आज के भारत में क्या है बंधुआ मज़दूरी की तस्वीर

बंधुआ मज़दूरी या बेगार की प्रथा को इतिहास के पन्नों में खोजने की कोशिश करेंगे तो जाने कितनी परतों को पलटना होगा। बात आज़ाद भारत की ही हो तो मानवता के सबसे बड़े कलंक में से एक बंधुआ मजदूरी पर कानूनी रोक लगे अभी पूरे 50 साल भी नहीं हुए हैं। एक आज़ाद मुल्क बन जाने के बाद भी हमें इसके खिलाफ कानून भर बनाने के लिए दो दशक से भी ज़्यादा का समय लग गया, अब उस कानून का ज़मीन पर पूरी तरह से अमल होने में भी तो समय लगना वाजिब ही है। कहने को तो छुआछूत, जाति आधारित भेदभाव, दहेज प्रथा, बाल श्रम, मानव तस्करी, और बालविवाह जैसी ना जाने कितनी कुप्रथाएं गैरकानूनी हैं, पर यह सब होता तो है ही। 

कई बार सोचता हूँ कि इस तरह इन्सानों से जानवरों की तरह काम लेने वाले अपने मन को कैसे समझाते होंगे? वैसे कहने को तो जीवों पर दया करो की बात भी लोग ही कहते हैं। लेकिन मेरे इस सवाल का जवाब एक दोस्त ने दिया, उसने कहा कि खराब लगने पर शायद वो मंदिरों, मस्जिदों या अनाथालयों में चंदा देते होंगे या शायद “गरीबों” को खाना भी खिला देते होंगे। खैर, बंधुआ मज़दूरी के मुद्दे पर भावुक हो जाना इस लेख का मकसद बिल्कुल भी नहीं है। इसका मकसद बंधुआ मजदूरी के खिलाफ बने कानून, मजदूरों को बचाने और आरोपियों को सजा देने/दिलवाने की प्रक्रिया का छोटा सा विश्लेषण करना है। 

साल 1976 में बंधुआ मज़दूरी के खिलाफ, बन्धित श्रम पद्धति (उत्सादन) अधिनियम, 1976 (अंग्रेज़ी में बॉन्डेड लेबर (सिस्टम) एबोलिशन एक्ट, 1976) नाम से संसद में एक कानून पास किया गया था। इस कानून के माध्यम से देश के विभिन्न राज्यों में अलग-अलग नाम से चल रहे बंधुआ मज़दूरी के सभी प्रारूपों को और पुश्तैनी कर्जे को चुकाने के लिए आगामी पीढ़ियों के काम करने की बाध्यता को गैरकानूनी घोषित कर दिया गया। इस कानून के तहत बंधुआ मज़दूरी कराने वाले को सजा के प्रावधान के साथ-साथ बचाए गए श्रमिकों के पुनर्वास की व्यवस्था भी की गई है। लेकिन हर कानूनी प्रक्रिया की ही तरह इसमें भी कई पेंच हैं जिनकी हम आगे चर्चा करेंगे। 

कानून बन जाने के बाद भी कुप्रथाओं का ज़िंदा रहना कोई नई बात नहीं है, बंधुआ मज़दूरी की भी कमोबेश यही हालत है। आए दिन देश के विभिन्न राज्यों से मज़दूरों के बचाव की खबरें आती रहती हैं। अभी हाल ही में (नवंबर महीने में) छत्तीसगढ़ की विजिट के दौरान हमने ऐसे दो अलग-अलग मामले देखे जहां पर झारखंड के चतरा जिले के एक ईंट भट्टे से एक परिवार और पूना (महाराष्ट्र) की एक गुड़ फैक्ट्री से 12 मज़दूरों को छुड़ाया गया था। लेकिन किसी भी आरोपी के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाही हुई हो, इसकी पुष्टि नहीं हो पाई। ये मज़दूर तो बस जान बच जाने से ही खुश नज़र आ रहे थे, और कानूनी पचड़े में तो जिनके पास संसाधन होते हैं वह भी नहीं पड़ना चाहते, ये तो अनाज और रोज़गार के मोहताज मज़दूर थे। 

सरकारी दस्तावेजों में भी देखेंगे तो पाएंगे कि कितने बंधुआ मजदूर बचाए गए, कितनों का पुनर्वास हुआ और इसमें कितना खर्च  हुआ जैसी जानकारी ज़रूर मिल जाएगी लेकिन कितने आरोपियों पर कानूनी कार्रवाही हुई इसका कोई आंकड़ा आसानी से नहीं मिल पाता। बंधुआ मजदूरी के खिलाफ कानून और प्रशासन की प्रक्रियाओं के विश्लेषण से पहले यह समझना बहुत ज़रूरी है कि कौन लोग हैं जो बंधुआ मजदूर बनते हैं और कौन लोग हैं जो यह करवाते हैं? 

पूना से छुड़ाए गए मज़दूर

यह समझने के लिए वापस पूना से छुड़ाए गए मजदूरों का ज़िक्र करूंगा। उनमें से एक मजदूर सुशीला देवी बताती हैं “लॉकडाउन के चलते कोई रोजगार का इंतज़ाम नहीं हो पा रहा था, राशन कार्ड नहीं था इसलिए पीडीएस दुकान से सरकारी मदद भी नहीं मिल पा रही थी। खाने की बड़ी समस्या हो गई थी, ऐसे में हम कहीं भी काम करने के लिए तैयार थे।” जब खाने जैसी जीने की बुनियादी ज़रूरत के लिए ही किसी को संघर्ष करना पड़े तो 2-3 महीने के काम के बदले (1 दिन में 12 घंटे) 10-12 हज़ार की रकम के लिए भी वह आराम से तैयार हो जाते हैं। सुशीला देवी जैसे जाने कितने मजदूर ईंट भट्टा मालिकों और अन्य छोटे स्तर के फैक्ट्री मालिकों के झांसे में आ जाते हैं। वहाँ जाकर उन्हे शायद कुछ पैसे भी मिल जाते हों लेकिन 12-15 घंटे के काम के बदले दुर्व्यवहार और मार-पीट मिलना लगभग तय ही होता है, वह भी बिना किसी ओवरटाइम के। 

सुशीला देवी की बेटी लीलावती जो अपने पति के साथ पूना गई थी, बताती हैं कि जब स्थानीय प्रशासन के अधिकारियों और पुलिस ने उन्हें वहाँ से छुड़ाया तो ना तो कोई उन्हें कोई रेसक्यू सर्टिफिकेट दिया गया और ना ही उनके पुनर्वास की कोई बात उन्हें बताई गई। ज़्यादातर मामलों में यही होता है, बचाए गए मजदूरों को उनके घर भेज दिया जाता है, आरोपियों के खिलाफ कोई गवाही देना वाला होता नहीं है। यही आरोपी फिर से नए शिकार खोजते हैं, और अपने मन का बोझ शायद “गरीबों” को खाना खिलाकर कम कर लेते हैं। 

बंधुआ मज़दूरी के मामले में पीड़ित के बचाव के बाद पुलिस को एफ़आईआर दर्ज करनी होती है और आरोपी पर तुरंत क्रिमिनल लॉ (अमेंडमेंट) एक्ट 2013 की धारा 370 के तहत केस दर्ज करना ज़रूरी होता है, साथ ही समाज कल्याण विभाग को भी इस प्रक्रिया में शामिल करना होता है।  इसके बाद पुलिस द्वारा चार्जशीट तैयार होने के बाद पीड़ित को रेसक्यू सर्टिफिकेट समेत अदालत के समक्ष पेश करना होता है। लेकिन पीड़ित तो पहले ही अपने घर पहुँच गया होता है, वह भी बिना रेसक्यू सर्टिफिकेट के। अच्छा एक बात और यह भी है कि बंधवा मजदूरी के कानून के तहत पीड़ित के लिए 1 लाख रु. के मुआवज़े की भी व्यवस्था है, यदि पीड़ित महिला या नाबालिग हो तो मुआवज़े की राशि 2 लाख होती है। चलिये बड़ी अच्छी बात है लेकिन दिक्कत यह है कि मुआवज़ा तभी मिलता है जब आरोपी पर आरोप साबित हो जाता है। वैसे पीड़ित को बचाने के तुरंत बाद ही 20 हज़ार रु. देने का प्रावधान भी कानून में है, फिर चाहे आरोप साबित हो या ना हो। लेकिन झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, यूपी और बिहार आदि पिछड़े राज्यों के सुदूर इलाकों में रहने वाले लोगों को यह नियम-कानून कौन बताएगा?     

किसी बंधुआ मजदूर को बस फैक्ट्री मालिक के चंगुल से छुड़ा लेना और वापस घर भेज देना उसे बचाना नहीं कहा जा सकता। कल को फिर से कोई लॉकडाउन लगा या 2-3 महीने बाद अनाज खतम हो गया तो शायद सुशीला देवी जैसे लोगों को फिर किसी ईंट भट्टे या गुड़ फैक्ट्री में काम करने जाना ही पड़ेगा। और क्या केवल अनाज ही इनकी एक ज़रूरत है? केवल 2 दिन में ही मैं छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में 17 ऐसे लोगों से मिला जिन्हें या तो बंधुआ मज़दूरी से बचाया गया या वो खुद वहाँ से जान जोखिम में डालकर निकल आए। 2015 से 2019 के बीच 3 लाख 13 हज़ार से कुछ ज़्यादा ही बंधुआ मजदूरों की पहचान/बचाव और 2 लाख 93 हज़ार से कुछ अधिक का पुनर्वास सरकारी आंकड़ों के अनुसार हुआ है। लगभग 20 हज़ार लोग या तो मर गए या उनके पते की जानकारी सरकार के पास नहीं है।

बहुत हद तक संभव है कि पहले की तरह खुलेआम बंधुआ मजदूरी ना होती हो, लेकिन ईंट भट्टों, छोटी फैक्ट्रियों, शहरों के को धनी लोगों के घरों में रहकर काम करने वाले लोगों को अक्सर एड्वान्स में पैसा देकर मनचाहा काम करवाया जाता है। साथ ही मानसिक और शारीरिक यातनाएँ अलग। असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों के साथ अक्सर यह होता है, दिन के 12 से 15 घंटे काम के बदले न्यूनतम मज़दूरी तक उन्हें नहीं मिल पाती है। यह बंधुआ मज़दूरी नहीं तो और क्या है? वेश्यालयों में तस्करी कर लाई गई बच्चियों/महिलाओं से जबरन काम करवाया जाना भी तो बंधुआ मज़दूरी का ही एक रूप है।

Author

  • सिद्धार्थ, सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं और दिल्ली की संस्था श्रुति के साथ काम कर रहे हैं। 

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