ରାସ୍ତା କଡର ଜୀବନ୍ रास्ते (सड़क) के किनारे का जीवन

ଡୋଲାମଣି: ନା ଅଛି ଛାତ ନା ଅଛି କାନ୍ଥ ତଥାପି ଚାଲିଛି ରାସ୍ତା କଡରେ ସର୍ବହରାକଂ ଜୀବନନା ଅଛି ଶିକ୍ଷା ସ୍ୱାସ୍ଥ୍ୟ ଶୁଦ୍ଧ ପିଇବା ପାଣି ଶୁଦ୍ଧ ପରିବେଶ ଖାଦ୍ୟ ଓ ମକାନ୍ତଥାପି ଚାଲିଛି

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ଦାଦନ ଗୀତ (प्रवासी मज़दूर का गीत)

लोचन बरिहा: ପେଟର୍ ଲାଗି ଯାଉଛୁ ବିଦେଶ ଇଟ ଭାଟାରେଛାଡି ଗାଁ ମାଁ ମାଟିବିଦେଶର କଥା ନେଇ ଯାନୁ କିଛି ରେ ଛାଡି ଗାଁ ମାଁ ମାଟିଆଁଖିର୍ ପାନି ଆଁଖି ଯଉଛେ ଶୁଖି. ପେଟର

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लालच और विकास: कविता

डेज़ी कूजुर: जितनी लंबी और चौड़ी रोड, उतनी बड़ी ट्रक, उतने बड़े लोग, और उतनी बड़ी लालच। जितनी लंबी और चौड़ी रोड, उतनी खदान, उतनी

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नई सुबह

जितेंद्र माझी: दूर धूमिल रंगीन क्षितिज से,सूर्य धीरे से निकल आता है,उम्मीदों से भरा तब निर्मल प्रकाश,दूर-दूर तक छिटक जाता है। वह गर्म सी कोमल

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गाँव की एक शाम

जसिंता केरकेट्टा: वो लकड़ी ढोकर उतरती है पहाड़ से,उसके पीछे धीरे-धीरे सूरज भी उतरता है।दोनों को उतरते देखती है चुपचाप पहाड़ी नदीऔर उसकी साँसों में

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