भारत के विभिन्न ग्रामीण क्षेत्रों-चित्तौड़गढ़, ग्वालियर, दमोह, छिंदवाड़ा तथा आदिवासी अंचलों-से प्राप्त अनुभवों को संकलित करने पर महिलाओं की स्थिति का एक बहुआयामी चित्र सामने आता है। यह चित्र कहीं पीड़ा और अन्याय से भरा है, तो कहीं सम्मान और समानता की झलक भी दिखाता है।

ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकांश महिलाओं का जीवन सूर्योदय से पहले शुरू होता है और देर रात तक समाप्त नहीं होता। वे घर का पूरा काम-झाड़ू, बर्तन, खाना बनाना, बच्चों की देखभाल-करने के बाद खेतों में मजदूरी करने जाती हैं। गेहूं और सरसों की कटाई से लेकर पशुपालन और लकड़ी लाने तक, हर जिम्मेदारी उनके कंधों पर होती है। इसके बावजूद उन्हें उचित मजदूरी नहीं मिलती और न ही उनके श्रम को सम्मान मिलता है।

घरेलू हिंसा और शराब की समस्या

कई गाँवों में शराब की लत ने महिलाओं का जीवन और कठिन बना दिया है। पति शराब पीकर घर आते हैं, गाली-गलौज करते हैं, पैसे छीन लेते हैं और मारपीट तक कर बैठते हैं। कई महिलाओं को शारीरिक चोटें लगती हैं, हाथ-पैर तक टूट जाते हैं, पर वे फिर भी परिवार के लिए संघर्ष करती रहती हैं। कुछ मामलों में पति की बीमारी और मृत्यु के बाद भी महिलाएँ अकेले बच्चों का पालन-पोषण करती हैं। यह संघर्ष मौन है, पर गहरा है।

बाल विवाह और सामाजिक दबाव

कई स्थानों पर 10–15 वर्ष की आयु में ही लड़कियों की शादी कर दी जाती है। एक ही घर की कई बेटियों की शादी एक साथ कर दी जाती है। गरीबी, सामाजिक भय (लड़की के भाग जाने का डर), ‘आटा-साटा’ जैसी प्रथाएँ और पर्दा प्रथा बाल विवाह को बढ़ावा देती हैं। कम उम्र में विवाह से लड़कियों की शिक्षा रुक जाती है और उनका मानसिक व शारीरिक विकास प्रभावित होता है।

शिक्षा और आर्थिक निर्भरता

ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक तंगी के कारण लड़कियाँ पढ़ नहीं पातीं। वे छोटे भाई-बहनों की देखभाल, पशु चराना और खेतों में काम करने में लग जाती हैं। शिक्षा के अभाव में वे आत्मनिर्भर नहीं बन पातीं और अपने अधिकारों के लिए आवाज़ नहीं उठा पातीं। फिर भी कई महिलाएँ यह मानती हैं कि यदि वे शिक्षित होंगी तो घर बैठे भी रोजगार शुरू कर सकती हैं और अन्य महिलाओं को भी अवसर दे सकती हैं।

“दुनिया की पहचान है औरत,
हर घर की जान है औरत…”

यह भाव केवल कविता नहीं, बल्कि उनके अस्तित्व की पुकार है।

पितृसत्ता और प्रतिनिधित्व की विडंबना

ग्राम पंचायतों में सरपंच पद महिलाओं के लिए आरक्षित है, पर कई जगह वास्तविक निर्णय उनके पति लेते हैं। महिलाओं की भागीदारी कागज़ों में दिखती है, व्यवहार में नहीं। पितृसत्तात्मक सोच के कारण उन्हें अक्सर यह कहकर चुप करा दिया जाता है-“गृहस्थी संभालना ही तुम्हारा काम है।”

आदिवासी क्षेत्रों की सकारात्मक तस्वीर

इसके विपरीत, कुछ आदिवासी क्षेत्रों में महिलाओं की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर दिखाई देती है। वहाँ महिलाओं को निर्णय लेने, अपनी बात रखने, त्योहारों और सामाजिक गतिविधियों में बराबरी से भाग लेने का अधिकार है। संपत्ति और जमीन पर भी उनका अधिकार स्वीकार किया जाता है। घरेलू हिंसा और लिंगभेद के मामले बहुत कम सुनने को मिलते हैं। यह उदाहरण बताता है कि समानता संभव है।

संघर्ष से सशक्तिकरण की ओर

इन सभी कथाओं में एक समान सूत्र है-संघर्ष। कहीं माँ अपने बच्चों को बचाने के लिए घर छोड़ देती है, तो कहीं एक महिला पाँच बच्चों को अकेले पालती है। कहीं लड़कियाँ शिक्षा के लिए तरसती हैं, तो कहीं वे सशक्त भविष्य का सपना देखती हैं।

फ़ोटो फीचर्ड: ए.आई

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