चाँदनी:
खेती का मतलबै आहे ही महिला। बीज बोवे, धान रोपना, निराई-गुड़ाई करब, फसल काटब अउर अनाज के भंडारन करब – इ सब कामन मा महिलन का सबसे बड़ा योगदान रहत आहे। इन्हीं के साथ-साथ घर के जानवरन का देख-रेख करब, गोबर-खाद इकट्ठा करब, चारा लाउब, दूध दुहब कै काम महिला लोगन ज्यादा करत हन।
खेत से जौन उपज आवत ह, ओकर रख-रखाव का सारा काम भी घरे की महिलन अउर लड़िकियन करत रहत आहें। हमऊ अपने घर की बड़ियन से पूछिन कि पहिले अगली फसल का बीज कहाँ से आवत रहा। त उनहन बताइन कि जौन उपज होत रही, ओही मा से बीज भी घर मा तैयार होई जात रहा। आज कै जइसन नाही बाये कि हर बेर बीज बाजार से मँगावे परत आहे।
हाँ, उपज अब अधिक होत आहे, पैसा भी अधिक लागत आहे। फसल तैयार होय का बाद बिकत नइखे, अउर अगली फसल का खरच पहिले लगावा परत आहे। एही से नगद कमाय का चलन बढ़ गवा आहे। मेहनत त अबहूँ उतनै होत आहे, पैसा मर्द बाहर से कमाए कै लावत आहे। एही से घर-समाज मा नगद लावै वाला का मान अधिक होइ गवा आहे।
एही से खेत मा काम करै वाली महिलन का काम अउर सम्मान नइखे मिल पावत आहे। लोग ओकर काम का घरेलू काम समझ लिहत हन। हमार गाँव-समाज मा महिलन का अधिकार का बात कउनो नइखे समझत। सबका कहब ह कि इन्हीं का काम आहे, करबै करब।
जौन जमीन पै महिला लोगन सबेरे-संझा काम करत हीं, ऊ जमीन कउनो दिन उनका नइखे हो पावत। महिला कउनो बाप के खेत मा काम करी, कउनो पति के खेत मा काम करी, पैकर आपन खेत कउनो नइखे होत।
अगर मजूरान से काम करावा जाय तौ दुई सौ रुपया देवा परत है, पर घरे की महिला अउर बिटियान से जीवन भर फिरिये मा काम करावा जात ह। कानून मा बाप की जमीन मा बेटी का हक आहे, पर भाई से बटवारा कै डर से छोड़ दिहा जात ह।
फसल मा का बोवा जाय, कब बेचा जाय – इ फैसला मर्द लोगन करत हीं, जबकि खेत मा काम महिला करत आहे। अधिकतर जमीन मर्दन का नाम मा रहत ह। संपत्ति का अधिकार न होय से बैंक से लोन, किसान क्रेडिट कार्ड लेबे मा भी दिक्कत होत ह।
खेती मा महिलन का योगदान का लोग परिवार का काम मान लिहत हन, एही से उनका ना मजदूरी मिलत ह, ना उचित पहिचान।
15 अक्टूबर – अंतरराष्ट्रीय ग्रामीण महिला दिवस
इ दिन खाली खेती-किसानी करै वाली महिलन का योगदान अउर पहिचान देबे का खातिर मनावा जात ह। 15 अक्टूबर का कहब ह कि “खेत मा काम करै वाली महिला का किसान कहो, कागज देओ अउर ओकर हक भी देओ।”
ग्रामीण महिला दिवस ओ धूप ह, जो सीधे खेत मा काम करै वाली महिला परत ह। एही से महिलन का उनका पहिचान अउर अधिकार मिलै का चाही। किसान का रूप मा उनका सम्मान अउर पहचान मिलै का चाही।

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