तन्नु:
मैं प्रकृति बनना चाहती हूँ,
इसे करीब से समझना चाहती हूँ
महसूस करनी है मुझे इसकी पीड़ा,
इसलिए प्रकृति के रूप में ढलना चाहती हूँ,
मैं प्रकृति बनना चाहती हूँ।
ले सकूं तो लूं नन्ही पत्ती का आकार
लदी रहूं पेड़ों पे इठलाके, मानो सोई हूँ इसे गले से लगा के
मुझे सहारा देने के लिए करूँ प्रकट पेड़ों का आभार
और जब आए पतझड़ तो इनका दामन छुड़ाकर,
पवित्र भूमि पर गिरना चाहती हूँ।
नन्ही-सी पत्ती का भी जानूं दर्द मैं,
मैं गिरके मिट्टी में मिलना चाहती हूँ,
मैं प्रकृति बनना चाहती हूँ।।
हो सके तो मै फूल बन जाऊं
खुद तो महकूँ ही, पर्यावरण भी महकाऊँ
और जब तोड़े मुझे कोई डाल से,
तभी तो फूलों का दर्द समझ पाऊं।
वैसे फूल भी तभी तक ही पसंद है सबको
जब तक वे तोड़ नहीं दिए जाते।
अजब प्रेम है ये फूलों के लिए
जैसे ही मुरझाऊं, पैरों में कुचली जाऊं
मैं फूलों पर हुए आघात को समझना चाहती हूँ
मैं प्रकृति बनना चाहती हूँ।।
जल का विकल्प हो तो मैं जल का रूप पाऊं
निकलूं पर्वतों से, पहाड़ों को चीरते हुए
और दूसरी नदियों में विलीन हो जाऊं,
खो दूँ अपना अस्तित्व मैं,
जिसमें जा मिलू उसके नाम से जानी जाऊं,
मैं जल की निरंतर यात्रा की साक्षी बनना चाहती हूँ,
बाहें खोल इसके हर अनुभव को अपनाना चाहती हूँ,
मैं प्रकृति के कण-कण में समाना चाहती हूँ,
मैं प्रकृति बनना चाहती हूँ।।

Leave a Reply