सुरेश डुडवे: अब आ गया समय अब नहीं तो कब अब आ गया समय नींद से जगने का अपने आप… READ MORE
अजय कन्नौजे: प्रकृति से ही लिया है, तो उसे लौटाना पड़ेगा, प्रकृति से ही जीवन है, तो उसे मनाना पड़ेगा।… READ MORE
आलोक सोनकर: मैं रात के अंधेरे में जब भी छत की तरफ देखता हूं, तो कुछ अपूर्ण सपने मेरे सामने… READ MORE
(किसान आन्दोलन के समर्थन में लिखी गई एक कविता) तेज़ झोंके हवाओं के आते रहे; और पानी बरसता रहा रात… READ MORE
युवानिया पत्रिका, युवाओं को उनकी सोच को कलमबद्ध करने का एक मंच देने का प्रयास है। इस पत्रिका के माध्यम से हम मुख्यतः युवा मन के विचारों को सामने लाना चाहते हैं। साथ ही आस-पास के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिदृष्य पर युवाओं के विचारों को भी साझा करना चाहते हैं।
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