विकास कुमार :
12वें विश्व नास्तिक सम्मेलन का सफलतापूर्वक आयोजन 4-5 जनवरी 2025 को आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा स्थित नास्तिक सेंटर में किया गया। इस सम्मेलन में देशभर से 300 से अधिक नास्तिक, तर्कवादी और मानवतावादी शामिल हुए। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में महिलाओं, स्थानीय युवाओं और छात्रों की भी सक्रिय भागीदारी देखने को मिली। सम्मेलन का विषय “सकारात्मक नास्तिकता, आलोचनात्मक सोच और धर्मनिरपेक्ष कार्य” (Positive Atheism, Critical Thinking, and Secular Action) था।
पहला नास्तिक सम्मेलन 1972 में विजयवाड़ा के नास्तिक सेंटर के संस्थापक गोरा के नेतृत्व में आयोजित किया गया था।
गोरा का परिचय
गोपालकृष्ण गोरा, जिन्हें आमतौर पर गोरा के नाम से जाना जाता है, भारत के प्रमुख समाज सुधारक और नास्तिक विचारधारा के समर्थक थे। उनका जन्म 15 नवंबर 1902 को हुआ था। उन्होंने भारत में तर्कवाद, वैज्ञानिक सोच और नास्तिकता को बढ़ावा देने के लिए अपने जीवन को समर्पित किया। भारत के पहले नास्तिक सेंटर की स्थापना 1940 में महान स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारक दंपति गोरा और सरस्वती गोरा ने की थी, जिसे 1947 में विजयवाड़ा स्थानांतरित किया गया। यह सेंटर आज भी गोरा दंपति की विरासत को आगे बढ़ाते हुए सामाजिक सुधार और धर्मनिरपेक्षता के प्रसार के लिए अग्रसर है। महात्मा गांधी के नजदीकी सहयोगी होने के बावजूद, उनके विचार धार्मिक दृष्टिकोण में भिन्न थे। गोरा ने “पॉजिटिव एथीइज़्म” (सकारात्मक नास्तिकता) की अवधारणा को विकसित किया, जो नास्तिकता को केवल ईश्वर के अस्तित्व को नकारने तक सीमित नहीं रखती, बल्कि इसे सामाजिक सुधार और मानवता के विकास का एक सक्रिय साधन मानती है। उनका मानना था कि धार्मिक विश्वासों और परंपराओं के आधार पर समाज में जो भेदभाव, अंधविश्वास और असमानताएं फैली हैं, उन्हें खत्म करने के लिए तर्कसंगत सोच और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है। उनके साथ उनकी पत्नी एवं सामाजिक कार्यकर्ता सरस्वती गोरा भी हमेशा कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी रहीं। गोरा की मृत्यु के पश्चात् भी सरस्वती गोरा ने नास्तिक सेंटर को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।
नास्तिक सम्मेलन में समकालीन प्रासंगिक मुद्दों पर हुई गहन चर्चा
पहले दिन द्रविड़ कड़गम के अध्यक्ष के वीरमणि ने वीडियो कांफ्रेंस के जरिए दो दिवसीय 12वें विश्व नास्तिक सम्मेलन का उद्घाटन किया। 92 वर्षीय के वीरमणि तमिलनाडु के विख्यात तर्कवादी हैं, वे पेरियार के भी सहयोगी रह चुके हैं। उद्घाटन समारोह के दौरान नास्तिक केंद्र के अध्यक्ष डॉ. जी समाराम भी उपस्थित थे।
दो दिवसीय सम्मेलन में “अंधविश्वासों का मुकाबला करने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास,” “मानवाधिकार, धर्मनिरपेक्षता और नास्तिक मूल्य,” और “लोकतंत्र और सकारात्मक नास्तिकता” जैसे विषयों पर सत्र एवं पैनल डिस्कशन आयोजित किए गए। दूसरे दिन युवा सम्मेलन में “लोकतांत्रिक मूल्यों और वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने में युवाओं की भूमिका, “आलोचनात्मक सोच और तर्कसंगत कार्रवाई के लिए डिजिटल स्पेस का रचनात्मक उपयोग,” और “उग्रवाद से निपटने में युवाओं का योगदान” जैसे विषयों पर चर्चा हुई। सभी वक्ताओं ने विषयों पर बेहद प्रभावशाली तरीके से अपनी बात रखी। युवाओं ने भी उत्साहपूर्वक भाग लेते हुए गहन और प्रासंगिक सवाल पूछे, जिसने चर्चा को और अधिक समृद्ध किया।
पुस्तक प्रदर्शनी, सांकृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किये गए |
इस कार्यक्रम में गोरा द्वारा लिखित “सकारात्मक नास्तिकता” पुस्तक का हिंदी अनुवाद का विमोचन भी किया गया।
आयोजन स्थल पर नास्तिकता और तर्कशील चिंतन पर आधारित एक पुस्तक प्रदर्शनी भी आयोजित की गई थी। इसमें गोरा, पेरियार जैसे महान व्यक्तित्वों द्वारा रचित किताबें और अन्य तर्कशील पत्रिकाएं भी प्रदर्शित की गई थीं। सम्मेलन में सांस्कृतिक प्रदर्शनी के दौरान कलाकारों ने नाटक के माध्यम से गोरा के जीवन और उनके रूढ़िवाद के खिलाफ आजीवन संघर्ष को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। प्रसिद्ध तर्कवादी डॉ. नरेंद्र नायक ने अपने वैज्ञानिक प्रयोगों के माध्यम से चमत्कारों के पीछे के तथ्यों को उजागर किया और ढोंगी बाबाओं तथा धोखेबाजों की पोल खोली।
सम्मेलन के प्रतिभागियों ने नास्तिक सेंटर परिसर में स्थित गौरा टेक्नो हब और गौरा साइंस क्लब का दौरा किया। इसके अलावा, नास्तिक सेंटर द्वारा धर्मनिरपेक्ष सामाजिक कार्यों पर आधारित एक फोटो प्रदर्शनी का भी आयोजन किया गया।
नास्तिकों और तर्कवादियों ने तर्कशील चिंतन के व्यापक प्रसार का संकल्प लिया।
12वें विश्व नास्तिक सम्मेलन ने देशभर के नास्तिकों और तर्कवादियों को एकजुट किया और आपसी विमर्श के लिए एक उपयुक्त मंच प्रदान किया। सभी प्रतिभागियों ने वर्तमान समय में धार्मिक कट्टरता के बढ़ते प्रभाव और तर्कशील चिंतन पर हो रहे प्रहार की चुनौतियों को समझा और भविष्य में इन रूढ़िवादी शक्तियों से मिलकर लड़ने का आह्वान किया। समाज को वैज्ञानिक और तर्कशील दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है, ताकि हम एक प्रगतिशील और समतामूलक समाज की दिशा में कदम बढ़ा सकें।
मैंने नास्तिक सेंटर के बारे में बहुत कुछ सुना था। इस बार पहली बार नास्तिक सम्मेलन में भाग लेने और सेंटर की गतिविधियों को नजदीक से जानने-समझने का अवसर मिला।
जय इंसान! जय विज्ञान! हम सब हैं प्रकृति के संतान!

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