अभिषेक दास:
ओमप्रकाश वाल्मीकि, हिंदी दलित साहित्य के प्रमुख लेखकों में से एक हैं जिन्होंने कविताएं लिखीं, ‘ठाकुर का कुआं’ उनकी बहुचर्चित कविता है। उन्होंने कहानियाँ लिखीं, लगभग 60 नाटकों में अभिनय, निर्देशन किया, कई कृतियों का अनुवाद भी किया। उनका जन्म 30 जून, 1950 को बरला, जिला मुज़फ्फरनगर, उत्तर प्रदेश में हुआ। उन्होंने हिंदी साहित्य से एम.ए. किया। उनकी आत्मकथा “जूठन” अंग्रेजी, जर्मन, स्वीडिश, पंजाबी, तमिल, मलयालम, कन्नड़, तेलगु में अनूदित एवं प्रकाशित हैं।
जूठन – पहला खंड
किताब के शुरुआती पन्नों को पढ़कर आसानी से समझ आता है कि इस आत्मकथा का नाम जूठन क्यों हैं। खाने के बाद का बचा-कुचा खाना जूठन होता है। सवर्णो के शादी-ब्याह के अवसरों पर जूठी पत्तलें चूहड़ों को दे दी जाती थी, जिन में से बचा हुआ खाना इकट्ठा किया जाता था। पूरियों को सुखाकर रख लेते थे और बरसात के दिनों में जब खाने का बंदोबस्त नहीं हो पाता था, तब इन्हीं पूरियों को पानी में उबालकर नमक लगाकर खाते थे। ‘जूठन’ इन्ही सामाजिक नश्तरों की एक खेप हैं। इस पुस्तक में पीड़ा भी हैं, असहायता भी, गुस्सा भी और अपने आपको आदमी का दर्जा दिए जाने की मानवीय इच्छा भी।
जूठन क्या है?
ओमप्रकाश वाल्मीकि जी ने अपनी योग्यता के दम पर, झकझोरने वाली किताब “जूठन” को ज़िंदा कर दिया है। जूठन पीढ़ियों के दलित संघर्ष का एक दस्तावेज है, एक आइना है। इस किताब को पढ़ते-पढ़ते कई जगह आंसू, झुंझलाहट, व्याकुलता, दुःख, और गुस्से से सामना हुआ। कहते हैं कि जितना भोगा जाता है उसका एक चौथाई ही याद रखा जाता है, जितना याद रखा जाता है उसका एक चौथाई ही बताया जाता है, जितना बताया जाता है उसका एक चौथाई ही लिखा जाता है और जितना लिखा जाता हैं उसका एक चौथाई ही पढ़ने वाला समझ पाता है। इस नज़र से देखने पर जूठन के पार क्या-क्या भोगा होगा, उसकी कल्पना भी डराती है।
हेडमास्टर द्वारा स्कूल में प्लेग्राउंड पर लगवाई गयी झाड़ू हो, केमिस्ट्री के प्रैक्टिकल में जानबूझकर फेल कर दिया जाना हो, घनिष्ठ से घनिष्ठ मित्र भी किसी से मिलवाने ले जाते हो तो सिर्फ ओमप्रकश बताने का आग्रह करते हों ‘वाल्मीकि’ छुपा लेने को कहते हों। शादियों के बाहर बैठ के जूठे पत्तल की टोकरी भरने का इंतज़ार हो, पूड़ियो को सुखाकर बरसात के दिनों में पानी में उबाल कर खाना हो, बेगार करने से मना करने पर थाने की सामूहिक पिटाई, नए दूल्हे दुल्हन को सलाम के लिए घर-घर ले जाते माँ-बाप हों, सूअर की बलि के लिए हाथ में चाकू लेकर भेज दिया जाना हो, साल भर के मेहनती काम के बाद बस12-13 किलो अनाज देना हो। माड़ के पानी में दूध का दर्शन हो, या पत्नी, भतीजी का लगातार ‘वाल्मीकि’ उपनाम ना लगाने का दबाव हो। जीवन में एक घटना दुखद हो जाए तो उसकी छाप कितनी लम्बी मन पर छायी रहती है, लेकिन जब सारा जीवन ही दुखद घटनाओं की अनवरत श्रंखला हो तो ऐसी ज़िन्दगी गुज़ारने की कल्पना ही सिहरन पैदा कर देती है।
किताब का हाईलाइट ये लाइन रही मेरे लिए – “ऐसी दुर्गंध कि मिनट भर में साँस घुट जाये। तंग गलियों में घूमते सूअर, नंग-धड़ंग बच्चे, कुत्ते, रोज़मर्रा के झगड़े, बस यही था वह वातावरण, जिसमें बचपन बीता। इस माहौल में यदि वर्ण-व्यवस्था को आदर्श व्यवस्था कहने वालों को दो-चार दिन रहना पड़ जाए, तो उनकी राय बदल जाएगी।”
इन सब के बीच मुझे उनके पिताजी का अक्खड़पन पसंद आया। जिस तरह वो हमेशा साथ खड़े रहे, चाहे स्कूल हेडमास्टर से भिड़ना हो या देहरादून में मामा को झाड़ आना… वो सुखद था… स्कूल में बने दोस्त… नाटक मण्डली का मंचन, बम्बई हॉस्टल का जीवन, लाइब्रेरी में पढ़ी गयी किताबें और माँ की चिंताओं ने भी जीवनी से बांधे रखा।
जूठन वो भोगा हुआ सच है, जिसे जाति व्यवस्था की गहरी खाई में छुपा दिया गया होता अगर ओमप्रकाश वाल्मीकि ना होते। जाति व्यवस्था की ये खाई इतनी गहरी है जहाँ चीख पुकार तो मचती है, लेकिन कराहने की आवाज़ें बाहर नहीं आ पाती। जूठन उस खाई को पाटने का महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं, एक आइना है।

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