रहा था। दो रुपए-ढाई रुपए प्रति पेड़ के हिसाब से वन विभाग भुगतान करता था जो उनकी मेहनत के हिसाब से काफी कम था। फिर भी वृद्धि चंद मौर्य जी अपनी अशोक नर्सरी को बेहतर पर्यावरण और पेड़-पौधों के लगाव के कारण संचालित करते रहे, विगत 10 वर्षों से उन्होंने अन्य प्रदेशों से भी पौधे मंगाना शुरू किया।

कारोबार में कुछ इजाफा होने ही लगा था कि मार्च 2020 को कोविड-19 वैश्विक महामारी अपने पैर पसारने लगी। इससे कारोबार भी प्रभावित होने लगा लेकिन वृद्धि चंद का हौसला इतना मज़बूत था और उन्होंने फिर कठिन परिश्रम से अपना यही रोज़गार शुरू किया। धीरे-धीरे वृद्धि चंद का नेटवर्क अन्य राज्यों में भी बना और पौधों का सप्लाई होने लगी जो बहुत ही सस्ते दाम में पहुँच रहे हैं। जब भी नर्सरी में पौधों का काम बढ़ने लगता हैं तो वह आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, कश्मीर जैसे कई अन्य राज्यों और विदेश तक से पौधे मंगाते हैं। इन पौधों और पेड़ों को अब वह ऑनलाइन बेचने का भी काम कर रहे हैं।
अभी इनके गाँव में लगभग अन्य सभी नर्सरी बंद हो गई हैं, लेकिन नए दौर के हिसाब से काम करने के कारण वृद्धि चंद मौर्य लगातार इस काम में तरक्की कर रहे हैं। वृद्धि चंद खुद आठवीं तक की शिक्षा प्राप्त किए हैं लेकिन एक छोटे से रोज़गार से ही उन्होंने अपने दो बेटों को उच्च शिक्षा दी है और एक बच्ची को उच्च शिक्षा देने के साथ-2 राज्य स्तरीय खिलाड़ी बनाने में भी सफल हो पाए हैं। वृद्धि चंद मौर्य जी का कहना है, “अपना काम अपना होता है, बस ज़रूरत है मजबूती के साथ टिके रहने और नवीन रचनात्मक तौर-तरीके खोजने की। वरना पलायन कर काम तलाशना तो सबसे मुश्किल काम है।”

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