नमिता पूनम:
पइढ़-लिख के भी जिनगी,
ढ़पियाते दिन जाथे!
आइज हिञा तो काइल हुवां कर,
चक्कर काटते दिन सिराथे।१।
गांव- समाज में तो टोन,
घरों- परिवार में गारी सुनते दिन जाथे!
सफल होय के भी असफलता कर,
डहर में भटकते दिन सिराथे।२।
बड़-तो बड़ छोटों कर गोड,
लागते दिन जाथे !
काले नय देखाय अफसर आउर अधिकारी आपन फोलटेनक दम,
खाली कुरसी में बैठेक खेयाल राखते जाथैं।३।
कतना लगाबैं मांय-बाप रूपिया-कचिया,
कमाते-कमाते हाड़ो -मास सिराते जाथे!
केकर से असरा करब,
सउभे मुंह फेरते जाथैं।४।
कतय धरब धीर,
धीरजा कर गोली भी सिराय जाथे!
नांवा बिहान होय गेलक,
ई सोइच बारह-दु बजें राइतो के भी नींदो टुइट जाथे।५।
जागल बादे पता चललक,
सब सपना चकनाचूर होय जाथे!
फिन बुझालक काले पढ़ली-लिखली,
पइढ़-लिख के भी तो जिनगी
ढ़पियाते दिन जाथे।६।

Leave a Reply