नाज़नीन:
मेरा जितना भी समुदाय में काम का अनुभव हुआ है, मैंने इस बात को देखा और जाना है की अगर कोई भी हादसा और कोई अनहोनी किसी महिला या लड़की के साथ होती है तो पहली बात वो इसे अपने घर के किसी के साथ भी साझा करने से डरते है क्योंकि उन्हें ये लगता हैं की अगर उन्होंने इस बात का ज़िक्र घर में किसी से भी किया भी तो उनकी पढ़ाई रोक दी जाएगी अगर वो पढ़ रही है और यदि वो काम पर जा रही है तो उन्हें जाने से रोक दिया जाएगा।
इसी के साथ मैंने कई बार ये देखा है की जब तक किसी महिला के साथ कोई ऐसी हानि न हो जाए जिस पर पब्लिक और मीडिया ने अच्छे से बात न की हो तब तक कोई भी अधिकारी या मदद कर्मी सही तरीके से उस पर काम नही करते। आज भी, आज़ादी के इतने साल बाद महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं। बहुत से इलाके हैं जहाँ अभी भी लाइट्स (बिजली) की दिक्कत है तो कही पर सही से यातायात के साधन उपलब्ध नहीं हैं।
आज भी 10 बजे के बाद महिलाएं यात्रा करने से डरती हैं या फिर घर वाले परेशान होते हैं कि अभी तक घर वापस क्यू नहीं आयी। इसका कारण है की कभी भी कुछ भी हो सकता है। रास्ते में आते-जाते शराब पीकर लोग बैठे रहते हैं, कई बार छेड़खानी नहीं होती है, पर उनकी बातों से ही खॉफ पैदा हो जाता है। आज भी दिल्ली की डीटीसी बसों में मार्शल के होने से भी बस कंडक्टर और अन्य पुरुष महिलाओं से झगड़ा करते हैं।
बात सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है। हम ना तो अपने घर में सुरक्षित हैं और ना ही अपने कार्यस्थल पर। मेरा सवाल है कि महिलाओं की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी आखिर लेगा कौन? किसको हम जवाबदेह बनाएं? क्या हम अपनी ज़िम्मेदारी खुद ले? तो हाँ, हमने ले भी ली, पर उसके बाद कानून खुद एक महिला से आकर सवाल करता है कि आपने कानून को अपन हाथों में क्यूँ लिया? क्यों ना लें जब हमारी ही मदद कोई सही समय पर नहीं कर रहा। आज भी एक रेप सरवाईवर को इंसाफ दिलाने में 10 वर्ष लग जाते हैं (निर्भया केस)।
जहाँ ज़रूरत होती है वहाँ पर न तो कभी सीसीटीवी कैमरे मिलते हैं और ना हीं ज़रूरत के समय में पुलिस पहुँचती है।
मैं बस इस पत्रिका के माध्यम से यही कहना चाहूंगी कि, हम ज़्यादा कुछ तो नहीं, पर बहुत कुछ जागरूक हो कर महिलाओं के लिए कर सकते हैं, जिसकी शुरुआत घर से हो।
- सबसे पहले घर के लोगों को उनकी बेटियों और महिलाओं पर विश्वास करना होगा, उन्हें समझना होगा ताकि अगर परिवार या कोई अन्य व्यक्ति महिलाओं के साथ कुछ भी गलत करे तो वो बेझिझक घर के किसी भी सदस्य के साथ अपनी आपबीती साझा कर सके।
- बात सिर्फ महिलाओं की ही नहीं है बल्कि छोटे बच्चों के लिए भी है कि उन्हें अच्छा और बुरा स्पर्श पता हो, और वो भी अपने माता-पिता से इसके बारे में बात कर सके।
- घर में लोग कोशिश करें एक दूसरे से एक मज़बूत और भरोसेमंद रिश्ता बनाए ताकि ज़रूरत पड़ने पर उनसे बात करने में कोई झिझक ना रहे।
- सिर्फ लड़कियों को सोशल मीडिया इस्तेमाल करने से मना किया जाता है, लड़कों पर ऐसी पाबंदियां क्यूँ नहीं होती? सबको इस बात का डर है कि लड़किया कहीं बिगड़ न जाएँ, क्यों ना हम अपने घर के लड़के को समझाए की उन्हें सोशल मीडिया कैसे इस्तेमाल करना चाहिए।
कुछ काम समाज को भी मिलकर करना है, जैसे:
- लड़कियों ने क्या पहना है, क्या नहीं पहना है, इससे लड़कों को कोई मतलब नहीं होना चाहिए। मैंने कभी ऐसा कोई केस नहीं सुना जिसमें लड़के ने शॉर्ट पहने हैं तो उसका रेप हुआ। तो लड़कियों और महिलाओं के लिए ही क्यों ?
- सबसे ज़रूरी बात हम हर बात सिर्फ लड़कियों को ही क्यों सिखाएँ, लड़कों को क्यों नहीं। हम हमेशा बात करते हैं आप लड़की हो, आपको ऐसे चलना है, ये पहनना है, ऐसे हंसना है, पर क्यों हमेशा लड़कियां?
- ये सब हमें लड़कों को सिखाना है की उन्हें कैसे लड़कियों की इज्जत करनी है न सिर्फ अपनी बहनों की, अन्य लड़कियों की भी।
- हम अपने घर की लड़कियों पर बहुत बंदिशे लगाते हैं और हम डरते हैं तो बाहर के मर्दों से तो क्यों ना हम मर्दों को ही बाहर निकलने से मना कर दें, क्योंकि अपराध भी तो मर्द ही करते हैं ना। अगर वो ही बाहर नहीं निकलेंगे तो महिलाओं के खिलाफ तो अपराध होगा ही नहीं!!
कुछ महत्वपूर्ण कदम जो सरकार को उठाने चाहिए:
- स्कूल, कॉलेज, होटल, रेस्टोरेंट और रोड पर पूरी तरीके से कैमरे लगे हो और जो सुरक्षा रोड पर राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के आने पर होती है उतनी ही सुरक्षा एक आम महिला के लिए भी की जाए।
- इमरजेंसी नंबर, हेल्पलाइन नम्बर हमेशा कार्यरत हो और इनसे जुड़े सुरक्षा कर्मियों की दूरी भी ज़्यादा न हो, कोशिश रहे इनका आवेश १ किलोमीटर के दायरे में रहे।
- सबसे ज़रूरी मौत की सजा, जब भी ये बात सामने आए की दोषी ये व्यक्ति है जिसने भी रेप किया है तो मौत की सजा दी जाए। आज भारत में हर साल ३० हजार से भी ज़्यादा सिर्फ रेप केस दर्ज होते हैं जिनमें से ना जाने कितने तो पुलिस के रिकॉर्ड में आते ही नहीं। मुझे ऐसा लगता है इसका एक ही समाधान है, कैपिटल पनिशमेंट जो की अन्य इस्लामिक देशों में दी जाती है।
- अगर कोई भी व्यक्ति किसी महिला के साथ छेड़छाड़ करे तो उसके खिलाफ मुकद्दमा हो और उसे कुछ वक्त के लिए जेल में रखा जाए या फिर उस पर अच्छा खासा जुर्माना लगाया जाए।

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