बियारा कलेक्टिव:
बारिश आने से ठीक पहले बड़वानी जिले के साप्ताहिक हाटों में चहल-पहल बढ़ जाती है। इस साल इन हाथों में एक नवीनता थी। एक कोने में कुछ महिलाएँ बीजों की छोटी-छोटी थैलियाँ लेकर बैठीं थीं और उनके इर्द-गिर्द लोग बातें कर रहे थे। कोई लाल मक्का का बीज मांग रहा है, कोई तिल्ली, कोई कुल्थी तो कोई बरसों से संभालकर रखा खाटफुल्या। लोग केवल खरीद नहीं रहे, वे एक-दूसरे से पूछते हैं – “तुम्हारे गाँव में यह बीज अभी भी बचा है?” “इसकी खेती कैसे करते थे?” “किस बीज के साथ इसे लगाएंगे?” “इससे कौन-सा खाना बनता था?”
यहीं से समझ में आता है कि बीज केवल खेती की शुरुआत नहीं होते, वे संस्कृति की भी शुरुआत होते हैं।
आज जब खेती तेज़ी से बाज़ार और हाइब्रिड बीजों पर निर्भर हो गई है, तब मध्य प्रदेश के बड़वानी, धार और अलीराजपुर ज़िलों में “जूनला बियारा” पहल के माध्यम से हो रहे छोटे-छोटे प्रयास यह याद दिलाते हैं कि पारंपरिक बीजों को बचाना, दरअसल एक पूरे जीवन-दर्शन, खान-पान, स्मृतियों और सामुदायिक रिश्तों को बचाना है। पिछले कुछ महीनों में गाँवों में आयोजित पारंपरिक खाद्य मेलों, बीज प्रदर्शनियों, साप्ताहिक हाटों और स्थानीय आदिवासी संगठनों की बैठकों ने इस बात को बहुत गहराई से सामने रखा।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि इन कार्यक्रमों का केंद्र केवल बीज नहीं था। केंद्र में लोग थे, विशेषकर आदिवासी महिलाएँ, बुज़ुर्ग, युवा और वे स्थानीय संगठन जो अपनी संस्कृति को जीवित रखने का काम चुपचाप कर रहे हैं।
पारंपरिक खाद्य मेलों में जब मक्का की राबड़ी, घाट, भादी की खीर, बाजरे का खीचड़ा, कुल्थी का खाटो और खाटफुल्या से बने व्यंजन एक साथ परोसे गए, तो यह केवल भोजन नहीं था। लोग खाते-खाते अपने बचपन की बातें करने लगे। किसी ने बताया कि यह खाना पहले लगभग हर घर में बनता था। किसी ने कहा कि अब बच्चों ने इनका स्वाद तक नहीं चखा। भोजन ने बातचीत का रास्ता खोला और बातचीत ने स्मृतियों का। कई महिलाओं ने बताया कि इन व्यंजनों के साथ खेती के मौसम, त्योहार और पारिवारिक परंपराएँ भी जुड़ी थीं। धीरे-धीरे यह स्पष्ट होने लगा कि भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि समुदाय की सामूहिक स्मृति है।
इसी तरह गाँवों में लगाई गई बीज प्रदर्शनियाँ बहुत रोचक थीं। कुछ रंगीन साड़ियों के पर्दे, उन पर बीजों की थैलियां लटकी हैं और आसपास खड़े लोग। साथ ही काफी बीजों के कण इस पर भी लगे थे। लेकिन वास्तव में यही प्रदर्शनियाँ संवाद के जीवंत केंद्र बन गईं। लोग एक-एक बीज को पहचानते, उसका स्थानीय नाम बताते, उससे बनने वाले भोजन याद करते और खेती के पुराने तरीकों पर चर्चा करते। कई बुज़ुर्गों ने बताया कि कभी यही बीज उनके खेतों की पहचान थे, लेकिन अब धीरे-धीरे गायब हो रहे हैं। वहीं नई पीढ़ी, विशेषकर नई बहुओं और बच्चों ने स्वीकार किया कि उन्होंने इनमें से कई बीज पहली बार देखे हैं। एक ही स्थान पर पीढ़ियों के बीच ऐसा संवाद अपने आप में सांस्कृतिक संरक्षण की प्रक्रिया बन गया।
लुप्त होने की बातों के बीच, जिनके पास उनमें से कुछ बीज थे, वे बहुत गौरवान्वित महसूस कर रहे थे।
इन चर्चाओं के दौरान कई ऐसे प्रसंग सामने आए जो शायद किसी किताब में दर्ज नहीं हैं। एक बुज़ुर्ग आदिवासी महिला ने बताया कि पहले बीज बोना केवल खेती का काम नहीं होता था। पूरा गाँव अच्छे कपड़े पहनकर खेतों में जाता, गीत गाता और मिलकर बुवाई करता। खेती एक उत्सव थी, जिसमें श्रम और संस्कृति अलग-अलग नहीं थे। आज जब खेती अधिक व्यक्तिगत और बाज़ार आधारित होती जा रही है, तब ऐसे अनुभव हमें बताते हैं कि कृषि कभी सामुदायिक जीवन का सबसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक आयोजन हुआ करती थी।
इन प्रयासों में साप्ताहिक हाटों की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण दिखाई देती है। आम तौर पर हाट को लोग खरीद-बिक्री की जगह मानते हैं, लेकिन आदिवासी इलाकों में हाट हमेशा से ज्ञान, रिश्तों और परंपराओं के आदान-प्रदान का स्थान भी रहे हैं। सेंधवा, डही, वालपुर, सोंधवा और निवाली के हाटों में लगाए गए पारंपरिक बीजों के स्टॉल पर लोग केवल बीज लेने नहीं आए। वे अपने अनुभव लेकर आए। बुज़ुर्ग किसान अधिकांश बीजों को तुरंत पहचान लेते थे, जबकि युवा उत्सुकता से पूछते थे कि इन्हें बचाना क्यों ज़रूरी है। कुछ किसानों ने बताया कि उनके पास अभी भी कुछ देशी बीज सुरक्षित हैं। कुछ ने अफसोस जताया कि कई किस्में अब उनके गाँवों से लगभग समाप्त हो चुकी हैं। बीजों के साथ कहानियाँ भी एक किसान से दूसरे किसान तक पहुँचती रहीं।
इन हाटों की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि यहाँ संरक्षण किसी भाषण से नहीं, बल्कि सहभागिता से हुआ। लोगों ने अपनी ज़रूरत के अनुसार बीज लिए, अपने अनुभव साझा किए और भविष्य में फिर से पारंपरिक खेती करने की इच्छा भी व्यक्त की। यह दिखाता है कि यदि समुदाय को अवसर और संसाधन मिलें तो पारंपरिक खेती केवल अतीत की बात नहीं रहेगी, बल्कि भविष्य का भी हिस्सा बन सकती है।
इन सभी प्रयासों में यदि किसी की भूमिका सबसे अधिक दिखाई देती है तो वह हैं स्थानीय आदिवासी महिलाएँ। उन्होंने केवल भोजन नहीं बनाया, बल्कि बीजों की पहचान की, उनके उपयोग बताए, खेती की पुरानी परंपराओं को याद किया और नई पीढ़ी के साथ अपना ज्ञान साझा किया। कई जगह कार्यक्रम स्थानीय महिलाओं के घरों में आयोजित हुए। उन्होंने आयोजन की ज़िम्मेदारी भी निभाई और संवाद की भी। यह हमें याद दिलाता है कि आदिवासी समाज में खाद्य संस्कृति और बीजों का ज्ञान लंबे समय से महिलाओं के पास सुरक्षित रहा है। इसलिए जब हम पारंपरिक कृषि की बात करते हैं, तो वास्तव में हम महिलाओं के ज्ञान और श्रम की भी बात कर रहे होते हैं।
स्थानीय आदिवासी संगठनों ने भी इस पूरी प्रक्रिया को केवल कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहने दिया। आदिवासी मुक्ति संगठन जैसी बैठकों में बीज प्रदर्शनियों को जोड़ने से अधिक लोगों तक यह संवाद पहुँचा। लोगों ने सवाल पूछे, अपने अनुभव साझा किए और यह महसूस किया कि पारंपरिक बीजों का संरक्षण किसी एक संस्था का काम नहीं, बल्कि पूरे समुदाय की ज़िम्मेदारी है। यही सामुदायिक भावना इन कार्यक्रमों की सबसे बड़ी ताकत बनकर सामने आई।
इन सब प्रयासों के माध्यम से बड़वानी और अलीराजपुर ज़िलों के लगभग 500 किसानों ने इन बीजों को अपनी इच्छा से लिया।
ये बीज किसी बीज बैंक में नहीं बल्कि स्वयं उन लोगों के खेतों में संरक्षित रहेंगे जिनके पुरखों ने इन्हें, पीढ़ियों तक चयन कर-कर के विकसित किया और संजोया था।
फ़ोटो सौजन्य: सौम्या चौहान










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