अंतरसिंग निगवाले: मैं संघर्ष से नहीं डरतामैं भारत का आदिवासी हूँ।मैं प्रकृति की आंचल में रोज जीता हूँ।अपनी सांस को… READ MORE
तन्नु: मैं प्रकृति बनना चाहती हूँ,इसे करीब से समझना चाहती हूँमहसूस करनी है मुझे इसकी पीड़ा,इसलिए प्रकृति के रूप में… READ MORE
नरेश बिस्वास: जैव विविधता की चुनौती आज पूरी दुनिया में है। कुछ जैव विविधता तो इस धरती से लुप्त हो… READ MORE
जगदीश सिंह सरदार: अस्तित्व में अवस्थित प्राकृतिक पंच तत्वों से हमारी सृजन हुई है।इसी कारण गर्व से हमे प्रकृति से… READ MORE
आफाक: विकास की बयार में घर, मकान और दुकान के साथ बहुत कुछ उजड़ रहा है। हमारा गाँव पहाड़गंज घोसियाना… READ MORE
ଜାକିଣ୍ଟା କେର୍କେଟା : ମା!ତୁ ଏମିତି ରାତିସାରାକାହିଁକି ଅପେକ୍ଷା କରୁଛୁ?ମହୁଲ ଫୁଲ ଗୁଡ଼ିକ ତଳେପଡ଼ିଲା ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ!ଗଛରୁ ଛିଣ୍ଡାଇ ଆଣି ଦେଉନୁ! ପ୍ରଶ୍ନ ଶୁଣି ମା କହେ,ଇଏ ରାତି… READ MORE
नरेंद्र तिवारी: भवानी प्रसाद मिश्र दादा की कविता “सतपुढा के घने जंगल याद करते हुए” इस धरा के घने जंगलजाने… READ MORE
मैं प्रकृति हूँ…आओं मुझे संवार लोमैं सुरक्षित रहूंगी तोतुम संरक्षित रहोगे। मैं प्रकृति हूँ…मैं सदियों से लालन-पालन करते आ रही… READ MORE
युवानिया पत्रिका, युवाओं को उनकी सोच को कलमबद्ध करने का एक मंच देने का प्रयास है। इस पत्रिका के माध्यम से हम मुख्यतः युवा मन के विचारों को सामने लाना चाहते हैं। साथ ही आस-पास के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिदृष्य पर युवाओं के विचारों को भी साझा करना चाहते हैं।
Designed with WordPress