सिम्मी:
नेचुरल इन्वाइरन्मन्ट एजुकेशनल रिसर्च सेंटर (NEER), लोधगल्ला, मुक्तेश्वर के साथ हम लोग शैक्षणिक भ्रमण के लिए गए। उत्तराखंड का सफर फैजाबाद से शुरू हुआ और लखनऊ स्टेशन होते हुए हम लोगों ने काठगोदाम एक्सप्रेस ट्रेन लेते हुए, हम सभी साथियों ने काठगोदाम तक का सफर तय किया। उत्तराखंड जाने के एक्साइटमेंट में पूरी रात साथियों ने खूब बातचीत किया। सफर का मजा लिया, अपने घर-परिवार, दोस्तों के संबंध में सारी रात साथियों के बीच बातचीत होती रही। आगे का सफर हमने ट्रैवलर से किया। हम 18 साथी 4 तारीख से 9 तारीख तक इस सफर में शामिल हुए, जिसमें 6 बच्चे भी शामिल थे। काठगोदाम से हम लोग गोपाल भाई के गाँव लोधगल्ला के लिए निकले। इस दौरान सभी ने ऊंचे-ऊंचे पहाड़, और बादल देखे। यह सफर शुरू से ही चुनौतियों से भरा रहा। कई साथियों को सफर की शुरूवात से ही उलटी और चक्कर आने का सिलसिला शुरू हो गया था। इससे हमारी गाड़ी थोड़ी-थोड़ी दूरी पर रुकती थी और सफ़र रुक-रुककर तय हुआ।
एक बात मुझे यह भी समझ में आई की सफर ना करने और बाहर निकलकर ज्यादातर समय ना बिताने की वजह से भी मुझे और अन्य साथियों को समस्या हो रही थी। लगभग ज़्यादातर साथियों का उत्तराखंड का यह पहला भ्रमण था। वह लोग काफी एक्साइटेड थे। जैसे लग रहा था कि बादल हमें छू रहा है। ऊंचे-ऊंचे पहाड़, हरे-हरे पहाड़, इतने खूबसूरत लग रहे थे कि मन कर रहा था कि पूरे समय उन्हें देखते ही रहे। रास्ते में हम लोगों को टी गार्डन भी दिखा। उसे बहुत खूबसूरत तरीके से उगाया गया था। उसकी अपनी ही खूबसूरती थी और बहुत ही खूबसूरत तरीके से उसको मेंटेन भी किया जा रहा है। वहाँ से निकलने के बाद हम लोग लोधगल्ला गाँव, मुक्तेश्वर पहुँच गए। हम लोग वहाँ पर लगभग 4 बजे शाम में पहुंचे थे और वन पंचायत संघर्ष मोर्चा के साथियों से मिले। जिन्होंने उत्तराखंड के इतिहास के बारे में बताया और बताया कि वहां किस तरह से टूरिस्ट प्लेस की व्यवस्था चलती है। उन्होंने बताया पानी को किस तरह से वह स्टोर करते हैं और उन्होंने किस तरह जल, जंगल, जमीन की लड़ाई लड़ी और वह किस तरह से अब वह कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद स्ट्रक्चर फॉर्म में अपने कामों को एक तौर-तरीके से संचालित कर रहे हैं।

वाटरफॉल जो एक टूरिस्ट प्लेस है उसका भ्रमण हम सब साथियों ने किया। काफी सुंदर जगह है और स्ट्रगल तो बहुत ही देखने को मिलता है। चार-चार किलोमीटर, तीन-तीन किलोमीटर दूर लोग पैदल चलते हैं और अपनी जरूरत की चीज लेकर आते हैं। जैसा कि उत्तराखंड में कभी भी बारिश हो जाती है, पानी की कोई कमी नहीं है, पर पीने का पानी 3 किलोमीटर दूर जाकर लाना पड़ता है। वह भी पतले- पतले रास्ते से महिलाएं और बच्चे पानी लेने जाती है। उनके चेहरे पर कभी भी कोई दिक्कत परेशानी नहीं दिखी। इन चार दिनों में मैंने ऐसा महसूस किया कि वह अपने कामों को पूरा मजा लेकर करते हैं। उनका जीवन बहुत आरामदायक है। जीवन में कोई भी भागा-दौड़ी नहीं है।

हमारी मुलाकात वहां पर तरुण दा से भी हुई, जिन्होंने काफी लंबे समय जल, जंगल और जमीन की लड़ाई उत्तराखंड में लड़ी है। उन्होंने बताया की वह किस तरह काम करते हैं। लड़ाई लड़ने के दौरान उन्होंने वहां के लोगों को अपने साथ जोड़ा, समुदाय के लोगों ने उनका भरपूर साथ दिया और जहां पर लोग जमीन से जुड़कर काम करते हैं उस काम में सफलता भी मिलती है। काफी लंबे, पतले रास्ते पर हमारे साथियों में बहुत मजे से और आराम से सफर को तय किया। वहां पर औरतों और लड़कियां ज्यादातर मजदूरी का कार्य करती है। यहाँ सड़क बनाने वाले मजदूर-महिलाएं नेलाप से आकर काम कर रही हैं। उत्तराखंड में रोजगार का अवसर बहुत कम हैं। जो लोग यहाँ पर लिख-पढ़ लेते हैं वह शहर की तरफ पलायन करने के लिए सोचते हैं। और क्यों ना करें जब वहां पर कोई भी इस तरह का काम है नहीं, जिससे इनकम हो सके। गांव के लोगों से बात करके यह पता चला कि 3,000 गांव के लोग वहां से पलायन करके शहरों की तरफ जा चुके है और इन खाली पड़े गाँवों को सब भूतिया गांव कहते हैं।
उत्तराखंड के मौसम की बात करें तो बहुत ही सुहाना मौसम रहता हैं, खूबसूरती बेमिसाल हैं। खूबसूरत पहाड़ियां है, सुबह जब सूरज निकलता है तो लोधगल्ला गाँव से हिमालय की ऊंची-ऊंची चोटियाँ दिखाई देती है। शाम को सनसेट बहुत ही सुंदर दिखता है। शहर के लोग यह सब देखने के लिए उत्तराखंड जाते हैं। वहां के लोग कह रहे थे आप लोगों के पास पैसे हैं तो आप यहां पर हरियाली देखने आ जाते हैं पर हमारे पास तो पैसा नहीं है, हम लोग मजदूर हैं, तो हम कैसे जा सकते हैं। वहां के लोगों ने बताया कि अधिकांश लोग बहुत कम बीमार होते हैं। उन्हें कोई भी एक्सरसाइज की जरूरत नहीं पड़ती है। वह फिट रहते हैं। हमने वहां पर एक बिच्छू नाम का पेड़ देखा। जब वहां के लोगों को बुखार आता है तो उसी पेड़ से वह अपने आप को काटते हैं और उनका बुखार खत्म हो जाता है। काली-काली जोक थी उन लोगों का कहना था कि यह जोक जिसके पैर में चिपक जाती है तो शरीर से गंदा खून बाहर निकाल देती हैं। उसके काटने से कोई नुकसान नहीं होता है। हर चीज के पीछे कुछ ना कुछ लॉजिक था। हर एक पेड़-पौधों की अपनी कहानी थी। जो पेड़-पौधे हम अपने शहर में नर्सरी से खरीद कर पैसों से लाते हैं वहाँ सारे पेड़ सड़क के किनारे निकले हुए थे ।

जो लोग हमें जानते पहचानते भी नहीं थे अगर उनके घर के पास से निकल जाओ तो एक बार वह हमसे पूछते थे कि आप कहां से आए हैं और इतने प्रेम से बात करते थे कि लगता ही नहीं था कि वह हमें पहली बार मिले हैं और हमें अपने घर पर बुला लेते थे। उनके खेत में जो भी कुछ खीरा-ककड़ी फल उगा था वह हमें लाकर के बहुत प्यार से खिलाते थे। पहाड़ों में जाने के बाद एक चीज लगी कि शहर की जिंदगी बहुत भागा-दौड़ी भरी है मगर यहाँ के लोगों का जीवन बहुत आराम से चलता है। वह हर चीज को बहुत ही आराम से करते हैं। हमें वहां पर बहुत कुछ सीखने को मिला। कम संसाधन में अपने जीवन को किस तरह चलाया जाए। यह एक बहुत बड़ी सीख थी। बाकी सब बहुत अच्छा रहा सभी ने बहुत मजे किए।

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