भूमिहीन नहीं थे हम पहले

अमित:

ये कहानियाँ 1997 में पश्चिम चंपारण ज़िले में गाँव की मीटिंग में सुनीं थीं।

स्कूल के कमरे में एक दिवसीय मीटिंग के लिये इकट्ठे हुए लगभग सभी लोग भूमिहीन, दलित परिवारों से थे। उनसे पूछा कि क्या उनके परिवार बहुत पहले से ही भूमिहीन थे या पहले ज़मीनें थीं और किसी कारणों से उनके हाथ से निकल गईं? सभी लोगों नें वही बात कही जो उन्हे बचपन से पता ही थी कि पहले से ही उनके परिवारों के पास कोई ज़मीन नहीं थी। बैठे लोगों में से किसी के दादा दादी वाली पीढ़ी के पास भी ज़मीन नहीं थी। सभी यही बता रहे थे। जैसा मीटिंगों में होता है, लोग पूछने वाले को उत्तर नहीं देते, धीमी आवाज़ों में एक दूसरे को बताते रहते हैं।

जब तक हम इस निष्कर्श पर पहॅुंच ही रहे थे कि किसी की ज़मीन नहीं थी शुरू से ही तभी एक बूढ़ा बाबा ज़ोर से डांटते हुए से स्वर में कुछ बोला। सब लोग अपनी खुसर फुसर बंद करके उनकी ओर देखने लगे और फिर औपचारिक रूप से किसी ने उन बूढ़े व्यक्ति से कहा उनकी बात बताने को।

बाबा ने काफ़ी तेज़ आवाज़ में, थोड़ा गुस्से में ऐलान किया कि ज़मीनें थीं। पहले हमारे बाप दादाओं के पास ज़मीनें थीं। उनके होठ कॉंप रहे थे। बोलते हुए जैसे उनकी ऑंखों के आगे गॉंव के खेत दीखने लगे। वो हाथ के इशारों और संकेतों से बताने लगे कि पश्चिम की ओर, जो फलाने की ज़मीन के आगे, फलानी जगह वाला खेत है वो किसके परिवार का खेत था। और इसी तरह वहॉं बैठे लोगों को इशारा करके बताने लगे कि कौनसा खेत किसके परिवार वालों के पास था। एकदम स्पष्ट था कि वहॉं बैठे लोगों में से किसी भी, चालीस से कम उम्र वाले ने यह बात नहीं सुनी थी। बाबा ने बीघा भी बताये। फलाने की चार बीघा थी….. तुम्हारे परिवार की तीन बीधा थी और उनके खुद के बापदादाओं के पास सात बीघा ज़मीन थी, ऐसा उन्होने बताया। हमारी ज़मीने थीं। हम भूमिहीन नहीं थे। ये खिड़की के बाहर जो ज़मीन का टुकड़ा दीख रहा है जिसपर मेरे पोते, बहुएँ और हम एक किलो धान के लिये दिनभर कींचड़ में गड़े रहते हैं, वो हमारे ही बूढ़ों की ज़मीन थी। यह कहते हुए बाबा नें अपनी बात पर एक निर्णायक विराम लगाया।

वहॉं बैठे, अधिकतर बीस से तीस साल के बीच वाली उम्र के लड़के थे। सभी चुप हो गये। चुप क्या सुट्ट हो गये। सब स्तब्ध थे। अचानक जैसे सबको करन्ट का झटका लगा हो इतिहास के इस छोटे से टुकड़े से। फिर खुसर फुसर शुरू हो गई लेकिन इस बार आवाज़ें थोड़ी उॅंची थीं। आवाज़ों में थोड़ी गर्मी आ गई थी। शरीरों में बेचैनी झलक रही थी। हताशा, चिढ़ और फिर गुस्सा स्वाभाविक था। अपने ही बाप दादाओं की ज़मीनों पर ये लोग मज़दूरी कर रहे थे। साथ ही बड़े लोगों की गालियॉं सुनते थे और बदले में दिन भर के बाद एक – डेढ़ किलो धान मिलता था। अब तक ये लोग तो यही समझ रहे थे कि ये ज़मीनें बड़े लोगों की हैं और इनके परिवार सदा से भूमिहीन ही थे।

खुसफुसाहट जब कम हुई तो इस खीज से यह स्वाभाविक सा प्रश्न निकला कि फिर हमारे बुढ्ढों के हाथ से यह ज़मीन चली कैसे गई? हॉं, हॉं कैसे चली गई, यह सब सुनना चाहते थे। किसके पास चली गई, यह तो सभी को पता था।

अगर मगर लेल चित, सेठ जी लेल खेत – यह कहते हुए एक बुज़ुर्ग नें अपनी बात कही शुरू की –
किसी काम के लिये चार सौ रूप्ये चाहिये थे। गये, घर से बगहॉं बाज़ार गये, सेठ जी के घर पैसे उधार लेने।
कब लोगे पैसे? सेठ जी ने पूछा। भट्टी पर जाकर वापिस आओगे तब लोगे या लेकर भट्टी पर जाओगे?(शराब की भट्टी की बात थी) लो दस रूप्ये और पहले भट्टी पर जाकर आओ नहीं तो भट्टी पर लूटा दोगे और कहोगे कि दिये ही नहीं।

पता नहीं पैसे भट्टी से आकर लिये या लेकर भट्टी पर गये लकिन घर आये, कमीज़ उतार कर खूॅंटी पर टांगी और खटिया पर पड़ गये। पिये हुए थे और थके हुए भी थे तो तुरन्त ऑंख लग गई। जब उठे तब कमीज़ की जेब टटोली तो देखा कि दो सौ ही हैं उसमें। यह सोच कर कि घर में ही किसी ने निकाले होंगे, लड़कों को और बीबी को बहुत पीटा।

फिर भी जब पैसे नहीं मिले तो वापिस गये पाठक जी के पास और कहा कि जेब में तो दो सौ ही थे। चार सौ नहीं थे। सेठ जी लपक कर बोले, “देखा, कहा था ना कि दारू मत पी नहीं तो मुझे ही गाली देगा। अब मुझे ही चोर बना दिया न तूने। मैने तो तेरी मदद करने को पैसे दिये अब तूने मुझपर ही लाद दिया। देख ले रजिस्टर में क्या लिखा है? देख, चार सौ लिखा है और तेरी साही भी है। जा घर जाकर देख, वहीं कहीं गिर गये होंगे पैसे।”

वापिस तो चला गया लेकिन तभी से उसका दिमाग कुछ ढीला हो गया। चिंता हो गई कि अब कहॉं से भरा जायेगा चार सौ रूप्या। और जिस काम के लिये थे उसमें तो चार सौ लगने थे। दो सौ में वह काम भी नहीं पूरा होगा।

दो चार साल में थोड़ा थोड़ा पैसा वापिस किया सेठ जी का लेकिन जब हिसाब किताब किया तो ब्यज जोड़ कर बहुत बाकी निकला। लोगों नें समझाया कि ज़मीन जरपेस रख दो (गिरवी रख दो)। सेठ भी मान गये, कर्ज़ के बदले ज़मीन जरपेस रखने के लिये।

चार साल बाद गये ज़मीन छुड़वाने तो सेठ नें कहा, “पागल हो गया है क्या? ज़मीन बेच कर अब कह रहा है जरपेस रखी थी! ये देख तेरे कागज़। ज़मीन बेची है तूने। लिखा है और तेरी साही है इस पर। जरपसे बोलना भी आता है तुझे? बोल के दिखा ज र पे स। यदि बोल सकेगा जरपेस तो तेरी ज़मीन दे दूॅंगा।” लेकिन वो बोल नहीं पाये। ज र … पर अटक गये और सेठ ने ज़मीन वापिस नहीं की। चिंता के कारण उनका माइन्ड लूज़ हो गया था, शायद इसी लिये नहीं बोल पाये।

इस तरह से सेठ नें बहुत से लोगों के साथ किया था। यह कहावत ही बन गई गॉंव में – अगर मगर लेल चित, सेठ बाबा लेल खेत।

एक और बुज़ुर्ग नें एक और कहानी सुनाई।

ऐसा कहते हैं कि जंगल साफ़ करके हमारे ही बाप दादाओं नें खेती निकाली थी। कई सालों की मेहनत के बाद सब पत्थर और पेड़ों के ठॅूंठ आदि साफ़ हो गये। अच्छी खेती बन गई। फिर एक साल ऐसा हुआ कि गॉंव में बहुत बीमारी चल गई। तो बाबाजी लोगों नें यह बात चलाई कि जंगल में भूत पिशाच रहते हैं उन्ही के कारण यह सब हो रहा है। फिर यह बात चली कि क्योंकि कुछ लोगों ने जंगल काट दिया है इसी लिये यह सब हो रहा है। जंगल कट जाने से भूतों के रहने की जगह नहीं रही, वे लोग डिसटर्ब हो गये हैं और इसीलिये वे उधम मचा रहे हैं। इसी कारण से बीमारी चल रही है।

यह बात बहुत फैल गई और इसी के चलते हमारे बाप दादाओं नें वो ज़मीन छोड़ दी और कहीं चले गये। खुद क्या गये होंगे भगा दिया होगा। पहले से ही सोटा चलता था। बीमारी ख़त्म होने के बाद वापिस आये तो देखा कि बाबाजी लोगों नें उन खेतियों पर कब्ज़ा कर लिया था।
फिर?
फिर क्या! हो गई बात पूरी। गई ज़मीन। यही तो पूछे थे न!

इन कहानियों को सुनने के बाद उपजी निराशा से जब सब लोग उबरे तो बात चल रही थी कि अब अपने परिवारों की दशा सुधारने के लिये क्या किया जा सकता है? यह बात चल ही रही थी कि मोटरसाइकलों की आवाज़ सुनाई दी और लोगों की बातचीत का स्वर पहले कुछ हल्का हुआ और फिर फुसफुसाहट में बदल गया। थोड़ी देर के बाद मोटरसाइकलों की आवाज़ हमारे भवन के दरवाज़े पर आकर बंद हो गईं और कुछ बड़े हट्टे कट्टे चेहरे खिड़कियों की सलाखों से अंदर घूरते हुए नज़र आये। कंधे पर बंदूकें थीं। इन ऑंखों नें कमरे में बैठै हर व्यक्ति को घूरा जैसे उनके चेहरे कैमरे में कैद कर रहे हों। लेकिन लोग खुसर फुसर करते रहे अपने डर पर काबू पाने के लिये। एक दो लोगों नें उन्हे कुछ बताया कि सरकारी योजनाओं के बारे में जानकारी दी जा रही है। थोड़ी देर में पूरे कमरे में बैठे लोगों पर गड़ी हुई नज़र घुमा कर और एक दो लोगों को नाम से कुछ बोलते हुए वे लोग चले गये।

हमारी मीटिंग भी थोड़ी देर में समाप्त हो गई। इनमें से अधिकतर लोगों कि ज़िंदगियाँ आज भी इधर उधर मजदूरी से चल रही हैं। इनकी खेतियों पर कहीं कहीं शक्कर के कारखाने लग गए। बड़े लोगों ने मिल वालों को ये ज़मीनें बेच दीं। इनमें से कुछ दलित परिवारों के बच्चे इन मिलों में बंधुआ मजदूरी करते हैं।

Author

  • अमित, सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं और मध्य प्रदेश के बड़वानी ज़िले में एक वैकल्पिक शिक्षा के प्रयोग पर शुरू हुआ स्थानीय स्कूल - आधारशिला शिक्षण केन्द्र चलाते हैं।

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