पूर्वी राजस्थान में किसान आंदोलन

मनोज कुमार मीणा

किसान आंदोलन सतलज, सरस्वती, इंदिरा गाँधी नहर के मैदानी इलाक़े से होता हुआ अरावली की पहाड़ियों के बीच पहुँच चुका था। विशाल किसान महापंचायतें, बढ़ते धरने प्रदर्शन और गाँव – देहात के लोगों के बीच चल रही डिबेट से पूर्वी राजस्थान के किसानों की सक्रियता का अंदाज़ा लगाया जा सकता था। हालाँकि किसान आंदोलन ने पूरे देश का डिबेट बदल कर रख दिया। किसान आंदोलन के दूरगामी प्रभाव को देखते हुए कई राजनीतिक दल एनडीए गठबंधन से अलग हो गए। उत्तरप्रदेश के चुनाव में दिख रहे भारी नुक़सान का आकलन सत्ताधारी पार्टी के बुद्धिजीवियों ने कर लिया होगा, फलस्वरूप पहली बार मोदी सरकार ने कदम पीछे लिए है। अहिंसक – लोकतांत्रिक रूप से संचालित किसान आंदोलन ने लोकतंत्र को मज़बूत किया है। पूंजीवाद के ख़िलाफ़ किसान सीना ताने खड़ा है। विपक्ष को मज़बूत करने का काम भी किसान आंदोलन ने बड़े पैमाने पर किया है।

26 जनवरी की ट्रेक्टर परेड के बाद लगने लगा था कि किसान आंदोलन कुचल दिया जाएगा। लेकिन ग़ाज़ीपुर बोर्डर पर भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत के आँसुओं ने किसान आंदोलन को भावुक कर दिया, और किसान आंदोलन में नई जान भर दी। इसी के साथ पूरे पूर्वी राजस्थान के युवा साथियों ने प्रत्यक्ष रूप से किसान आंदोलन में भाग लेना शुरू कर दिया था।

राजस्थान-दिल्ली बौर्डर शाहजहाँपुर पर राजस्थान का किसान आंदोलनरत है। संकीर्ण मानसिकता के लोग आज भी इस आंदोलन को क्षेत्रिय आंदोलन, कुछ जाति विशेष का आंदोलन बताते रहे है। यहाँ तक की किसान आंदोलनकर्मियों पर ख़ालिस्तानी का टैग लगाने की कोशिश हुई। हालाँकि यह पहली बार नहीं है, आंदोलनरत आदिवासी पर नक्सली, मुस्लिम पर आतंकवादी का टैग लगाकर तत्कालीन सरकारें दमन करती रही हैं। हाल ही में प्रधानमंत्री ने आंदोलनकारियों को आंदोलनजीवी कहा, जिसकी पूरे देश में निंदा हुई।

पूर्वी राजस्थान का किसान शुरूआत से ही किसान आंदोलन के पक्ष में रहा है। 26 जनवरी को टोडाभीम में निकाली गई किसान ट्रेक्टर रैली और 1 फ़रवरी को मीणासीमला (दौसा) में किसान महापंचायत के आयोजन के साथ पूर्वी राजस्थान का किसान, किसान आंदोलन में सक्रिय रूप से सम्मिलित हुआ। मीणासीमला महापंचायत में निर्णय लिया कि 7 फ़रवरी को पूर्वी राजस्थान का किसान शाहजहाँपुर बौर्डर कूच करेगा, फलस्वरूप सैकड़ों किसान शाहजहाँपुर बौर्डर पहुँचे। टोडाभीम के 80 वर्षीय किसान लोहड़ेराम शाहजहाँपुर बौर्डर से कहते हैं, ‘मोदी हमारी ज़मीन कू लेबा डौलै, या लड़ाई लम्बी चलेगी। पीछै हटबाड़ा क़ुन, गोली चलेगी हम गोली खाएँगे’ । मीणासीमला किसान महापंचायत के बाद पूर्वी राजस्थान में अजनोटि, नांगल राजावतान,झालाटाला एवं भैरो बाबा की धरती करीरी में विशाल महापंचायत आयोजित हुई। 20 फ़रवरी को पचवारा के सैकड़ों किसानों ने शाहजहाँपुर बौर्डर पर कूच किया, आंदोलन को मज़बूत किया।

आंदोलन में  आदिवासी – किसानों की सांस्कृतिक महक 

आदिवासी – किसान क़ौमें सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से मज़बूत क़ौमें हैं। पूर्वी राजस्थान का किसान शाहजहाँपुर बौर्डर के लिए निकला तो रास्ते में नाचते-गाते हुए पहुँचा। किसान अपने साथ मजीरे, ढप, नौबत आदि लेकर पहुँचा। शाहजहाँपुर बौर्डर पर कई गाँवों की जोठो (गाँव के लोगों का समूह) ने कन्हैया दंगल का प्रदर्शन भी किया। एनडीटीवी के प्रोग्राम प्राइम टाइम में रविश कुमार ने उक्त सांस्कृतिक प्रोग्रामों को उचित जगह दी! शाहजहाँपुर आंदोलन स्थल पर गाए गए मीणागीत कुछ इस प्रकार है :-

‘उड़तो आवै धोड़ो तोलियों शाहजहाँपुर बोडर पै’

‘धोड़ा तोलियाँ नै जाम लगायो शाहजहाँपुर बोडर पै’

‘मोदी शाहजहाँपुर पै आ जाज्यो लड़ैंगा कुश्ती’

‘तौनै लेणा पड़ैंगा काड़ा बिल मोदी की सरकार, शाह की सरकार

सरकार ने इंटरनेट बंद कर दिया। संचार के साधनों की एकरूपता बढ़ती चली गई। इसी बात पर हंसते हुए पीलोड़ी गाँव के मेडिया पूरण कहते है ‘इंटरनेट का पूरा 20 वर्षों का इतिहास है। सरकारें जो बंद करना चाहे, शौक़ से करें, हम तो आदिवासी है ढप – नौबत की आवाज़ से इकट्ठा हो जाएँगे। सरकार को जगाने के लिए भी ढप- नौबत ज़रूरी है।’

किसान आंदोलन में आदिवासी – किसान महिलाएँ 

पंजाब-हरियाणा में महिलाओं की भागीदारी किसान आंदोलन में बड़े पैमाने पर रही है। पूर्वी राजस्थान की आदिवासी महिलाओं ने भी किसान महापंचायतों में खूब भाग लिया। सवाईमाधोपुर ज़िला मुख्यालय पर किसान अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे जिसमें महिलाएँ बड़ी संख्या में शामिल हुईं। फलस्वरूप 28 फ़रवरी को पूर्वी राजस्थान की महिलाएँ हुकुम मीणा के नेतृत्व में शाहजहाँपुर बौर्डर गईं। महिलाओं का इस तरह से बढ़ चढ़कर भाग लेना दर्शाता है कि महिलाओं का सशक्तिकरण भी किसान आंदोलन ने किया है।

किसान आंदोलन और आदिवासी

किसान आंदोलन को व्यापक और मजबूत बनाने के लिए ज़रूरी है कि किसान क़ौमों को आदिवासियों के मुद्दों को समझना पड़ेगा। अनूसूचि पाँच और छः को समझना पड़ेगा। छत्तीसगढ़ के बस्तर में आए दिन मानवाधिकार का खुला उल्लंघन हो रहा है। निर्दोष आदिवासी मारे जा रहे हैं। सिलगेर में सीआरपीएफ़ कैम्प लगाने का शांतिपूर्ण विरोध कर रहे आदिवासियों पर गोलियाँ चलाई गई, जिसमें 4 आदिवासी मारे गए जिसमें एक गर्भवती महिला भी शामिल थी। घटना के बाद विरोध बढ़ता गया, मीडिया को स्थानीय आदिवासियों ने कहा की मरने वाले किसान है । सुकमा और बीजापुर के आदिवासियों ने दिल्ली में बैठे किसान नेताओं को संदेश भेजा की आप हमसे जुड़िए। हमारे साथ खड़े होइए। लेकिन……… । हालाँकि  राजस्थान,गुजरात,मध्यप्रदेश,महाराष्ट्र,झारखंड,छत्तीसगढ़,उड़ीसा के आदिवासी एक हुए और सोशल मीडिया से बस्तर की घटनाओं का विरोध किया। ये एक अच्छा संकेत था! किसान आंदोलन में मध्यभारत के आदिवासियों ने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से भाग लिया। किसान आंदोलन को अगर और मज़बूत करना है तो किसान आंदोलन में सक्रिय उत्तर भारत के किसानों को भारत के आदिवासियों के जल-जंगल-ज़मीन से संबंधित मुद्दों को समझना ही पड़ेगा।

हालाँकि पूर्वी राजस्थान में छोटे किसान है। किसान आंदोलन का क्षेत्रिय होना, आंदोलन की सबसे बड़ी मज़बूती है। क्योंकि जैसे किसी आंदोलन का लोकलाईजेसन होता है वह आंदोलन रचनात्मक और सांस्कृतिक रूप से मजबूत होता चला जाता है । तीनो कृषि क़ानून, एमएसपी पर क़ानून बने आदि के साथ किसान से संबंधित मुद्दों पर किसान एक साथ लामबंद होने लग गया था। फलस्वरूप हाल ही में केंद्र सरकार ने तीनों कृषि बिल वापस लेने की घोषणा की है। इसके साथ ही आंदोलनरत किसान एमएसपी पर क़ानून, आंदोलन के दौरान हुई शहादतों, आंदोलनकारियों पर दर्ज मुक़दमें वापस हो आदि पर संयुक्त किसान मोर्चा विचार करने लगा है। और आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए रणनीति बनाई जा रही है।  

सबसे ख़ास बात किसान आंदोलन की यह है की किसानों का नेतृत्व, आंदोलन का नेतृत्व खुद किसानों ने सामूहिक रूप से किया। सामूहिकता सफ़लता की पहली शर्त है। सामूहिक नेतृत्व से किसान आंदोलन मज़बूत – स्थाई – विविधता से परिपूर्ण रहा। स्थानीय बोली – भाषा के अलग – अलग नेतृत्वकर्ताओं ने किसान आंदोलन को खांटी बनाया। नायकवाद से पूरी तरह दूर किसान आंदोलन को नज़दीक से देखने से पता चलता है कि किसान आंदोलन अपने आप में अनूठा आंदोलन है। स्वाभिमानी आंदोलन है। ज़िंदा क़ौमों का ज़िंदा आंदोलन है।

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  • मनोज राजस्थान के दौसा ज़िले से हैं। इनके इलाके को प्राचीन मत्स्या भूमि भी कहा जाता है। ये अभी MSW कि पढ़ाई कर रहे हैं।

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