हम गरीब कैसे बने – 3 : महंगी पड़ी नमला को जुवार!

कुछ सुनी, कुछ आँखों देखी – अस्सी – नब्बे के दशक में पश्चिम मध्य प्रदेश के आलीराजपुर ज़िले में खेडुत मजदूर चेतना संगठ में काम करते करते, आदिवासियों के बीच रहते हुए, उनकी ज़िंदगी को गहराई से जानने, समझने का मौका मिला। यह कहानी नमला (नाम बदला हुआ) की है जो संगठन का सदस्य था। यह वृत्तान्त, नमाला से सुनी बातों पर और मैंने जो देखा उस पर आधारित है।

अमित:

नमला, पिता फूलसिंह। मूल गाँव पुवासा। पुवसा में खेती नहीं के बराबर थी। इसका पिता, छोटी गेन्द्रा में गाँव के जानवर चराने आ गया। गाँव के गोहरी बन गये। गोहरी का काम होता था गाॅंव के कुछ घरों के जानवर चराना और शाम को सबके घर जानवर वापिस पहुॅंचा देना। फिर गोहरी के घर का कोई व्यक्ति सब घरों में जाता था टोकरी और हांडी लेकर और सब लोग उसमें रोटी, घाट, दाल आदि जो भी खाने को होता था वह डाल देते थे। नमला तब बहुत छोटा बच्चा था। धीरे-धीरे नमला और उसके भाई-बहन छोटी गेन्द्रा के पटेल फलिया में ही इसके-उसके घर की रोटी खा कर, इसकी-उसकी बकरी, बैल, गाय चरा कर बड़े हो गये।

जिस झोंपड़ी में नमला और उसके चार भाई-बहन बड़े हुए वह लगभग आठ हाथ चौड़ी और दस-बारह हाथ लंबी होगी। झोंपड़ी की पूरी ऊँचाई 10 फुट होगी और दीवारें मात्र पांच फुट ऊंची। उसकी झोंपड़ी में बहुत थोड़ी सी ही जगह थी बीच की दीवार के पास, जहां हम सीधे खड़े हो सकते थे। ऐसे जिससे कहीं भी सिर न टकराये। छत चपटे वाले कवेलू और सागवान के पत्तों से ढकी थी।

जब नमला की शादी हो गई और दो-एक बच्चे हो गये तब नमला ने अपने घर वाली पहाड़ी के पीछे की ढाल पर अपना घर बनाया। घर बनाने के लिये नाकेदार को मुर्गी आदि खिलाई और चार-पाँच सौ रुपये भी दिये। नमला कुछ लोगों को भी जानता था, जिन्होंने संगठन की ताकत के बल पर बिना नाकेदार को पैसे खिलाये, घर बनाये थे। लेकिन नमला बहुत गरीब था और गरीब होने के साथ डरा हुआ तो था ही। फिर वो खास इस गाँव का तो था नहीं। यहां तो वो पटेल और कुछ मालदार आसामियों की भलमनसाहत के कारण कुछ ऊपर उठने की कोशिश कर रहा था। ये लोग तो हर काम नाकेदार दादा से पूछ कर, गिड़गिड़ाकर करवाते थे।

खास बात यह थी कि इनके सामने उसकी इतनी औकात ही नहीं थी कि वो कुछ राय रखे। उसने तो इन्हें बताया कि घर बनाना चाहता हूं। फिर पटेल आदि ने जो कुछ कहा वो उसने किया। 

खैर…। जैसे-वैसे अब घर तो बना लिया है नमला नें। अब आडी खूड़ी जाने के रास्ते में नमला का घर पड़ता है। एक बार हम आडी खूड़ी जा रहे थे ता रास्ते में रवाल सेठ मिले। नमस्कार वगैरा हुआ और पूछा कौन कहाँ जा रहा है, तो पता चला कि वो नमला के घर से आ रहा है। पीछे सेठ का एक चाकर, एक बैल ला रहा था। सोचा कि नमला से पूछा जाये कि रवाल मियां क्या करने आये थे। 

नाले से ऊपर टेकड़ी चढ़ कर नमला के घर पहुंचे। जानवरों के खूटे में तापने की जगह सुलगती हुई लकड़ियों के पास फैले मुर्गी के पंखों से कहानी का अंत तो पता चल गया। पहले तो नमला बोला कि रवाल मेहमान आया था। हम क्यों ऐसा बहाना मानने लगे! और कुरेदने पर पता चला कि वो बैल, जो रवाल के पीछे-पीछे उसका चाकर ले जा रहा था वो नमला का ही था। 

आगे की कहानी बड़ी सीधी-सादी है। खास मिर्च-मसाले वाली नहीं है। खेत में तो केवल तीन-चार महीने खाने को पूरी पड़ जाये, इतनी जुवार ही पकती थी। एक बार नमला ने रवाल सेठ से दो मन – 40 किलो – जुवार, उधार लाई थी। कई साल हो गये इसलिये ब्याज बढ़ गया। कुछ तो भर दिया पर इसी का कुछ पैसा बाकी रह गया था। अब बैल उसे देने के बाद सारा हिसाब बराबर हो गया। 

इसी बीच सेगा अंदर चूल्हे से अपनी धोती के किनारे से मुँह पोंछता हुआ निकला और नमला की लाडी उसकी परात लेकर आई। अपनी पतली लंबी मूंछों को हाथ से सेट करते हुए तापणे के पास बैठा। नमला ने उसे बीड़ी बनाकर दी। सेठ से बात करने के लिये सेगा को बुलाया था। शायद यह कुछ ब्याज कम करवा दे। लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं। सेगा ने केवल मुर्गा और दारू खतम करने में मदद की।

नमला ने तो बड़ी सीधी सी सुनाई। हमें भी समझ आ गया कि यह पूरी बात बताना नहीं चाह रहा। डर है कि हमें पता लगेगा और हम कुछ बखेड़ा खड़ा कर देंगे। नमला इस सब में नहीं फंसना चाहता था। लेकिन हम भी आदत से मजबूर थे। पूरी बात निकालनी तो थी ही। पूछते-पूछते, एक चाय, दो-तीन काचरे और काकड़ी के बाद पता चला कि अनाज लाये हुए करीब आठ-नौ साल हो चुके है।

इसके बदले नमला उसे, बीस किलो मक्का, एक साल कुछ मूंगफली, एक साल अरहर और करीब छः सौ रुपये दे चुका है। आठ-दस बार इसका चाकर आकर मुर्गे खा चुका है। अब इतना सब देने के बाद भी हिसाब पूरा नहीं हुआ, तो अब बैल खोल कर ले गया।

बताते हुए नमला के मन की निराशा और हताशा को वो छुपा नहीं पाया। मेरा इतना कहना था कि यह जुवार तो तुम्हें सौ रुप्ये किलो से भी ज़्यादा की पड़ गई। और नमला का बांध फूट गया। दुखड़ा सुनाने लगा और कोसता रहा ज़माने को।

खेत में अच्छा पक भी जाये तो कैसे ऊपर उठें नमला जैसे लोग? फिर कमायेगा। फिर कर्ज़ लेगा। फिर से कमाकर कर्ज़ का ब्याज भरता रहेगा।

Author

  • अमित, सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं और मध्य प्रदेश के बड़वानी ज़िले में एक वैकल्पिक शिक्षा के प्रयोग पर शुरू हुआ स्थानीय स्कूल - आधारशिला शिक्षण केन्द्र चलाते हैं।

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