प्रियंका शुक्ला:
कुछ दिन पहले, हसदेव अरण्य जंगल के पास का ग्राम बासेन जाना हुआ, और वहाँ पर विस्थापित ग्राम केते के लोगोंं से मिलने का प्रयास किया। बातचीत में वहाँ की बढ़ती भयावह स्थिति निकल कर सामने आई। 2010 में केते ग्राम के लोगों को मुआवजा दिया गया था। अदानी को मुनाफा देने के चलते, लोग अपने ही ज़मीन पर मज़दूर बना दिये गये।
बातचीत में मेरी मुलाकात शिव जी से हुई, जो कि 2010 में जब हसदेव अरण्य के जंगलों के पास के गाँव केते में रहते थे। जब वहाँ खदान शुरू होने की बात हुई, तब उस समय में शिव जी विरोध किये थे, लेकिन इस पर कोई सुनवाई नहीं हुई। उल्टा इन्ही को 4 बार जेल में डाला गया, और ले-देकर 2014 में मजबूरन उन्हें मुआवजा लेना ही पड़ा, और विस्थापित होना पड़ा।
वो कहते हैं कि मोल-भाव तो क्रेता और विक्रेता के बीच होता है, लेकिन हमारे यहाँ ऐसा नहीं हुआ। शिव जी आगे बताते हैं कि उनके विस्थापन के बाद स्थिति यह हुई की विस्थापित होने से उनकी पूरी ज़मीन खदान में चली गयी जो की अब अदानी के पास है। वर्तमान में उनके पास खेती की ज़मीन तक नहीं है। अब ऐसे में जो मुआवजा भी मिला, उसका हम सभी भाई लोगों के बीच बंटवारा हुआ, और जो घर मिला भी, वो इतना छोटा है (मात्र एक छोटा कमरा और छोटी से रसोई) कि उसमें गाय का कोठा भी नहीं बन सकता।
इस बातचीत में यह भी निकलकर आया कि विस्थापन के बाद वहाँ के लोगों के बच्चों का आज जाति प्रमाण पत्र नहीं बन पा रहा है क्यूंकि उनके पास सेटलमेंट का कागज नहीं है। इसके अलावा किसी को नौकरी मिली वो अफसर थोड़ी हैं, वो तो वहीँ अपनी ही ज़मीन पर दिहाड़ी मज़दूरी का काम करके बमुश्किल 350 से 400 रुपए प्रतिदिन मज़दूरी कमा रहा हैं।
बातचीत के दौरान शिव प्रसाद खुसरो जी ने बेहद मार्मिक बात कही, वो कहते हैं की मुझे आज भी लगता है की जैसे हमने अपनी आस्था के देवता और पूर्वजों के साथ धोखा किया है, वो कहते हैं कि हम लोग वहाँ से यहाँ आ गये लेकिन अपने देवता और पूर्वजों को वहीं छोड़ दिये।
मैंने उनसे पूछा कि क्या आप लोगों को जो घर विस्थापन होने पर मिले हैं, उसके मालिकाना हक का कोई कागज़, आदि है?? कोई रजिस्ट्री या ऋण पुस्तिका जैसा कुछ?? उन्होंने बताया कि नहीं कोई रजिस्ट्री जैसा नहीं है, लेकिन जब सरपंच को काफी बार बोला, तब एक साधारण से लिखा-पढ़ी करके कागज़ मिला, लेकिन हम मालिक हैं ऐसा नहीं है, कोई रजिस्ट्री भी नहीं है।
मैंने आगे बातचीत में ही उनसे उनका घर दिखाने का अनुरोध किया?? तब वो मुझे विस्थापित हुये लोगों के घर दिखाने ले गये। वहाँ जाने पर देखा कि हर तरफ सन्नाटा था, लोग दिखाई नहीं दे रहे थे, मैंने फिर से पूछा कि आज छुट्टी है क्या कोई?? सब लोग कहीं बाहर गये हैं क्या??
जवाब में शिव प्रसाद जी ने बताया कि जब ग्राम केते के लोगों को बासेन ग्राम में लाकर बसाया गया, तो यहाँ लगभग 300 परिवारों का विस्थापन हुआ था। लेकिन मैडम आप ही बताओ, हमारी तो गाय को बांधने तक का कोठा इस कमरे से बड़ा होता है, यहाँ इतनी छोटी सी जगह में हम आदिवासी-किसान कैसे रहेगा???
बस यही कारण था कि धीरे-धीरे लोग पलायन कर गए और इधर-उधर बिखरकर कहीं और चले गये। यहाँ अब 300 में से मात्र 15 से 20 परिवार ही बचे हुये हैं, वो भी बड़ी मजबूरी में गुजर-बसर कर रहे हैं।
पास में ही एक दूसरे परिवार के युवक से मैंने बात किया तो उन्होंने बताया की अभी दो दिन पहले ही कंपनी के 4 से 5 लोगों को नौकरी से निकाला भी गया है।
आज यह गाँव उदाहरण है यह समझने के लिए कि जिस गाँव का 2010 में मुआवजा बांटकर विस्थापन किया गया। वहाँ के आदिवासी संस्कृति का क्या हुआ, आदिवासी किसानों का क्या हुआ, और तो और जिनका जीवन और आजीविका जंगल से चलता था, तेंदू पत्ता से ही माह का 25 से 30000 रुपए कमा लेते थे, खेती बाड़ी करके अपने गाँव के राजा थे, आज वो सभी परिवार अपनी ही गाँव की ज़मीन पर मज़दूर बना दिये गये हैं।
सरकार के साथ-साथ हम कथित सभ्य समाज के लोगों को विस्थापित हुये इस गाँव से सीख लेकर यह ध्यान देना चाहिए कि विकास नहीं विनाश की दिशा में काम हो रहा है।
आगामी कुछ सालों में यह जंगल, यहाँ आदिवासियों को रणनीतिगत बाहर भगाकर, यह क्षेत्र हड़पने के लिए काम हो रहा है।
जब आदिवासी और जंगल वाले इलाकों में, जंगल और आदिवासी ही नहीं रहेगा, तो यह अनुसूचित जनजाति क्षेत्र कैसे रहेगा???
आगामी कुछ ही वर्षों में आदिवासी समुदाय की एकजुटता भी खत्म करने की चाल है यह, और फिर ग्राम सभा से शहरीकरण करके नगर पंचायत या ग्राम पंचायत जैसा बनाकर वहाँ के आदिवासी सहित वन में निवास करने वाले समुदायों के जो ग्राम सभा के तहत अधिकार हैं, वे सबसे वंचित कर दिये जायेंगे। और इतिहास में वहाँ के आदिवासी समुदायों के पूर्वजों का नामो-निशान वहाँ से मिटाने का बड़ा षडयंत्र है जिसके तहत हसदेव के जंगलों को भी काटा जायेगा।

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