ज़ेबा वसी:
अक्टूबर की हल्की ठंडी सुबह थी। जब मैंने दिल्ली से अयोध्या के लिए ट्रेन पकड़ी, तो मन में हल्की सी उत्सुकता और गहरी जिज्ञासा थी। नाम ‘अयोध्या’ सुनते ही हमारे दिमाग़ में जो तस्वीरें उभरती हैं – मंदिर, विवाद, राजनीति और तीर्थ – वही सब मेरे मन में भी तैर रही थीं। पर भीतर कहीं यह भी इच्छा थी कि उस मीडिया की बनाई छवि से आगे जाकर मैं असली अयोध्या, या यूँ कहें फैज़ाबाद उर्फ़ अयोध्या, को महसूस करूँ।
अयोध्या कैंट से पहली झलक
ट्रेन जब अयोध्या कैंट पर रुकी, और मैं बाहर निकली तो देखा छोटा सा स्टेशन, पर साफ-सुथरा और शांत स्टेशन के बाहर न भीड़-भाड़, न हॉर्नों की कर्कश आवाज़ें, बंदरों का झुंड और चौकस पुलिस।
फैज़ाबाद की गलियों में इतिहास की गूँज
शाम ढलते ही हम फैजाबाद की ओर बढ़े – वही पुराना शहर, जो कभी अवध की राजधानी हुआ करता था। मेरे साथी ने कहा (जो फ़ैज़ाबाद से ही हैं), “चलो तुम्हें असली फैज़ाबाद दिखाते हैं।” गली-गली घूमते हुए पहली मंज़िल थी – बेगम अख़्तर का घर। बाहर से साधारण, भीतर से इतिहास का घराना। वही बेगम अख़्तर, जिन्हें कभी “मल्लिका-ए-ग़ज़ल” कहा गया, जिनकी आवाज़ में दर्द भी था और शहद भी। पुरानी ईंटों की दीवारों को देखकर लगा मानो आज भी उनकी कोई अधूरी रियाज़ उस हवा में तैर रही हो।
थोड़ी दूर चलकर पहुँचे एक मक़बरे पर – नवाब शुजा-उद-दौला का मकबरा, जिसके बारे में स्थानीय लोगों ने बताया कि यहाँ पहले उनकी कब्र थी, पर बाद में उन्हें निकालकर दिल्ली के सफदरजंग मकबरे में दफ़नाया गया। लेकिन गूगल पर सर्च करने पर मालूम हुआ की उनकी कब्र यहीं है और यह सब मनगढ़ंत कहानियाँ बना दी गई हैं। मैं यह सोचते हुये और फ़ैज़ाबाद की गलियों को देखते हुये क्लॉक टावर पहुंची।
जिसके चारों ओर चार पुराने दरवाज़े फैले हैं। कहते हैं कि ये दरवाज़े नवाब शुजा-उद-दौला के समय के हैं, जब फैज़ाबाद अवध की राजधानी था। शहर में आने-जाने के रास्ते इन चार गेटों से होकर ही गुज़रते थे। अब सरकार ने इन ऐतिहासिक दरवाज़ों को फिर से बहाल करने का बीड़ा उठाया है।
घंटाघर के नीचे कुल्फी खाते हुये मेरे साथी ने बताया की अंग्रेज़ों ने जब-जब किसी शहर को बसाया, वहाँ एक क्लॉक टावर ज़रूर बनाया, ताकि लोग वक्त के पाबंद बन सकें। मगर वक्त ने ही कितनी बार इन शहरों को पलट दिया!
रात का समय था, लगभग बारह बजे, लेकिन चौक अब भी जगा हुआ था। मिठाइयों की दुकानों से खुशबू आती थी, महिलाएँ करवा चौथ की मेंहदी लगवा रही थीं। जब मैं रामपथ की ओर बढ़ी – तो शहर का चेहरा बदल गया। हर घर एक जैसे रंग में रंगा हुआ, हर दुकान पर भगवान राम की तस्वीर, हर दीवार पर मंदिर का चित्र। सड़कों के किनारे नए-नए पेड़ लगाए गए थे – लेकिन ध्यान से देखा, तो समझ आई कि पुराने बरगद-पीपल कट चुके हैं। शहर का चेहरा चमक उठा है, पर कहीं भीतर उसकी आत्मा जैसे धीमे-धीमे छिल गई हो।
जहाँ कभी स्थानीय लोगों के छोटे-छोटे ठेले, गुमटियाँ और चाय की दुकानें हुआ करती थीं, वहीं अब पूरा इलाका बदल चुका है। इस रामपथ के दोनों ओर अब उडुपी, महाराष्ट्र और उत्तर भारत के नाम पर बने बड़े-बड़े रेस्टोरेंट्स ने अपनी पकड़ बना ली है। चमकती नेमप्लेटें और एक जैसी यूनिफॉर्म पहने कर्मचारी अब उस जगह पर खड़े हैं, जहाँ कभी स्थानीय लोगों द्वारा पूड़ी-सब्ज़ी, चाय या समोसे बेचकर अपना घर चलाते थे। अब वही लोग सड़क के किनारे खड़े होकर देखते हैं कि कैसे उनकी रोज़ी-रोटी किसी और के हाथों में चली गई। रामपथ अब सिर्फ़ श्रद्धा का मार्ग नहीं, बल्कि बाज़ार बन गया है – जहाँ भक्ति के बीच रोज़गार की आवाज़ कहीं खो-सी गई है। एक स्थानीय दुकानदार ने मुस्कुराकर कहा, “अब तो पूरा इलाका पवित्र बना दिया गया है, 20 किलोमीटर तक मांस-मछली की बिक्री नहीं होती।” उनकी बात में श्रद्धा थी, पर कहीं-ना-कहीं मजबूरी भी।
अंतिम पड़ाव था लता मंगेशकर चौक, जहाँ उनकी याद में एक विशाल सितार बना है – जैसे संगीत की आत्मा शहर के बीच खड़ी हो। वहाँ से थोड़ी दूर सरीयू नदी की धार दिखी, जिसके किनारे की हवा ठंडी थी, शांत थी, और शहर के कोलाहल से एकदम अलग।
इस यात्रा में मैंने अयोध्या के दो चेहरे देखे – एक वो, जो नए रंगों में रंगी है, चौड़ी सड़कों, चमकदार लाइटों और मंदिरों से भरी। और दूसरा, वो पुराना फैज़ाबाद – जिसकी गलियों में बेगम अख़्तर की आवाज़ अब भी गूँजती है, जहाँ गुंबदों और छतरियों के नीचे समय ठहर-सा जाता है।
अयोध्या की यह यात्रा मेरे लिए सिर्फ़ एक संगठनात्मक दौरा नहीं थी – यह एक मुलाक़ात थी इतिहास और वर्तमान के बीच। मीडिया ने जिस शहर को हमेशा एक विवाद की तरह दिखाया, मैंने उसे एक सद्भाव और सह-अस्तित्व के शहर के रूप में महसूस किया।

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