संजीव कुमार:

आओ महोदय तुम्हे आदिवासी बस्ती ले जाता हूँ ,
अतीत का जिन्दा सबूत दिखाता हूँ
भूक-प्यास, दरिद्रता से लिपटे,
इस मोहल्ले से रूबरू करता हूँ।
आओ तुम्हे अतीत खाता हूँ…..

आज भी अतीत दबा बस्ती में, जो ज्ञान से दूर है,
हाँ महोदय सही पहचाना यह बस्ती, आदिवासी ज़रुर है।

हाँ महोदय पैर रखोगे तो पहचान जाओगे,
शहर से दूर होगा,
इसका सुखा और सुनसान सा रूप होगा।

तेज़ धूप होगी, पेड़ की छाँव होगी,
उसके नीचे कुछ बच्चों का आशियाना होगा।
एक हाथ में कंकड़ -मिट्टी से बनी गाड़ी होगी
दूसरे में, आधी रोटी नमक संग लिपटा, निवाला होगा।

जिन हाथों में रंग की सिहायी हो और कांधे पर बसता।
ज़रा देखो इन हाथों में ईंट भट्टे के सांचे है।
ओर कांधे पर लदे कर्ज के मोटे वादे है।।
ज्ञान अज्ञान, दुनिया से परे यह बस मजदूर बन रह जाते है।।

एक नज़र संग बस्ती देखें, तब देखें बिन छत का सार
हाँ महोदय सही पहचाने यही है, सभी घरों का हाल।
जब तलक थोडा आगे बड़े तब यह भी NOTICE करे।
कैसी है बस्ती में, यह खामोशी।
कच्ची मिट्टी में लिपटे यह घर किसकी याद में गा रहे है,
ज़रा ठहरिए 8 बजे थक-हार कर बस्ती वाले आ रहे है।

हाँ महोदय ज़रा गोर फरमाइए,
बस्ती की दशा का
कौन ज़िम्मेदार, ज़रा बताएँ
इन मासूम बच्चो की, अज्ञानता का
कौन कसूरवार, ज़रा सुनाएँ।।

वक्त रहे तो यह भी देखें..
पानी, बिजली, सड़क कहाँ ?
बिन शिक्षा, स्वास्थ संग पोषण,
आखिर यह संभव जीवन कहाँ ?

कोसों मिल से पानी आवे,
बिजली के तार रोज कट जावे,
उबड़-खाबर कच्ची सी पगडंडी पर,
सर्प संग शमसान जावें।
शिक्षा से कोई नाता नही,
दूर-दूर तक इससे कोई खाता नहीं।

समाज से दूर है अभी भी मजबूर है।
छुआछुत से बेर खायें,
और ज़रा सा इन्हें छूलें तो वो अछूत हो जाएँ।
हाँ महोदय मुबारक हो आप आदिवासी बस्ती में है,
ज़रा और गौर फरमाइए …….

अभी तो तेज़ धूप है,
ज़रा बारिश आने दो।
घरों में टप-टप बूँदें छाने दो,
सपरिवार संग इन नन्हें बच्चों को
रात में भीग जाने दो।।

हाँ, महोदय
ज़रा चुनाव आने दो
नोटों पर वोटो को बोछार छाने दो।
ज़रा बस्ती में बोतलें और चादर बटने दो
कुछ वादे और झूठी कसमें खाने दो।।
भूल फिर जाओ अब पाँच साल,
कुछ नए अनपढ़ बनने दो।
स्कूल, अस्पताल और शौचालय की ज़रूरत नहीं,
अब एक नया बस्ती-पास — शराब, ठेका खुलने दो।

हाँ महोदय मुबारक हो आप आदिवासी बस्ती में है,
अतीत अभी भी ज़िन्दा है,
वही भूक, वही दशा, वही अज्ञानता अभी भी बेकरिंदा है।
यह इंशा हैं या परिंदा है, बस चार दीवारों में कैद,
पिंजरे की भाँति ज़िन्दा है, बस ज़िन्दा है।
मुबारक हो महोदय, आप आदि वासी बस्ती में है।
यहाँ अतीत अभी भी ज़िन्दा है, अतीत अभी भी ज़िन्दा है।।

Author

  • संजीव कुमार मध्य प्रदेश के भिंड जिले के मालनपुर के निवासी हैं। वह वर्तमान में बीएससी तृतीय वर्ष के छात्र हैं और जेनिथ सोसाइटी संस्था में सक्रिय रूप से कार्यरत हैं, जहां वह सहारिया आदिवासी और मजदूर वर्ग के अधिकारों के लिए काम करते हैं। उन्हें पढ़ना और लिखना बहुत पसंद है।

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