ज़ेबा:

हाल ही में मुझे रायपुर से ओडिशा के लिए ट्रेन से यात्रा करनी थी। जैसा कि अक्सर होता है, कुछ ट्रेनों को छोड़ दें तो भारतीय ट्रेनों का समय पर चलना आज भी एक उम्मीद ही लगता है। उस दिन भी मेरी ट्रेन करीब चार घंटे लेट थी।

खैर, ट्रेन आई। मैं अपने कोच में गई, अपनी सीट ढूँढी और बैठ गई। सोचा, पहले टीटी आकर टिकट चेक कर लें, उसके बाद आराम से सो जाऊँगी।

कुछ देर इंतज़ार करने के बाद टीटी महोदय आए। उन्होंने मुझसे सीट नंबर पूछा, मैंने बता दिया। फिर अचानक उन्होंने पूछा-

“आप इंडियन हैं?”

मैंने सोचा, शायद मैंने ठीक से सुना नहीं। फिर मैंने कहा-

“क्यों? किसी दूसरे देश की प्राणी दिख रही हूँ क्या?”

उन्होंने दोबारा पूछा-

“आप इंडियन ही हैं ना?”

इस बार मुझे सच में गुस्सा आया। मैंने कहा-

“कोई डाउट है?”

उन्होंने कहा-“नहीं, कुछ नहीं।” और आगे बढ़ गए।

बात बहुत छोटी थी। शायद उनके लिए यह सिर्फ एक सामान्य सवाल रहा हो। लेकिन मेरे लिए यह सवाल वहीं खत्म नहीं हुआ।

मैं सोचती रही-आखिर किसी व्यक्ति को देखकर उसकी नागरिकता पूछने की जरूरत क्यों महसूस होती है? और अगर पूछनी ही थी, तो क्या इसका कोई बेहतर और सम्मानजनक तरीका नहीं हो सकता था? यह सिर्फ एक ट्रेन, एक टीटी या एक यात्री की बात नहीं है। यह उस सोच की बात है जो कई बार हमारे रोज़मर्रा के व्यवहार में इतनी सामान्य हो जाती है कि हमें उसमें कुछ असामान्य लगता ही नहीं।

हमारा सिस्टम सिर्फ देर से चलने वाली ट्रेनों का नाम नहीं है। कभी-कभी सिस्टम हमारे व्यवहार में भी दिखाई देता है, और तब सवाल सिर्फ यह नहीं होता कि ट्रेन कितनी देर से आई, बल्कि यह भी होता है कि हम एक-दूसरे को किस नजर से देखते हैं। ख़ैर लेकिन शायद यह सवाल सिर्फ उस ट्रेन या उस टीटी तक सीमित नहीं है। मेरी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में ऐसे कई मौके आते हैं, जब मेरी पहचान को लेकर सवाल खड़े होते हैं। कभी कोई कहता है कि मैं मुसलमान औरत जैसी नहीं दिखती, तो कभी मेरे चेहरे या पहनावे को देखकर मुझे मुसलमान मान लिया जाता है। कभी मेरी पहचान लोगों की उम्मीदों से मेल नहीं खाती, तो कभी वही पहचान उनके बनाए हुए किसी खाँचे में फिट कर दी जाती है।

ऐसे में मैं अक्सर सोचती हूँ कि आखिर मैं करूँ तो क्या करूँ? क्या किसी धर्म, समुदाय या पहचान से जुड़े होने का भी कोई तय चेहरा होता है? क्या किसी की पहचान उसके पहनावे, बोलने के तरीके या चेहरे-मोहरे से तय की जा सकती है? और हर बार मेरे पास इन सवालों का जवाब नहीं होता। कभी हैरानी होती है, कभी गुस्सा आता है, और कभी मैं बस सोचती रह जाती हूँ कि आखिर ऐसे सवाल क्यूँ?

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  • ज़ेबा, बिहार- पटना की रहने वाली है और एक सामाजिक कार्यकर्ता है । वह पिछले 6 वर्ष से महिलाओं और बच्चों के मुद्दों पर कार्य कर रही है।

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