श्रुतिका शाह :
लहू देखा है आपने, महसूस किया है कभी?
मैं पूछता हूँ
लहू देखा है आपने, महसूस किया है कभी?
नब्ज़ तिड़क जाने पर रक्तस्राव देखा होगा
अनवरत प्रतिक्षा करता दरभंगा तो देखा होगा
प्रसव देखा होगा, जिस्म से बहता खून देखा होगा
कुछ नहीं देखा है, गंगा को तो देखा होगा?
माना कि तुमने, मैने और इस बेबाक भीड़ ने
कि माना तुमने, मैने और इस बेबाक भीड़ ने
समूची सृष्टि के सृजन को देखा नहीं
किताबों में ही सही, पर आकाशगंगा को तो देखा होगा
विस्तारित होते इस ब्रह्माण्ड की अलौकिकताओं को दिखा नहीं
पर थक कर अपने पांव पसारती गंगा को तो देखा होगा
छैनी हथौड़ा लिए कांस्य खंड को टटोलते आदम देखे जाते नहीं
पीढ़ी दर पीढ़ी सरकते कोलाहल देखे जाते नहीं
अपने जिस्म पर खंजर चलने पर सुबकते कंचनजंघा को तो देखा होगा
क्रंदन देखा हो या न देखा हो
बंद कमरों में दर्द करहाते पहाड़ देखे जाते नहीं
मरहम का सा नीला अंचल फैलाती गंगा को देखा होगा
अतीत कितने विवादों से भरा है हमें मालूम नहीं
लड़ने जाती सेनाओं को पार करती योजनगंधा को तो देखा होगा
हर बार इतिहास बताने किताबें कहां तक आएंगी
आपने तख्त के लिए होते युद्ध को देखा हो या नहीं
अरे हतिहास बताती गंगा को तो देखा होगा
तुमने बनारस के घाट पर बैठ पानी में अपने पैर डुबोए
हलक पर टिकी अपनी शंका को तो देखा होगा
कुछ देखा हो या न देखा हो पर
तुमने लश्कर से अपने ओछे घाव धोते हुए
एक बार गंगा को तो ज़रूर देखा होगा!!!

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