नंदिनी शर्मा : समाज कहता, समझ से बढ़ो,शांति और एकता का दीप जलाओ।हर दिल में प्रेम का संचार हो,हर मन… READ MORE
उमेश भट्ट ग्वाला : आज एक कविता के प्रत्युत्तर में कुछ पंक्तियां यूँ ही लिख दी थी। एक मित्र की… READ MORE
अंतरसिंग निगवाले: मैं संघर्ष से नहीं डरतामैं भारत का आदिवासी हूँ।मैं प्रकृति की आंचल में रोज जीता हूँ।अपनी सांस को… READ MORE
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नमिता पूनम: पइढ़-लिख के भी जिनगी,ढ़पियाते दिन जाथे!आइज हिञा तो काइल हुवां कर,चक्कर काटते दिन सिराथे।१। गांव- समाज में तो… READ MORE
दीपिका माथुर और तन्नु : बहुत याद आती है, अपने अंदर छुपी उस छोटी-सी बच्ची की,जो शायद अब मर चुकी… READ MORE
नंदिनी : घर से दूर आकर आज़ादी में कैद हो गएमाँ की फिकर, पापा के गुस्से को बंदिश समझते थेबाहर… READ MORE
हरि कुमार कुंजाम: आओ सब मिलकर मनाएंविश्व आदिवासी दिवसउनकी संस्कृति की महकहम सबके जीवन में रस ।। वो जंगलों के… READ MORE
सबिता बनर्जी : दरिंदगी में पिसती बेटियां,कभी निर्भया, कभी संजली,कभी फुलन, कभी मधुमिता,ये तो वो नाम हैं जो दरिंदगी की… READ MORE
युवानिया पत्रिका, युवाओं को उनकी सोच को कलमबद्ध करने का एक मंच देने का प्रयास है। इस पत्रिका के माध्यम से हम मुख्यतः युवा मन के विचारों को सामने लाना चाहते हैं। साथ ही आस-पास के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिदृष्य पर युवाओं के विचारों को भी साझा करना चाहते हैं।
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