संजीव कुमार :
कुछ पल बैठूं तेरे साथ
बयां करूं अपने हालत,
जिंदा हूं कैसे यह,सहकर
ज़बरन भ्रष्टाचारी कुविचार।
कह रहे हैं लोग देवी का रूप ,
फिर क्यों समझे रण- धूल स्वरूप।
ना गूंज रही जनता, की पुकार
और लगता बेहरी है, सरकार
यहां बैठे दरिंदे, घात लगाए एक शिकार
ना देख रहे बच्चा, ना देख रहे अबला नारी
अगले दिन आए हम फिर ,
लेके हाथों में केंडल और मशाल
फिर लगा रहे इंसाफ की, बुहार
चला यह कुछ दिन सिलसिला,
फिर थम गई यह भी पुकार।
एक ख्वाहिश है मांगी
जो दिला सके मुझे आजादी।
कर सके जो दूर, भ्रष्टाचार
मुझे चाहिए वो अधिकार।।
कुछ पल बैठूं तेरे साथ
बयां करूं दिल के हालत,
चाहती हूँ, खुद से रूबरू हो जाऊं,
कुछ पल सपनो में ही खो जाऊं।
सोचूं , कब तक सहूंगी यह अत्याचार
जिसने छीने मुझे मेरे अधिकार
तोड़ दूंगी सारे सामाजिक, दुरविचार
छोड़ के बंधन की जंजीरें, लेके हाथों में हाथ।
अब हमें खुद लड़ना होगा ,
एक साथ आगे बढ़ना होगा।
दिखा देंगे नारीशक्ति और मिटा देंगे
द्वेष दुष्टाचारी हथियार,
मिटा देंगे द्वेष दुष्टाचारी विचार…….

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