आफाक:

विकास की बयार में घर, मकान और दुकान के साथ बहुत कुछ उजड़ रहा है। हमारा गाँव पहाड़गंज घोसियाना है, घोसियाना दो हिस्सों में बसा है जिसके बीच से एक रोड निकलती है। यह रोड आमतौर पर लोग रेलवे स्टेशन फ़ैज़ाबाद, या कचहरी जाने के लिए ज्यादा इस्तेमाल किया करते हैं। इसी रोड़ को 14 कोसी परिक्रमा मार्ग भी कहा जाता है। अभी इस रोड़ का भी चौड़ीकरण हो रहा है। हमारा मोहल्ला घोसियाना जहाँ से खत्म होता है और राम नगर जहाँ से शुरू होता है, उनके बीच में एक नीम का पेड़ है। यह नीम का पेड़ सिर्फ छाया ही नहीं देता, बल्कि राहगीरों और आस-पास के लोगों के लिए यहाँ चाय-नास्ते के लिए छोटी सी दुकान भी है, जिसमें सस्ता खाने पीने को मिल जाता है। 

इस पेड़ के नीचे, हमारे मोहल्ले, राम नगर, पहाड़गंज और छावनी आदि जगहों के लोगों के लिए मिलने की एक मात्र जगह है। कुछ लोग हमेशा ही यहाँ मिलते रहते हैं, जहाँ घंटों रूककर वह बातें करते हैं। कुछ काम की बात, कुछ अपने गाँव मोहल्ले की बात होती है। अधिकांश समय यहाँ हँसी-मज़ाक ही होता है, जिससे आज के दौर में कुछ राहत भी मिलती है। यहाँ विभिन्न मोहल्लों में क्या चल रहा हैं, उसके बारे में भी पता चलता है। लोग अपनी दिक्कत परेशानियों को भी एक दूसरे से बताते हैं। कुछ काम होता है, कुछ नहीं भी हो पता है। जो लोग यहाँ मिलते हैं, शायद ही कोई किसी के घर जाता होगा, इस पेड़ के नीचे जाति, मज़हब की सीमा भी नहीं हैं।

अभी सड़क चौडीकारण में यह पेड़ भी कट जाएगा, यहाँ से यह पेड़ ही नहीं कटेगा बल्कि चार-पाँच मोहल्लों के बीच का वह रिश्ता भी कट जायेगा, जिसको यह पेड़ अपनी छाया में अभी तक समेटे हुए है। यह एक ऐसा प्राकृतिक स्थान है जो हर किसी को अपने नीचे जगह देता है, बिना किसी भेदभाव किए हुए यह अपने नीचे सभी को राहत देता है। इसकी छाव तले जो रिश्ते यूहीं बन जाया करते थे, अब शायद उसके लिए जगह नहीं होगी। यहाँ बैठने वाले लगभग सभी लोग रोज़ कमाने वाले थे। अपनी मेहनत-मज़दूरी करते हुए यहाँ दो पल सुकून का बिता लेते थे। अब यह कैसे मुमकिन होगा, यह बात आज मेरी समझ से परे है। केवल यही पेड़ नहीं, इस जैसे सैकडों पेड़ अब सड़क किनारे नहीं होंगे। छोटे दुकानदार, ठेले-खामचे वाले इन्हीं पेड़ों के नीचे अपना अपना काम कर परिवार का भरण पोषण करते थे। उनका क्या होगा? वह कैसे अपना जीवन और काम चलाएंगे? इस तरह के काम करने वाए शायद अदृश्य हो जायेंगे।

मैं अक्सर सोचता रहता हूँ कि जब विकास होने के क्रम में ऐसे पेड़ कट जाते हैं तो वो सब लोग कहाँ जाते हैं जो उसके नीचे मिला करते थे? वो पक्षी कहाँ जाते होंगे जो उस पर रहा करते थे? टूटने और बनने के क्रम के बीच मैं अक्सर उन खुमचा वालों, ठेले वालों, छोटे दुकानदारों के बारे में सोचता रहता हूँ, जिनका घर था वो फूटपाथ, जिस पर वो रहते थे और वहाँ से ही उनका घर चलता था। क्या उनके घर चलना बन्द हो गए होंगे? या हो सकता है विकास के क्रम में वो ठेले वाले ने किसी मॉल में लगा लिया हो ठेला? मैंने तो नहीं देखा कि सब उजड़ने के बाद चिड़ियों को मिला हो कहीं रहने को फ्लैट, ठेले वाले ने किसी मॉल में लगाया हो ठेला, या जो मिले थे उस पेड़ के नीचे उनके लिए बनाया गया हो मिलने का स्थान। हमारी विकास की अवधारणा में ये सब नहीं हैं शामिल। तो मैं आखिर में यही सोचता हूँ कि कहाँ जाते होंगे वो सब?

फोटो आभार: आफ़ाक़

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  • अफ़ाक, फैज़ाबाद उत्तर प्रदेश से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं। वह अवध पीपुल्स फोरम के साथ जुड़कर युवाओं के साथ उनके हक़-अधिकारों, आकांक्षाओ, और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर काम करते हैं।

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One response to “कहाँ जाते होंगे वो सब जो कट चुके पेड़ों के नीचे मिलते थे?”

  1. Poonam Avatar
    Poonam

    Bilkul sahi, Bahutere logo ke dil ki baat
    Ko aapne likha hai. Dhanyavaad!!

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