एलीन लकड़ा:

जीवन में जब भी कोई मेरे हॉबीस के बारे में पूछते रहे हैं, और मेरे मन में हमेशा हिचकिचाहट रही है। मुझे लगता था हमारे पास कोई टैलंट्स / कला नहीं है। हममें से ज़्यादातर लोग अकेले नाचना और गीत गाना नहीं जानते हैं। पर गाँव में परब-त्यौहार और शादी-बिहा के समय रात-रात भर एक साथ और एक सुर में नाचते और गाते रहे हैं। हम किसी एक हुनर को मजबूत बनाने के लिए प्रशिक्षण और एक्सट्रा टाइम नहीं दे पाते हैं। 

अब मेरे लिए हॉबी वही बन गया है जिसे मैं करना पसंद करती हूँ और मुझे आनंद आता है और मैं थकती भी नहीं हूँ। और जो मुझे अपने गाँव से जोड़ता भी है। मेरे यह हॉबी मौसम के अनुसार अलग-अलग रहा है। गर्मी में सामुदायिक पोखरा (छोटा तालाब) में सब साथ तैरना और कच्चे या पके आम, कुसुम और जामुन खोजने के लिए पहाड़ और जंगल की ओर जाना और बैठकर साथ में खाना या चिलचिलाती धूप में डांग (बांस की लंबी लकड़ी) में टोकरी बांधे, काँध में लिए देमता छोड़ाना (लाल चींटी के अंडे निकालना)। जाड़े के दिन में धान काटते वक्त मछली पकड़ना इत्यादि। यहाँ के आदिवासी समुदाय के लिए बरखा (बारिश का मौसम) एक ख़ास समय होता है जब खेती-किसानी के थकान भरे काम के साथ-साथ दोइन- डांड (गड्ढे और पानी वाले खेत और सूखा खेत) के साग पात और जंगल के अनगिनत प्रकार के खाद्य वस्तु जमा करके बड़े चाव से खाते हैं। इन खाद्य वस्तुओं के स्वाद का समुदाय के लोग साल भर इंतजार करते हैं। इस मौसम में पुटू/रुगड़ा (एक प्रकार मशरूम) खोजना और उसका स्वाद लुटाना आत्मसंतुष्टि का समय होता है। बरखा का आना मेरे लिए भी एक विशेष समय होता है जहाँ भी रहती हूँ, जी लगा रहता है कि काश मैं घर में होती तो जंगल जाकर पुटू खोजने जा पाती। पुटू खोजना मेरे लिए, यहाँ के अन्य लोगों की तरह एक पसंदीदा काम है। एक हॉबी की तरह है।व्यक्तिगत रूप से मुझे दसवीं की पढ़ाई के बाद बहुत कम मौका मिला है जब मैं पत्ता तोड़ने, लकड़ी लाने, पुटू और खुंखडी (मशरूम) खोजने जंगल जा पायी हूँ। 

पिछले वृहस्पतिवार को हम 3 बहनें, भतीजी गीता और एनोश इस वर्ष की बरखा में पहली दफ़ा जंगल गए थे। हम पांच लोग मिलकर एक पाईला (लगभग 500 ग्राम) पुटू खोजकर लाये फिर देसी मुर्गी के मांस के साथ पुटू तियान (सब्जी) पकाए। यह अदभुत और संतोषजनक समय एक साथ व्यतीत किये जिसे मेरी छोटी बहन नीलम कहती है – “आइज मोर सरद्धा मेइट गेलक (आज मैं तृप्त हो गयी)।” मज़ेदार पल। पुटू खोजना बहुत बारीकी का काम है। घंटों तक सर गाड़कर धरती के छोटे-छोटे फटे दरारों में बारीक रुई की तरह सफेद गोलाकार पुटू को ध्यान से खोजना और एक-एक करके जमा करना अत्यंत धैर्य का काम होता है। यहाँ पिछले कई वर्षों का अनुभव भी काम आता है जिससे पता चलता है कि कहाँ पर किस तरह का पुटू मिलता है। यहाँ के सखुआ के जंगल में दो प्रकार के पुटू पाए जाते हैं जिसे खेर पुटू और जाइत/रुगड़ा पुटू कहते हैं। 

ऐसा प्रतीत होता है, जंगल के आसपास रहने वाले लोग वास्तव में रिसर्चर्स (शोधकर्ता) हैं जिनका पीढ़ियों से संग्रहित पुरखों का ज्ञान लिट्रेचर रिव्यु की तरह होता है और अनुभव करके डाटा कलेक्ट भी करते हैं फिर बाद में आकर आस-पड़ोस के लोगों को बताते हैं कि कहाँ पर, कब, कितना और क्या मिलता है। प्रायः सबको पता होता है कि कौन से खाद्य वस्तु/वन संसाधनों (इस संदर्भ में पुटू या मशरूम) को कैसे बनाकर खाया जाता है/प्रयोग किया जाता है। बस यह है कि उनका यह रिसर्च वर्क कहीं छपता नहीं है। वे इस अनुभूति को जीते हैं और आने वाले पीढ़ी के लिए हस्तांतरित करते हैं।

आज के समय में जब सभी संसाधनों का व्यक्तिगत होने तथा ग्राम सभा केंद्रित होने के बावजूद भी जंगल अभी तक सबके लिए है। गुमला शहर से सटे हुए छोटे-छोटे नए बसे हुए गांव के लोग भी ब्रिंदा गांव के 7 ग्राम सभा के पारम्परिक (ट्रेडिशनल) बाउंड्री के अंदर जाकर पुटू, खूंखड़ी खोजने तथा जंगल से आपूर्ति चीजों को लेकर आ सकते हैं, उन ग्राम सभाओं को कोई रोक-टोक नही है। वन अधिकार कानून 2006 शायद यहाँ के लोगों को इसलिए समझ नहीं आया होगा और इसलिए यहाँ इसपर काम नहीं हुआ है क्योंकि जंगल किसी एक व्यक्ति या ग्राम सभा तक सीमित नहीं है। अन्य जहां से भी लोग जंगल के संसाधनों/जरूरतों का सीमित उपयोग कर सकते हैं।

एक बात यह भी है, कुछ अपवाद को छोड़कर, कि पुटू को हाट में बेचने के लिए बिरले ही लोग लेकर जाते हैं। अन्य फसल की तरह जब ज़रुरत से ज़्यादा मिल जाता है तो इसको भी बेचते हैं पर प्रायः खुद घर में खाने के लिए ही खोज की जाती है। बरखा खेती बाड़ी का भी समय होता है और साथ में जंगल/ पहाड़ में कई तरह के पारंपरिक उपयोगी वस्तु भी मिलते हैं। आदिवासी इलाके के पढ़ने वाले बच्चों, युवाओं और नौकरी पेशे वालों के लिए इस मौसम में विशेष छुट्टियां होनी चाहिए ताकि अपने जंगल और जमीन से जुड़े रहने का सिलसिला वे बरकरार रख सकें।

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  • एलीन, सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़ी हैं और दिल्ली की संस्था श्रुति के साथ लम्बे समय तक जुड़ी थीं। वह वर्तमान में रांची में रहती हैं और एक संस्था के साथ जुड़ कर काम कर रही हैं।

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