इस धरा के घने जंगल

नरेंद्र तिवारी: भवानी प्रसाद मिश्र दादा की कविता “सतपुढा के घने जंगल याद करते हुए” इस धरा के घने जंगलजाने कैसे बने जंगलखूब सुंदर खूब

Continue reading

प्रकृति पुकारे…!

मैं प्रकृति हूँ…आओं मुझे संवार लोमैं सुरक्षित रहूंगी तोतुम संरक्षित रहोगे। मैं प्रकृति हूँ…मैं सदियों से लालन-पालन करते आ रही हूँ।मैं “प्रत्याशाओं” से भरी हूँ…मुझ

Continue reading

ज़िंदगी में रिश्तों की अहमियत

गोपाल पटेल: इस दुनिया में रिश्ते बनाना आसान है, लेकिन रिश्तों को निभाना बहुत कठिन है। जो इसकी अहमियत जानता है , वही इसे इत्मिनान

Continue reading

बस एक दिन…!

पावनी: छूना है आसमान, उन उड़ते परिंदों की तरह,मुझे भी एक दिन..।  उन छोटी-बड़ी मछलियों की तरह,देखनी है सागर की गहराइयाँ,मुझे भी एक दिन..। उन छोटे-बड़े

Continue reading

प्रकृति से ही लिया है, तो उसे लौटाना पड़ेगा

अजय कन्नौजे: प्रकृति से ही लिया है, तो उसे लौटाना पड़ेगा, प्रकृति से ही जीवन है, तो उसे मनाना पड़ेगा। संघर्ष से ही जीत है,

Continue reading

1 2