गोण काठा दिहे आवहोत

यह कविता पावरी भाषा में लिखी गयी है। यह भाषा पश्चिम मध्य प्रदेश और उससे लगे महाराष्ट्र के भील, पावरा आदिवासियों द्वारा बोली जाती है।शहरों

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केवल घर की नींव पूजने वालों सुन लो

ज्ञानेन्द्र प्रताप सिंह: एक सदी से केवल घर की नींव पूजने वालों सुन लो;इक दिन तुमसे ये दीवारें कुंठित होकर प्रश्न करेंगी। नदियाँ पूजो, सागर

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तुम मौज उड़ाया करते हो

शुभम: तुम मौज उड़ाया करते होतुम मौज उड़ाया करते होयूं धुआं उड़ाए जाते हो, तेल का दाम बढ़ाए जाते होयूं लहू बहाए जाते हो, यूं

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जब सडकें बनती हैं

सौरभ: जब सडकें बनती हैंतब जाकर कोई शहरतरक्की की पहली सीढ़ी पाता हैतहसील ऑफिस के पासप्राइवेट बैंक का ब्रांच भीउसके बाद ही खुल पाता हैमुख्यधारा

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ज़िंदगी में रिश्तों की अहमियत

गोपाल पटेल: इस दुनिया में रिश्ते बनाना आसान है, लेकिन रिश्तों को निभाना बहुत कठिन है। जो इसकी अहमियत जानता है , वही इसे इत्मिनान

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