गुफरान:

साथियों 14 नवम्बर बीत चूका है जिसे हम सभी “बाल दिवस” के नाम से जानते हैं। बचपन से आज तक मैंने जिस बचपन को अपने आस पास जिया है, उसको अपनी इन पंक्तियों में बताने की कोशिश की है। शायद इससे मैं उन बच्चों की आवाज़ को उठा सकूँ जिनको पता ही नहीं की बचपन होता क्या है और बाल दिवस क्यूँ मनाया जाता है।

मेरा बचपन

फुटपाथों पर गुब्बारे बेचता मेरा बचपन,
भूख मिटने को भीख मांगता मेरा बचपन,
सड़कों पर फिरता करता बूट्पोलिश मेरा बचपन,
कूड़े के ढेरों पर कबाड़ उठता मेरा बचपन,
साहूकारों के गोदामों में बोझ उठता मेरा बचपन,
सेठों के घरों में झाडू पोंछा करता मेरा बचपन,
रातों को रोता रहता भूखा सोता मेरा बचपन,
टूटे पत्तों जैसा हवा में उड़ता मेरा बचपन,
इक रात जो सोया जाने कहाँ खो गया मेरा बचपन,
आंख खुली तो देखा मैंने बीत चूका था मेरा जीवन…

Author

  • गुफरान, फैज़ाबाद उत्तर प्रदेश से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं। वह अवध पीपुल्स फोरम के साथ जुड़कर युवाओं के साथ उनके हक़-अधिकारों, आकांक्षाओ, और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर काम करते हैं।

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