Mudita Chandra:

In the desert’s heart, they rise from dust and denial,
Bhil, Rajput, Meena,names etched by caste and survival.
Their veils hide scars, but not their fire,
Hands cracked from labour, still reaching higher.
Child brides turned leaders, widows turned voice,
Choosing resistance when denied choice.
Between patriarchy’s gaze and the landlord’s claim,
They carve their freedom, unnamed, untamed.
Intersection burns, yet from the ash they bloom
Rajasthan’s women, turning silence into room.

कविता का हिंदी सारांश :

यह कविता यह कहना चाह रही है कि राजस्थान की महिलाएँ लगातार संघर्ष कर रही हैं, साहस दिखा रही हैं और अपनी सामाजिक व आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रही हैं। वे पितृसत्ता, जाति व्यवस्था और अन्य कठिन परिस्थितियों के बावजूद अपने अधिकारों और आज़ादी के लिए लड़ रही हैं और अपने जीवन में बदलाव लाने की कोशिश कर रही हैं।

Author

  • मुदिता चंद्रा, उत्तराखंड से हैं। उन्होंने टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, मुंबई से सामाजिक कार्य में स्नातकोत्तर की है। मुदिता, वर्तमान में श्रुति संस्था (SRUTI) के साथ कार्यरत हैं, जहाँ वे जल, जंगल और ज़मीन से जुड़े मुद्दों पर समझ विकसित करने पर केंद्रित है।

    श्रुति में शामिल होने से पहले, उन्होंने मुंबई में सफाई कर्मचारियों के साथ, अनौपचारिक बस्तियों में आवास अधिकारों पर और बाल संरक्षण प्रणालियों के अंतर्गत काम किया है। इन अनुभवों ने उन्हें हाशिए पर खड़े समुदायों के लचीलेपन और सामूहिक कार्रवाई से मिलने वाली ताकत का प्रत्यक्षदर्शी बनाया है। उनका काम सामाजिक न्याय, सम्मान और बदलाव लाने की समुदायों की शक्ति में विश्वास से प्रेरित है।

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