हफ़्सा नाज़:

मैं माँ बन गई हूँ यक़ीन-सा नहीं आता है।
एक मासूम-सा चेहरा मानों पूरी ज़िंदगी बन गया है।
कहाँ मैं अपने नख़रे उठवाया करती थी घरवालों से,
और अब इस नन्ही-सी जान ने मेरी आँखो की नींद ओझल कर दी है।।

जो सपने संजोए थे मैंने, अपने लिए,
उसमें अब इसका भी हिस्सा बन गया है।
अपने लिए कुछ सोचने से पहले,
इसका ख़्याल अब आगे बढ़ गया है।।

शॉपिंग करने जाने से पहले, इसके बारे में सोचना होता है,
हाथों में अब पर्स की जगह, एक बेबी बेग साथ होता है।

यूँ पलक झपकते ही ज़िंदगी अलग हो गई है,
इस बदलाव की आदत मुझे अब होने लगी है।

अपने आस-पास की ज़िंदगियों को जब मैं देखती हूँ,
तो समझ में मेरे यह बात आती है,
हर किसी को ज़िंदगी में यह ख़ास इंसान नहीं मिलता,
बहुत को है इसकी तलाश, मगर साथ इसका नहीं मिलता।

इस नन्ही-सी गुड़िया में, मैं अपनी झलक देखती हूँ,
जो बचपन में मुझसे छूटा है, वो इसको देना चाहती हूँ।
ख़्वाब के मतलब थोड़े बदल-से गए हैं,
मगर यह बदलाव ख़ुशनुमा बहुत हैं।

लगता हैं एक छोटा साथी मिल गया है,
जिसकी आँखों में चमक मुझे देखकर आती है।
मेरी बेटी की पूरी दुनिया मैं हूँ,
और यह मेरी पूरी दुनिया बन गई है।

Author

  • हफ्सा नाज़ उत्तर प्रदेश की रहने वाली है और पिछले पांच सालो से युवाओ और महिलाओं के साथ कार्य कर रही है । हफ्सा को महिलाओ और युवाओ के विषय पर लिखना पसंद है ।

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