अमित :
प्रतुल मुखोपाध्याय
25 जून 1942 – 15 फ़रवरी 2025
मज़दूर दिवस के मौके पर प्रतुल मुखोपाध्याय के बारे में जानना बहुत ज़रूरी है, जिन्होंने साठ साल तक मज़दूरों, किसानों, दलितों और समाज में चल रही लूट के हर पहलू पर अपने गीतों के माध्यम से जनता का शिक्षण किया और सत्ता के गलियारों में बैठे लोगों को भी इनके जीवन संघर्ष से अवगत करवाया। 83 वर्ष की उम्र में, 15 फ़रवरी का, प्रतुल दा, शाश्वत नाद में विलीन हो गये। उनकी मृत्यु की खबर, टेलीग्राफ़, हिंदू, इन्डियन एक्सप्रेस आदि जैसे देश के प्रमुख राष्ट्रीय अखबारों में छापी गई। प्रतुल मुखोपाध्याय एक संगीतकार थे। ऐसी क्या बात थी उनमें कि राष्ट्रीय अखबारों को भी उनकी मृत्यु की दखल लेनी पड़ी? चलिये जानते हैं कुछ उनके बारे में।
प्रतुल दा के नाम से पहले मेरा परिचय उनके एक गाने से हुआ था। श्रुति के साथी मिलन में अरविंद भाई एक बंगला गाना गाते थे – आलू बैचो, छोला बैचो, बेचो बाकुरखानी….। गाने की धुन बहुत आकर्षक थी और गीत के बोल बहुत अजीब से लगते थे। ऐसा भी कोई गाना होता है क्या – आलू बेचो, छोला बेचो? लेकिन इन बोलों का अर्थ जानने के बाद और इसकी आकर्षक धुन के कारण इस गीत को जानने की रूचि बन गई। जब इस गीत को यूट्यूब पर ढूँढा तब प्रतुल दा का परिचय मिला।
समझ आया कि यह व्यक्ति तो जनगीतों का असीम भण्डार है। बहुत से सामाजिक, राजनैतिक मुद्दों पर उनके गीत हैं। कुछ उनके लिखे, कुछ दूसरों के गाए हुए। गीतों की धुनें इतनी मधुर और गेय हैं कि हर समय आप उन्हें गुनगुना सकते हैं। कुछ गीत होते हैं जो ज़ुबान पर चढ़ जाते हैं। प्रतुल दा के गीत ऐसी ही हैं। बिना साज़ों के गाने के लिये वे जाने जाते हैं। आजकल के अधिकतर सामाजिक मुद्दों पर बने गीत या विरोधी स्वर के गीत आम लोगों की जु़बान पर चढ़ते नहीं हैं। पहले ऐसा नहीं था। पचास और साठ के दशक की हिंदी फ़िल्मों में बहुत से गीत गरीबों की ज़िन्दगी का बयान करते थे और बहुत ही मस्त गीत थे।
प्रतुल दा के गीत ऐसे ही गीत थे जिनसे बंगाल के घर-घर में लोग वाकिफ़ थे। उनका एक मशहूर गीत – आमी बंग्लाय गान गाई दुनिया में कहीं भी रहने वाले बंगाल के व्यक्ति को उसकी जड़ों से जोड़ कर रखता है। यह गीत बांग्लादेश में भी बहुत प्रचलित हुआ।
प्रतुल दा का जन्म 1942 में बरिशाल में हुआ जो अब बंग्लादेश में स्थित है। कॉलेज के समय से ही वे विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लेते हुए अपने गीत गाते थे। इनके बहुत से जनवादी गीत व कविताएँ, इन्डियन पीपल्स थियेटर असोसियेशन के माध्यम से प्रचलित हुए। वामपंथी संगठनों में उनके गीत बहुत प्रचलित थे। उनकी विशेषता थी कि वे किसी भी कविता को धुन देकर गीत बना देते थे। प्रतुल दा एक असाधारण गीतकार थे। इनके गीत किसी भी व्यक्ति के मन को सोचने के लिये प्रेरित करते थे। संखा घोष और निर्मल हलदार की बहुत सी कविताओं पर गीत बनाये उन्होंने। अंग्रेज़ी की गायिका व गीतकार ट्रेसी चैपमैन भी उनकी पसंदीदा गायिका थीं। बंगाल के लोक संगीत से उन्हें विशेष प्रेरणा मिली। साठ के दशक में, वे जनता के गायक नाम से मशहूर हो गये। वे युनाइटिड बैंक में नौकरी कर रहे थे और बीच-बीच में गीत लिखते रहते थे और गाते रहते थे। बंगाल की आने वाली पीढ़ियों को प्रतुल दा के गीतों ने जनता के शोषण और उनकी तकलीफ़ों से वाकिफ़ करवाया और साथ ही गरीब, मज़दूर वर्ग को सम्मान से जीने के लिये प्रेरित किया।
प्रतुल दा के बारे में दो डॉक्यूमेन्टरी़ फ़िल्म भी बनीं और दो पुस्तकें भी लिखी गईं। उनके गीतों के बीस से अधिक एल्बम रिलीज़ हुए जिन्होंने सत्तर के बाद की पीढ़ियों को जनता के जीवन के दुःख-सुख से अवगत करवाया। गली के नुक्कड़ से लेकर आलिशान सभग्रहों में उन्होंने गीत गाये। बांग्लादेश में उनके कार्यक्रमों को बहुत सराहा जाता था। उनका सबसे बड़ा कार्यक्रम बांग्लादेश में हुआ।
आज के दौर में उनके भाषण की एक पंक्ति बहुत सटीक लगती है – श्जब सारे विवादों से लोग थक चुके होंगे तब संगीत ही इन्सानियत के लिये खड़ा रहेगा। यह सच है कि मन की गहराइयों को छूने की जो ताकत संगीत में है वह किसी और माध्यम में नहीं है। जो भी लोग एक समतामूलक और शोषणरहित समाज बनाने के सपने को साकार करने में लगे हैं उनके लिये प्रतुल दा के गीत सुनना बहुत ज़रूरी है।
प्रतुल दा उन गिने चुने संगीतकारों में से थे जिन्हें राज्य सम्मान और बंदूकों की सलामी देकर विदा किया गया। वे निश्चित ही इस सम्मान के लायक थे और यह कहना गलत नहीं होगा कि आज़ादी के बाद के समय के, वे अपने देश के जन/विद्रोही संगीत की सबसे अहम् हस्तियों में से एक थे।
उनकी इच्छा अनुसार उनके शव को मेडिकल कॉलेज के शल्य विभाग को दान कर दिया गया जिससे छात्रों को सीखने में मदद मिले।
प्रतुल मुखोपाध्याय का गीत आलू बैचो को सुनने के लिए लिंक पर क्लिक करें – Alu Becho Chola Becho by Pratul Mukhopadhyay

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