अमित:
हम लोग सेंधवा से पूना जा रहे थे। कुछ देर बाद घाट में बस रुकी और एक आदिवासी परिवार चढ़ा। नीचे छोड़ने वालों की भीड़ लगी थी। सब लोग आपस में ज़ोर-ज़ोर से बोल रहे थे। बस में बैठे लोग इनके अंदाज़ पर हंसे। दो-तीन बच्चे, कुछ डिब्बे, रस्सी से बंधा बिस्तर, एक लकड़ी का गट्ठर। ऐसे पोटलियों में बंधा सामान लेकर चढ़े और हमारे आगे की सीट पर बैठे। एक आदमी हमारी पास वाली सीट पर बैठा। हमारे बच्चों ने उनके बच्चों को एक बिस्कुट दिया और संवाद शुरू हुआ।
पूछने पर पता लगा कि वे नाइक जाति के आदिवासी हैं। महाराष्ट्र में किसी गाँव में गन्ने के खेत में मज़दूरी करने जा रहे थे। छः महीने वहीं खेत में रहेंगे। जिसके खेत में काम करने जा रहे हैं उससे इन्होंने बोनी के पहले कर्जा लिया था। यहाँ खेती बहुत कम है। खेत बो दिया। और लोग हैं घर में काम करने वाले।
बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ा। “क्या तुमने खाजिया नाइक का नाम सुना है?”
“हाँ, आड़े बूढ़े बात करते हैं।” पास बैठे एक साहब ने पूछा – कौन था खाजिया नाइक? फिर क्या था, अपने को मौका मिल गया कहानी सुनाने का। आप भी सुन लीजिये। अभी हमारी बस सतपुड़ा पहाडियों के बीच जिस जगह से गुज़र रही है, यहीं आस-पास एक जगह है – आंबा पानी। यहाँ अंग्रेज़ों और नाइकों, भीलों के बीच भारी संघर्ष हुआ था। इन भीलों व नाइकों के मुखिया थे खाजिया नाइक और भीमा नाइक। सैंकड़ों आदिवासी इस संघर्ष में शहीद हुए थे।
किसी ज़माने में सेंधवा के आस-पास के इस पूर इलाके में नाइक आदिवासियों का वर्चस्व था। पहाड़ियों में बसे ये नाइक आदिवासी यहाँ के मुखिया थे। एक मुखिया के पास दस-बारह गाँव रहते थे। कुछ बड़े मुखियाओं के पास ज़्यादा बड़ा इलाका रहता था, जैसे बड़वानी के पास, ढाबा बावड़ी का भीमा नाइक। इनके कुछ हक थे जो राजा भी मानते थे। दशहरे पर राजा इन्हें एक रेशम की पागड़ी, एक बकरा और ढाटी देता था। इसके अलावा कुछ पैसा भी राजा इन्हें देता था। इसे नाइकी कहते थे। गाँव के लोग इन्हें अनाज आदि खाने का सामान देते थे। गाँव से फाला इकट्ठा करने का काम भी, राजा इन्हीं के माध्यम से करता था। फाले का कुछ हिस्सा इन नाइकों को मिलता था। जंगल से कोई भी लकड़ी, गोंद या अन्य सामान लेता तो उस इलाके के नाइक को कुछ कर देना पड़ता था। इनके इलाके के गाँवों में कोई झगड़ा हो तो भी यह नाइक ही उसे तोड़ते थे। कुछ बड़े मुखियाओं के पास लकड़ी की बेड़ियां भी थीं।
इन नाइकों के इलाके से गुज़रने वाले रास्तों से कोई भी अपना माल ले जाये तो इन्हें रास्ता कर देना पड़ता था। यह रास्ते का कर सभी व्यापारियों को भी देना पड़ता था। इसके बदले में नाइक इन माल से लदी गाड़ियों को सुरक्षित पार करवाते थे। उस ज़माने में इन पूरी पहाड़ियों पर घने जंगल थे।
यह व्यवस्था केवल इस इलाके तक सीमित नहीं थी। बड़वानी, धार, झाबुआ, बुराहनपुर, शिरपुर, बड़गाँव आदि इलाकों में भी इसी तरह की नाइकों व भीलों की व्यवस्था थी।
यदि कोई व्यापारी नाइकों को उनका कर नहीं देता या राजा से किसी मुखिया का हक़ को लेकर टकराव होतो तो ये नाइक अपनी सशस्त्र टोलियों के साथ रास्ते पर लूट-पाट करते। या फिर राजा की रियासत के गाँवों में धनी किसानों को लूटते।
हमारी बस जो अंधेरे को चीरती हुई जा रही थी अचानक रूकी। और गाड़ियां भी रूकी थीं। पास बैठे साहब ने बताया कि यह कानबाई है। पुलिस सब गाड़ियों को रोकती है। एक साथ सारी गाड़ियां जाती है। यहाँ चोरी का बहुत डर रहता है। आस पास भील रहते हैं। इनका धंधा ही है चोरी।
सामने बैठे नाइक परिवार की महिला भड़क गई। “सारे थोड़ी चोर होते हैं। इनका धंधा तो खेती है। एक-दो चोर रहते हैं। सारे थोड़ी चोर होते हैं। और जो चोरी करते हैं वो तो सबकी मिली भगत से होती है।”
अंधेरे में बैलगाड़ी के पहियों की बरमराहट और बैलों के गलों में बंधी पट्टियों की हल्की-हल्की आवाज़ आ रही थी। इधर-उधर टार्च की रोशनी हिल रही थी। डर से बस के लोग भी चुप-चाप हो गये थे।
महाराष्ट्र से कपास भर के ये गाड़ियां सेंधवा आती हैं। सेंधवा इस इलाके की कपास की सबसे बड़ी मंडी है। मेरे बेटे सारंग ने पूछा, “इन गाड़ियों को चोर नहीं पकड़ेंगे?” बेटी, रेवली ने पूछा, “वो खाजिया नाइक अभी होगा क्या?”
नहीं वो नहीं है अब। वो तो अबसे करीब एक सौ पचास साल पहले था। उसके बच्चों के बच्चों के बच्चों के परिवार के लोग अब भी शायद इन पहाड़ियों में होंगे।
1818 में इस पूरे इलाके में अंग्रेज़ों का शासन लागू हो गया। सेंधवा का क्षेत्र खानदेश में आ गया जो अंग्रेज़ों के सीधे प्रशासन में था। इस समय तक नाइकों के स्थानीय राजाओं के साथ संघर्ष बहुत बढ़ गये थे। नाइकों और भीलों ने पूरे इलाके में बहुत उपद्रव मचा रखा था। इस इलाके का सेटलमेंट करने वाले प्रमुख अंग्रेज़ अधिकारी मैलकॉम ने लिखा कि इस इलाके में हमारा मुख्य काम है भीलों व नाइकों के इस उपद्रव को खत्म करना। तभी हम यहाँ अपनी कुछ पैठ जमा सकेंगे।
धीरे-धीरे अंग्रेज़ों ने साम – दाम – दण्ड – भेद की नीति से नाइक मुखियाओं को तोड़ना शुरू किया। नाइकी की व्यवस्था खत्म करके उन्होंने कुछ नाइकों का वार्षिक भत्ता तय कर दिया। बदले में इनके इलाके में होने वाली चोरियों को रोकने की ज़िम्मेदारी इनके सिर पर डाल दी।
साथ ही इन भीलों और नाइकों को लेकर अंग्रेज़ों ने एक पलटन बनाई – खानदेश भील कोर्प्स, मालवा भील कोर्प्स। पैसे देकर मुखियाओं को इसमें भरती किया जाता था।
इन्हीं से इनके लोगों को पकड़वाने का काम करते थे। जो भील, नाइक इसमें भरती होने से मना करते, उन्हें पकड़ कर जेल में डाल दिया जाता था। धीरे-धीरे इन नाइकों की हालत बद से बदतर होती गई और इनके मुखियाओं के हक छिनते गये। 1858 में एक अंग्रेज़ अधिकारी ने उच्च अधिकारियों को भेजी गई अपनी रिपोर्ट में लिखा – “अंग्रेज़ों के आने के बाद से इस इलाकों में लोगों की हालत खराब हुई है। हमारी नीतियों से गरीब लोग और गरीब हुए हैं। यह इलाका पूरी तरह उजाड़ दिखाई देता है।”
जब दमन की इंतहा हो जाती है तो लोगों के सामने एक ही रास्ता होता है – विद्रोह।
1857 में अंग्रेज़ों के खिलाफ क्रांति के बिगुल की आवाज़ भीमा व खाजिया नाइक के कानों तक भी पहुंची। उन्होंने तात्या टोपे से सम्पर्क किया। साथ ही नासिक, अहमदनगर, मालेगाँव, नंदुरबार के भील नाइकों से भी संपर्क किया। भीमा ने कहा कि हमें खबर मिली है कि अंग्रेज़ों को भारत से बाहर भगा देना है। पूरे नाइक व भील अपने मुखियाओं के साथ इस संघर्ष में कूद पड़े।
बंबई के अंग्रेज़ अधिकारी ने लिखा कि यदि तुरंत कुछ कदम न उठाये गये तो मेरठ के बाद पश्चिम भारत का यह हिस्सा क्रांति का सबसे बड़ा केन्द्र बन जायेगा। अंग्रेज़ों के लिये यह बहुत बड़ा सिर दर्द होगा क्योंकि हमारा उत्तर भारत से दक्षिण का रास्ता बंद हो जायेगा। सैनिकों का आवागमन व व्यापारिक सामान का मुंबई तक आना कठिन हो जायेगा। इसलिये इस विद्रोह को पूरी तरह खत्म करना बहुत ज़रूरी है।
सेंधवा से बीस-पच्चीस किलामीटर दूर आंबापानी में 11 अप्रैल 1858 को भीमा व खाजिया की सात-आठ सौ महिला व पुरुष सैनिकों की टुकड़ी का अंग्रेज़ों की फौज से घमासान हुआ। इस टुकड़ी में कुछ मकरानी, पठान व इरानी सैनिक भी शामिल थे। अंग्रेज़ों में इनका सामना करने के लिये नासिक, नगर, महू व आसपास की अन्य छावनियों से पलटनें बुलवाई।
भील नाइक अंग्रेज़ों के हथियारों के आगे नहीं टिक सके। लगभग 350 महिलाओं व आदमियों को गिरफ्तार करके वहीं मौत के घाट उतार दिया गया।
बाद में खाजिया व भीमा को भी पकड़ा गया।
भीमा पर अंग्रेज़ रानी के खिलाफ़ बगावत करने का मुकदमा चलाया गया और आजीवन कारावास की सज़ा दी गई।
इस विद्रोह के बाद अंग्रेज़ों ने नाइकों व भीलों को उनके गाँवों में ढूंढ-ढूंढ कर मारा व यहाँ से भगाया। इस इलाके में खेती करने के लिये किसानों को प्रेरित किया। इसी समय के बाद बहुत से लोग झाबुआ ज़िले से भी नदी पार करके यहाँ खेती करने आये। आज यही बारेले व भीलाले इस इलाके में बसे हैं।
आज भी कुछ पुराने लोग बताते हैं कि किस तरह चांदी का एक रुपया देकर उन्होंने गाँव रखा था। बलवाड़ी इलाके के कुछ गाँवों में अभी भी नाइक मुखियाओं के गाता हैं। जब कभी लोगों को सरकार, कोर्ट कचहरी का काम पड़ता है तो इन्हीं नाइकों के गाताओं पर मन्नत मांगते हैं। सरकार से टक्कर लेने वाले लोगों की आत्मायें आज भी लोगों के काम आ रही हैं।
रेवली, सारंग तो कहानी सुनते-सुनते सो गये हैं। सामने बैठे परिवार ने चिल्ला कर बस रोकी। उन्हें जहाँ उतरना था उससे काफ़ी आगे बस रुकी। फटे चीथड़े से कपड़े पहने बच्चों को लेकर, अपनी पोटलियों में बंधी गृहस्थी को संभालते ये नाइक परिवार बड़बड़ाते हुए उतर गया।
कौन सुनता है इनकी आज? खाजिया और भीमा के वंशज। एक समय यहाँ के मुखियाओं के वंशज जिनसे राजा और अंग्रेज़ भी घबराते थे। जो जंगलों में शेरों के रहते भी रात-बेरात निडर इन पहाड़ियों पर घूमते थे।
इस इलाके के पहले स्वतंत्रता के क्रांतिकारियों के वंशज, उतर गये बस से बड़बड़ाते हुए। इनका गाँव आ गया जहाँ अब छः महीने खेत में ही पड़े-पड़े ये सर्दी का मौसम निकालेंगे। मज़दूरी करेंगे और अपना पेट भरेंगे।
तब हम गुलाम थे, ये लोग स्वतंत्र थे। आज हम स्वतंत्र हैं और ये गुलाम।
इन शहीदों को सलाम।
शब्दार्थ:
फाला – कर || गाता – यादगार में लगाए गए पत्थर ||
फीचर्ड फोटो आभार: सबरंग इंडिया

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