(किसान आन्दोलन के समर्थन में लिखी गई एक कविता)

तेज़ झोंके हवाओं के आते रहे;

और पानी बरसता रहा रात भर।

जितने मेरे डर थे जाते रहे,

और पानी बरसता रहा रात भर।

बीसियों खौफ़ हमे डराते रहे,

घुप अंधेरे में हम कंप-कंपाते रहे।

बहुत चाहा कि शमा जला ले मगर,

माचिस की एक भी तीली जल न सकी। 

बस जुगनू थे, जो जगमगाते रहे,

और पानी बरसता रहा रात भर।

Author

  • शुभम, उत्तर प्रदेश से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं। वह अवध पीपुल्स फोरम के साथ जुड़कर युवाओं के साथ उनके हक़-अधिकारों, आकांक्षाओ, और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर काम करते हैं।

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