डॉ. रिचर्ड टोप्पो एवं जेरोम जेराल्ड कुजूर:
पलामू व्याघ्र परियोजना दिन प्रतिदिन लातेहार ज़िले के आदिवासियों के लिए परेशानी का सबब बनता जा रहा है। दिनाँक 28 जनवरी 2025 को पलामू व्याघ्र परियोजना के एक उच्च अधिकारी, श्री प्रजेश जेना, द्वारा पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के समक्ष एक आवेदन जमा किया जाता है, जिसका संदर्भ लातेहार ज़िले में स्थित नवरनगो गाँव के पुनर्वास से सम्बंधित है। आवेदन में यह बताया जाता है कि नवरनगो गाँव पलामू व्याघ्र परियोजना के कोर क्षेत्र में अवस्थित है; अतः इस गाँव का स्वैक्षिक पुनर्वास बाघों के संरक्षण के लिए अति आवश्यक है। इसी क्रम में 4 अन्य गाँवों का नाम ज़िक्र किया जाता है – तनवई, पोलपोल, चापिया और टोटकी – जिनका पुनर्वास होना परियोजना के लिए आकांक्षित है। आवेदन में पुनर्वास और पुनर्वास हेतु चयनित जगह के लिए नवरनगो गाँव के ग्राम सभा की सहमति (रेजिस्टर की फ़ोटोकॉपी द्वारा) दिखायी जाती है। आवेदन में बताया जाता है कि नवरनगो गाँव के कुल 84 परिवारों में से 19 परिवारों ने पुनर्वास की सहमति जतायी है; इसका अप्रत्यक्ष बोध है की बाक़ी के 65 परिवार 15 लाख के एवज़ में नवरनगो गाँव से चले जाएँगे।
इससे पहले कि हम इन सभी जानकारियों की समीक्षा करें, यह आवश्यक है कि हम पलामू व्याघ्र परियोजना से सम्बंधित कुछ बातों को रखें। इस परियोजना की शुरुआत वर्ष 1974 में हुई, जिसके तहत एक निर्धारित वन क्षेत्र को बाघों के संरक्षण के लिए घोषित कर दिया गया। बाघों के इस निर्धारित क्षेत्र को कोर क्षेत्र और बफ़र क्षेत्र में विभाजित किया गया। कोर क्षेत्र को किसी भी मानवीय हस्तक्षेप से दूर रखने की बात कही गयी, ताकि यहाँ बाघ किसी भी बाधा के रह सके और शिकार कर पाए; वहीं बफ़र क्षेत्र की गतिविधियाँ सीमित रखी गयी। वर्तमान में पलामू व्याघ्र परियोजना के कोर क्षेत्र का कुल वर्ग 414.08 sq.km. है। राष्ट्रीय व्याघ्र संरक्षण प्राधिकार (NTCA) के अनुसार बाघों के उचित संरक्षण के लिए मानव-मुक्त कोर क्षेत्र का विस्तार 800-1000 sq.km. तक किया जाना है। NTCA के निर्देशानुसार, वे सभी गाँव जो कोर क्षेत्र में आते हैं, उनमें स्वैक्षिक पुनर्वास को बढ़ावा दिया जाएगा। इस पुनर्वास नीति के तहत, सम्बंधित गाँव वालों को पुनर्वास के लिए दो विकल्प प्रस्तुत किए जाएँगे:
- पहला, उन्हें 10 लाख (झारखंड में 15 लाख) की राशि दी जाएगी जिससे वे अपने पुनर्वास की व्यवस्था खुद कर लें;
- दूसरा, उन्हें दूसरे किसी गाँव में 5 एकड़ भूमि (एवं अन्य सुविधाओं) के साथ बसाया जाएगा। नवरनगो गाँव की पुनर्वास योजना इन्हीं सारी निर्देशों के अधीन है।
अब बात आती है समीक्षा की और इस क्रम में सबसे पहला मुद्दा है ‘कोर क्षेत्र’ का। ज्ञात हो की नवरनगो सम्बंधित इस आवेदन से पहले, पलामू व्याघ्र परियोजना के कोर क्षेत्र में प्रमुखता से 8 गाँव की सूची की जानकारी हुआ करती थी: लाटू, कुज़रोम, रमनदाग, हेनार, गुटवा, गोपखाड़, विजयपुर और पंडरा। वर्ष 2024, 19 जून को NTCA के एक उच्च अधिकारी द्वारा निर्गत एक औपचारिक पत्र में झारखंड के व्याघ्र परियोजना के कोर क्षेत्र में 35 गाँवों के होने की बात कही गयी। यह पहली बार था जब अधिकांश लोगों को परियोजना के कोर क्षेत्र में 8 से अधिक गाँव होने की बात पता चली। इससे सम्बंधित RTI NTCA को डाली गयी, परंतु विभागीय कश्मकश में यह RTI फ़ंसी रह गयी और बाक़ी 27 गाँव की जानकारी अनुपलब्ध नहीं होने पायी। आपको बता दें की इन 27 गाँव की सूची किसी भी सार्वजनिक मंच पर उपलब्ध नहीं है। यहाँ दो प्रश्न उठते हैं: पहला, ये 27 गाँव कौन से हैं और कहाँ-कहाँ स्थित हैं? और दूसरा प्रश्न, क्या ये 27 गाँव कोर क्षेत्र के हाल में बढ़ते दायरे के परिणामस्वरूप इस सूची में शामिल हुए हैं? अगर हाँ, तो क्या इन गाँवों को कोर क्षेत्र में शामिल करने की प्रक्रिया पूरी की गयी – क्या राज्य सरकार ने वन्य संरक्षण अधिनियम (2006 संसोधन) के भाग 4(i) के तहत इससे सम्बंधित अधिसूचना क्यों जारी नहीं की? अगर साधारणता पूछा जाय तो क्या ये 35 गाँव पलामू परियोजना के निर्धारित कोर क्षेत्र, जो की वर्तमान में 414.08 sq.km हैं, के अंदर आते हैं?
हमारी समीक्षा का दूसरा केंद्र पुनर्वास प्रक्रिया है। इस समीक्षा में हम तीन विषयों का ज़िक्र करेंगे। पहला, नवरनगो गाँव की पुनर्वास प्रक्रिया; दूसरा, कोर क्षेत्र के लाटू, कुज़रोम गाँव के पुनर्वास सम्बंधित समस्याएँ; और तीसरा, जैगिर गाँव का अनौपचारिक पुनर्वास।
नवरनगो गाँव में कुल 84 परिवार रहते हैं; जहाँ की कुल आबादी 176 है, जिसमें 123 बालिग़ लोग रहते हैं। नवरनगो के ग्राम सभा की रेजिस्टर के अनुसार गाँव के केवल पुनर्वास हेतु इच्छुक ग्रामीणों ने 10 सदस्यों की पुनर्वास समिति बनायी (जिसमें सचिव और उपाध्यक्ष गाँव के नहीं हैं – उनका नाम गाँव के लोगों की सूची में शामिल नहीं है)। इस रेजिस्टर में ये कहीं भी ज़िक्र नहीं है की ग्राम सभा ने 123 बालिग़ लोगों की आबादी में अपना न्यूनतम कोरम पूरा किया या नहीं; कहीं इस बात का ज़िक्र नहीं है कि ग्राम सभा ने पूरे मामले पर अपना क्या फ़ैसला लिया; इसमें कहीं इस बात का भी ज़िक्र नहीं है की जिन लोगों का पुनर्वास समिति में नाम नहीं है, क्या उन्होंने स्वैक्षिक पुनर्वास से इनकार किया या दूसरा विकल्प (15 लाख रुपए) स्वीकार किया। इस पूरे प्रकरण में जो बात सामने निकल कर आ रही है, वो यह कि ग्राम सभा की पहली बैठक जिसमें पुनर्वास विषय पर फ़ैसला होना था, वहाँ स्पष्टता की कमी है। इसके पश्चात, ग्राम सभा रेजिस्टर दिनाँक 11 जनवरी 2025 का ज़िक्र करता है जब गाँव वाले पुनर्वास होने वाली जगह का निरीक्षण कर अपनी सहमति जताते हैं। इस नोट पर कुल 23 लोगों के हस्ताक्षर हैं, जिसमें कुछ लोग एक ही परिवार के हैं। पुनर्वास सम्बंधित आवेदन के अनुसार कुल 19 परिवारों ने पुनर्वास के लिए हामी भारी है।
यहाँ सबसे गम्भीर प्रश्न उन लोगों से जुड़ा हुआ है जिन्होंने इस प्रक्रिया में भाग नहीं लिया है। प्रजेश जेना को यह स्पष्ट करना पड़ेगा कि क्या उनका आवेदन समुचित गाँव को ख़ाली करने हेतु है या फिर सिर्फ़ उन घरों को जो पुनर्वासित होना चाहते हैं। पिछले जितने भी पुनर्वास सम्बंधित आवेदन मंत्रालय को गए हैं, उनमें गाँव की सूची में स्पष्ट ज़िक्र रहता था की गाँव के कौन परिवार किस विकल्प को चुन रहे हैं (विकल्प 1 – गाँव ख़ाली करने के एवज़ में 15 लाख रूपए; विकल्प 2- पुनर्वासित होना)। परंतु नवरनगो के आवेदन में कहीं भी लोगों के द्वारा विकल्प का चुनाव दर्शाया नहीं गया है। इससे तार्किक संकेत यही निकलता है कि इस आवेदन के पीछे सम्पूर्ण गाँव की सहमति नहीं है। तो क्या नवरनगो को ख़ाली करने की प्रक्रिया ग़लत तरीक़े से हो रही है?
यह प्रक्रिया ग़लत है या नहीं, इसको जानने के लिए ज़रूरी है की इस कड़ी से जुड़े लाटू-कुज़रोम गाँव के पुनर्वास योजना को समझना। लाटू और कुज़रोम गाँव पलामू व्याघ्र परियोजना के कोर क्षेत्र में आते हैं। NTCA के निर्देशानुसार इन गाँवों को सवेक्षता से पुनर्वासित करने की प्रक्रिया शुरू की गयी। कुज़रोम गाँव की प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए, वहाँ के 120 परिवारों में से 70 परिवारों ने पुनर्वास (लाई और पैलापत्थल में) के समर्थन में हामी भारी। परंतु जब योजना को धरताल पर उतारने की बारी आयी तो विभाग द्वारा कई सारी बाध्यताओं का हवाला दिया गया – जैसे NTCA के खुद के निर्देश के विरुध वन विभाग ने पुनर्वास हेतु 5 एकड़ भूमि देने से मना कर दिया। इसके अतिरिक्त, लाटू कुज़रोम के आवेदन में पोलपोल गाँव का कोई ज़िक्र नहीं था; बात लाई और पैलापत्थल में पुनर्वास हेतु कुल 166 हेक्टर (औसतन 410 एकड़) की हुई थी। परंतु जानकारी आ रही है की लाटू कुज़रोम गाँव वासियों को पोलपोल में बसाने की कोशिशें की जा रही हैं। यहाँ सवाल उठता है की – 5 साल के उपरांत भी जब सरकार और वन विभाग ने लाटू-कुज़रोम के लोगों की पुनर्वास योजना के साथ न्याय नहीं किया तो फिर कैसे माना जाए की नवरनगो के आदिवासी समाज के साथ न्याय होगा?
इस कड़ी में आख़री ज़िक्र जैगिर गाँव का होना है। दिनांक 29 जुलाई 2025 को समाचार के माध्यम से पलामू व्याघ्र परियोजना के डायरेक्टर का वक्तव्य आता है की जैगिर गाँव के सभी 160 लोगों को पोलपोल में पुनर्वासित कर दिया गया है। ज्ञात हो कि जैगिर गाँव को पोलपोल में बसाने से सम्बंधित आवेदन केवल 9 दिसम्बर को परियोजना के एक उच्च अधिकारी, कुमार आशीष, द्वारा जमा किया जाता है। इस आवेदन के राज्य समीक्षा में ही पाया जाता है की इसमें कई सारे दस्तावेज़ – जैसे कि गाँव वालों की सूची, उनकी स्वीकृति – मौजूद नहीं है, और इस आवेदन को ‘अधूरा’ करार दिया जाता है। यह प्रक्रिया यहीं ठहर चुकी होती है। परंतु परियोजना के डायरेक्टर के बयान से पता चलता है की प्रक्रियों को अनदेखा कर गाँव वालों को पुनर्वासित कर दिया गया है। अहम सवाल यह उठता है कि – क्या पुनर्वास प्रक्रियाओं का कोई मायने है अगर उच्च वन अधिकारी यूँ ही इनको नज़रंदाज़ करते रहेंगे?
इन सभी प्रकरणों में सरकार की या वन विभाग की मंशा केवल बाघों के लिए ज़मीन उपलब्ध कराने पर टिकी हुई है। यह मंशा न केवल आदिवासी हित एवं विचारधारा के विपरीत है, बल्कि यह वन्य संरक्षण अधिनियम (1972), जिसका हवाला खुद NTCA देती है और वन अधिकार अधिनियम 2006 के संशोधन के विरुध है। इस क़ानून (संशोधन) के भाग 4(i) और 5(ii) के विपरीत है जिसमें यह स्पष्टता से लिखा है कि कोई भी कोर क्षेत्र सम्बंधित नीतियाँ आदिवासियों के अधिकार को क्षति नहीं पहुँचाएगी। क़ानून में इस बात का भी ज़िक्र है कि सरकार को आदिवासियों के साथ मिलकर यह तय करना होगा की आदिवासियों के कोर क्षेत्र में रहने से क्या वन्य जीवन पर गहरा असर पड़ता है। इन क़ानूनों के मूल में कहीं न कहीं आदिवासियों का प्रकृति के प्रति लगाव की स्वीकृति है। इनमें यह स्वीकृति है कि आदिवासी समुदाय इन कथित निर्धारित क्षेत्रों में बाघों (और अन्य प्राकृतिक सृष्टि) के साथ सदियों से रहता आ रहा है। परंतु वन विभाग के पुनर्वास नीतियों में ऐसी भावना की कमी छलकती है।
ऐसे में आदिवासी समाज की ओर से एक गम्भीर प्रश्न उठता है: जब सरकारी विभाग ही सरकारी प्रक्रियाओं की अनदेखी कर आदिवासी समाज को उत्पीड़ित करता है तो, ऐसी परिस्थिति में आदिवासी समाज क्या करेगा?

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