नम्रता मिश्रा:

शहरों के कई इलाकों में सुबह-सुबह कपड़ों के बड़े-बड़े ढेर दिखाई देते हैं। इन ढेरों में से इस्तेमाल किए गए कपड़ों को छांटते हुए कामगार अलग-अलग ढेर बनाते हैं – कुछ दोबारा पहनने लायक, कुछ फिर से उपयोग में लाए जा सकने वाले और कुछ पूरी तरह कचरा। इन ढेरों के बीच काम करते हुए ये कामगार शायद ही कभी दिखाई देते हैं, लेकिन कपड़ों से पैदा होने वाले कचरे की पूरी व्यवस्था कहीं न कहीं इन्हीं के श्रम पर टिकी हुई है।

बढ़ता निर्यात, बढ़ती मांग

इसी समय, भारत से कपड़ों का निर्यात लगातार बढ़ रहा है। हाल के वर्षों में इसमें लगभग 2.1 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। इसका अर्थ है कि दुनिया भर में भारतीय कपड़ों की मांग बढ़ रही है और भारत में बने वस्त्र 120 से अधिक देशों तक पहुँच रहे हैं। इस वृद्धि के पीछे सरकारी प्रोत्साहन नीतियाँ और अन्य देशों के साथ किए गए व्यापारिक समझौते भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इससे रोज़गार के अवसर बढ़े हैं, वस्त्रों को अधिक मूल्य मिला है और वैश्विक स्तर पर भारत की पहचान मज़बूत हुई है।

कपड़ा-कचरा: एक अनदेखी समस्या

लेकिन जहाँ एक ओर इस बढ़ते निर्यात और मुनाफ़े की चर्चा होती है, वहीं दूसरी ओर एक कम दिखाई देने वाली सच्चाई भी है – कपड़ों से पैदा होने वाला कचरा। भारत में हर साल लगभग 7.25 मिलियन टन कपड़ा-कचरा उत्पन्न होता है। उद्योग से जुड़े अध्ययनों के अनुसार, इस कचरे को सही ढंग से इकट्ठा, छांट और पुनः उपयोग में न ला पाने के कारण देश को लगभग 78,500 करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान होता है।

कचरे में खोती आर्थिक संभावना

यदि कपड़ा-कचरे को फिर से उपयोग में लाने, मरम्मत कर पुनर्विक्रय करने और नए रूप में ढालने के प्रयासों को बढ़ाया जाए, तो इस नुकसान का बड़ा हिस्सा कम किया जा सकता है। कुछ स्तर पर यह काम हो भी रहा है, लेकिन अभी यह उस मात्रा के सामने बहुत कम है जितना कचरा वास्तव में पैदा हो रहा है।

कचरे का सफर: उपयोग से नष्ट होने तक

समस्या का एक बड़ा हिस्सा उन कपड़ों से जुड़ा है जिन्हें लोग इस्तेमाल के बाद छोड़ देते हैं। ऐसे कपड़ों का लगभग 45 प्रतिशत हिस्सा किसी भी पुनः उपयोग या पुनर्चक्रण की प्रक्रिया तक पहुँच ही नहीं पाता। यह या तो ज़मीन में दबा दिया जाता है या जला दिया जाता है, जिससे न केवल पर्यावरण को नुकसान होता है बल्कि वस्त्रों में निहित मूल्य भी नष्ट हो जाता है।

छंटाई की सीमाएँ और तकनीकी चुनौतियाँ

जहाँ कपड़ों की छंटाई होती भी है, वहाँ लगभग 95 प्रतिशत काम इंसानों द्वारा किया जाता है। मशीनों की सीमित उपलब्धता के कारण कई बार ऐसे कपड़े भी कचरे में चले जाते हैं जिन्हें दोबारा उपयोग में लाया जा सकता था।

जाति, लिंग और कचरे का काम

इसी प्रक्रिया में ज़मीन पर काम कर रहे समुदायों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। कई बार पुराने कपड़ों के संग्रह और छंटाई का काम विशेष समुदायों द्वारा किया जाता है, जिनमें जाति और लिंग का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है। यह काम अक्सर उन महिलाओं द्वारा किया जाता है जो सामाजिक और आर्थिक रूप से हाशिए पर स्थित समुदायों से आती हैं, जैसे वाघरी समुदाय।

मुंबई में इस काम से जुड़ी एक महिला बताती हैं कि दोबारा उपयोग और बिक्री के लिए कपड़ों का “पूरा जोड़ा” होना महत्वपूर्ण होता है – जैसे कुर्ता, सलवार और दुपट्टा साथ में। जो कपड़े पूरे जोड़े में नहीं होते, वे अक्सर कम उपयोगी माने जाते हैं और अंततः कचरे में चले जाते हैं। वहीं वाघरी समुदाय की एक महिला कहती हैं, “जब पूरा जोड़ा होता है, तो हम लोग भी उसे पहन सकते हैं… अलग-अलग कपड़े हमारे लिए उतने काम के नहीं होते।”

इस पूरी प्रक्रिया में महिलाओं की भूमिका अधिक दिखाई देती है – वे घर-घर जाकर कपड़े इकट्ठा करती हैं और उनकी छंटाई करती हैं। वहीं पुरुषों की भूमिका अक्सर कम दिखाई देती है, जबकि यह काम कई बार पूरे परिवार द्वारा मिलकर किया जाता है। इस तरह कपड़ा-कचरे का प्रबंधन केवल एक तकनीकी या आर्थिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह सामाजिक संरचनाओं – जैसे जाति और लिंग – से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।

असंगठित श्रम और अनदेखी मेहनत

इसके अतिरिक्त, कपड़ा उत्पादों के लिए उपयोग के बाद उनकी जिम्मेदारी तय करने की स्पष्ट व्यवस्था न होने के कारण उनका संग्रह और पुनः उपयोग भी व्यवस्थित ढंग से नहीं हो पाता। कई बार कपड़े अन्य कचरे के साथ मिलकर दूषित हो जाते हैं और फिर उनका उपयोग कठिन हो जाता है।

देश में पुनर्चक्रण के लिए कुछ तकनीकों और मशीनों का उपयोग किया जा रहा है, लेकिन इन्हें और उन्नत बनाने की आवश्यकता है ताकि अलग-अलग प्रकार के कपड़ों को सही ढंग से पहचानकर उनका बेहतर उपयोग किया जा सके।

यह पूरा तंत्र केवल पर्यावरण या अर्थव्यवस्था का प्रश्न नहीं है, बल्कि श्रम से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। कपड़ा-कचरे के संग्रह, छंटाई और पुनः उपयोग से जुड़े कामों में बड़ी संख्या में कामगार लगे हुए हैं, जिनमें से अधिकांश असंगठित क्षेत्र का हिस्सा हैं। यदि इस क्षेत्र में बेहतर नीतियाँ, तकनीक और निवेश आएँ, तो इन कामगारों को अधिक सुरक्षित कार्य-परिस्थितियाँ, बेहतर आय और सामाजिक मान्यता मिल सकती है।

ऐसे प्रयासों से धीरे-धीरे यह संभव है कि ये कामगार औपचारिक कार्यबल का हिस्सा बनें और अपने अधिकारों के साथ काम कर सकें।

आगे का रास्ता: कचरे से संसाधन तक

आज जब भारत की वस्त्र उद्योग निर्यात और उत्पादन के स्तर पर लगातार आगे बढ़ रही है, तब यह ज़रूरी है कि कपड़ा-कचरे की इस समस्या को भी उतनी ही गंभीरता से देखा जाए। यदि कचरे को केवल बेकार सामग्री न मानकर एक संसाधन के रूप में समझा जाए, तो यह न केवल आर्थिक नुकसान को कम कर सकता है, बल्कि रोज़गार, तकनीक और टिकाऊ विकास के नए अवसर भी खोल सकता है।

संदर्भ:  

1.     India’s Textile Exports Grow 2.1% in FY26, Government Push and FTAs Boost Global Demand

2.     India’s textile waste holds billions, but inefficiencies block recovery

फोटो साभार: आईस्टॉक

Author

  • नम्रता मिश्रा / Namrata Mishra

     नम्रता मिश्रा एक नारीवादी नैरेटिव स्ट्रैटेजिस्ट हैं, जिनका काम लैंगिकता को रोज़मर्रा के ट्रॉमा, सत्ता के दुरुपयोग और बच्चों के खिलाफ यौन हिंसा के संदर्भ में समझता है। वे संवाद, कहानी-कथन और शिक्षण प्रक्रियाओं के माध्यम से युवाओं में आलोचनात्मक नारीवादी चेतना विकसित करने का काम करती हैं। वे ‘गरदा – द फेमिनिस्ट डस्ट’ की संस्थापक हैं, जो अवधी भाषा में नारीवादी कंटेंट बनाने वाला एक डिजिटल मंच है। दस्तावेज़ीकरण, संचार और क्षमता-निर्माण के साथ-साथ वे अपने काम में कला और कॉमिक्स को महत्वपूर्ण औज़ार के रूप में इस्तेमाल करती हैं।

    View all posts

Leave a Reply

Designed with WordPress

Discover more from युवानिया ~ YUVANIYA

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading