रंजना भगोरा:
राजस्थान असंगठित मजदूर यूनियन में मेरी दादी और मां काम से जुड़ी हैं। इसमें महिलाएं मिलकर नरेगा में काम करती हैं और पूरे काम का पूरा दाम लेती हैं। इस संगठन ने हमारे गाँव मालमाथा में युवा क्लब शुरू किया था। दादी और मां मीटिंग में गई थीं। उन्होंने नाम लिखवाया और घर पर आकर बोलने लगीं, “तुम्हारा नाम लिखवा दिया है, तुम जाओगी क्या?” मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या है। फिर दादी ने समझाया कि मीटिंग में यह बात हुई कि लड़कियों को साथ में पढ़ना, अंग्रेजी में लिखना और खेलना सिखाएंगे। वे यह सब सिखाएंगे।
दादी मुझे साथ लेकर आईं और पहले दिन तो 22 लड़कियाँ आईं। खेल खेला, टेढ़ा-मेढ़ा चला, और अंग्रेजी की किताब पढ़ी। हमारे सपनों के बारे में पूछा और आईने वाला खेल खेला। मुझे बहुत अच्छा लगा और मैं हर रविवार को जाने लगी थी। लड़कियों के साथ रहना, बैठना, पढ़ना, खेलना मुझे अच्छा लगता था। पहले तो ऐसा था कि स्कूल से आकर घर पर पढ़ाई करो, घर का काम करो, पर खेलने के लिए जाने ही नहीं देते थे। मुझे घर पर रहना बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था। और मैं हर रविवार को युवा क्लब में जाती थी।
युवा क्लब में बड़ी लड़कियों ने धीरे-धीरे आना बंद कर दिया और मैं अकेली थी, जो हर रविवार को जाती थी। मैंने धीरे-धीरे युवा क्लब चलाना भी सीखा। परेशानियाँ भी आईं। मुझे किसके सामने क्या बोलना है, कैसे बोलना है, यह समझ नहीं आता था। अंग्रेजी पढ़ना नहीं आता था। मेरी दादी कहती थीं कि जाओगी तो ही सीखोगी न। दादी और मां मुझे बहुत समझाती हैं। अब मैं 3 साथियों के साथ मिलकर 6 गाँवों में युवा क्लब चलाती भी हूँ।
फिर नए काम, नई सीख, नई खुशियाँ…
युवा क्लब चलाते-चलाते डेढ़ साल में मैंने बहुत कुछ नया सीखा, नया किया, जिसके बारे में मैं लिखना चाहती हूँ।
यूनियन ने 8 मार्च को महिला दिवस मनाया था। उस दिन मैंने पहली बार शायरी बोली। बहुत डर लग रहा था। डरते-डरते बोला, फिर मैं बहुत खुश हुई कि “हाँ, मैं बोल सकती हूँ।”
गाँव छोड़कर घूमने भी पहले कभी नहीं गई थी। पहली बार यूनियन के 3 दिवसीय आवासीय प्रशिक्षण में गई और मुझे बहुत अच्छा लगा। पुलिस बनने के अपने सपने के बारे में बोलते-बोलते मैं रोने लगी थी।
राज्य स्तर पर जवाबदेही कानून को लेकर निकली यात्रा में शामिल हुई, राजसमंद गई। वहाँ भी मैं बहुत खुश हुई कि पहली बार दूसरे ज़िले में गई थी। और जवाबदेही यात्रा के बारे में चर्चा की। पहली बार रेल में बैठी, जयपुर भी गई।
राजस्थान असंगठित मजदूर यूनियन के सभी साथियों ने मिलकर हमें “सृजन सीख और सिनेमा” कार्यक्रम में अजमेर भेजा था। वहाँ लड़कियों और महिलाओं ने फिल्म बनाई थी। वह बहुत अच्छी लगी। एक फिल्म घूँघट के बारे में बनाई थी, वह भी अच्छी लगी।
फिर राज्य से बाहर हमें “यूथ फेस्टिवल” में महाराष्ट्र भेजा गया था। वह भी बहुत अच्छा लगा, क्योंकि पहली बार दूसरे राज्य में गई थी। घर पर आई तो मां-पापा और दादा-दादी भी बहुत खुश थे। वे कहते थे, “हमारी बेटी वहाँ गई जहाँ हम नहीं गए थे।”
यूनियन की युवा टीम ने डॉ. भीमराव अंबेडकर जयंती मनाई गई थी। हमने एक नाटक किया था। फिर मैंने डॉ. भीमराव अंबेडकर के बारे में बोला था, तो गिफ्ट भी दिया था।
इस साल गर्मियों में कक्षा 6 से कक्षा 9 तक की लड़कियों के साथ सात दिन का समर कैंप किया था। उसमें अलग-अलग गतिविधियाँ करवाई गईं, जैसे वॉलीबॉल, फुटबॉल। हर दिन अलग-अलग सत्र चलते थे। फिर शरीर के बारे में पढ़ा, कबाड़ से जुगाड़ सीखा, कंप्यूटर सीखा, अंग्रेजी सीखी। हमारी मदद करने अजमेर महिला जन अधिकार समिति से टीम आई थी। उन्होंने कठपुतली वाला नाटक दिखाया, एक फिल्म दिखाई थी, चुड़ैल वाली। फोन होना चाहिए या नहीं, इस पर चर्चा की। पीरियड के बारे में वीडियो देखा और अपने गाँव के बारे में लिखा। वागड़ी गीत गाया।
पाँचवें दिन घूमने गए। अलग-अलग जगहों पर गए, जैसे पुलिस थाने, बैंक, कालीबाई के यहाँ, डूंगर बरंडा की छतरी, दरगाह, चर्च और मंदिर भी गए। फिर मैंने पहली बार संचालन किया था, इसलिए डर लग रहा था कि कहीं कुछ गलत न बोल दूँ। लेकिन बीच-बीच में शायरी बोल रही थी, जिससे मुझे बहुत हिम्मत मिली। मुझे शायरी और कहानियाँ पढ़ना बहुत अच्छा लगता है।
फिर 9 अगस्त को आदिवासी दिवस मनाने गई थी। डूंगरपुर में लाखों लोग आते हैं और मनाते हैं। वहाँ सांस्कृतिक कार्यक्रम करते हैं। वहाँ मैंने पहली बार वॉलंटियर का काम किया था। वह मुझे बहुत अच्छा लगा।




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