अंकिता, प्रियंका:
हर साल 1 मई को अंतर्राष्ट्रीय मज़दूर दिवस पूरे विश्व में मनाया जाता है। यह दिन केवल एक तारीख़ नहीं, बल्कि उन मेहनती लोगों की याद और सम्मान का दिन है, जिनके श्रम से समाज और देश आगे बढ़ता है। यह उनके कठिन परिश्रम, समर्पण और समाज में उनके बहुमूल्य योगदान को मान्यता देने का समय है। हम जो भी इमारत देखते हैं, जिस भी सड़क पर चलते हैं, और हर दिन हम जिन सेवाओं का उपयोग करते हैं, वे सब श्रमिकों की वजह से ही संभव है। इस दिन हम श्रमिकों के योगदान को याद करते हैं और उनके अधिकारों के लिए आवाज़ उठाते हैं। इसकी शुरुआत आठ घंटे के काम के अधिकार को लेकर हुए श्रम आंदोलन से हुई थी। भारत, चीन, क्यूबा जैसे कई देशों में इसे सार्वजनिक अवकाश के रूप में मनाया जाता है। भारत में पहला श्रम दिवस 1923 में चेन्नई में मनाया गया था। उस समय हिंदुस्तान की मज़दूर किसान पार्टी द्वारा आयोजित इस दिन पर कम्युनिस्ट नेता मलयापुरम सिंगारवेलु चेट्टियार ने इसे राष्ट्रीय अवकाश घोषित करने की मांग की थी। यह दिन श्रमिकों के संघर्ष, परिश्रम और उनके अधिकारों की अहमियत को पहचानने का प्रतीक है।
मज़दूर दिवस हमें सभी श्रमिकों के योगदान का सम्मान करने का अवसर देता है, लेकिन जब हम श्रमिकों के योगदान और उनके अधिकारों की बात करते हैं, तो यह प्रश्न उठता है कि इस परिदृश्य में महिला श्रमिकों की स्थिति क्या है? उनकी भागीदारी और स्थिति कई चुनौतियों से घिरी दिखाई देती है।
किसी देश के विकास में महिलाओं की श्रमशक्ति में भागीदारी बहुत महत्वपूर्ण होती है, जो आर्थिक विकास, सामाजिक न्याय और लैंगिक समानता को प्रभावित करती है। जब महिलाएं काम करती हैं, तो उसका असर केवल उनकी आय तक सीमित नहीं रहता, बल्कि परिवार, समाज और पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। इसके बावजूद, भारत में महिलाओं की श्रमशक्ति में भागीदारी अभी भी अपेक्षाकृत कम है। लैंगिक समानता को बढ़ावा देने के लिए कई नीतियां बनाई गई हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर स्थिति अभी भी चुनौतीपूर्ण है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के आंकड़ों के अनुसार, 2020 में भारत में महिला श्रमिकों की भागीदारी दर लगभग 22% थी, जो दुनिया में सबसे कम दरों में से एक है।
आर्थिक विकास और महिला श्रमिकों की स्थिर या घटती भागीदारी के बीच यह विरोधाभास महिलाओं के श्रमिक वर्ग में प्रवेश करने और बने रहने में आने वाली बाधाओं के बारे में महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है। भारत के श्रम बाजार में महिलाओं की कम भागीदारी दर के पीछे कई कारक हैं जैसे पितृसत्तात्मक सोच, घरेलू ज़िम्मेदारियों का बोझ, सुरक्षित और अनुकूल कार्यस्थल की कमी।
भारतीय श्रम कानून के अंतर्गत महिलाओं के लिए प्रावधान:
भारत में महिलाओं के लिए बनाए गए श्रम कानून अलग-अलग अधिनियमों में समाहित हैं, लेकिन उनका उद्देश्य एक ही है- महिलाओं के लिए सुरक्षित, सम्मानजनक और गरिमामय कार्य वातावरण सुनिश्चित करना। ये कानून मुख्य रूप से स्वास्थ्य, सुरक्षा, समानता और कल्याण पर ध्यान देते हैं।
प्रमुख क़ानूनी प्रावधान जो विशेषकर महिला मज़दूरों की सुरक्षा के लिए बने है:
कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013
यह कानून सुनिश्चित करता है कि किसी भी कार्यालय या संस्थान में, जहाँ 10 या उससे अधिक कर्मचारी हों, वहाँ यौन उत्पीड़न की शिकायतों के समाधान के लिए आंतरिक शिकायत समिति (ICC) और स्थानीय शिकायत समिति (LCC) का गठन किया जाए। इसका उद्देश्य महिलाओं को सुरक्षित माहौल में काम करने का अधिकार देना है।
नई श्रम संहिता में महिला श्रमिकों से संबंधित प्रावधान
नई श्रम संहिता महिला श्रमिकों की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इसमें समान वेतन, भेदभाव-रहित रोजगार, मातृत्व लाभ और सुरक्षित कार्य परिस्थितियों से जुड़ी कई महत्वपूर्ण व्यवस्थाएं शामिल की गई हैं। साथ ही, महिलाओं को उनकी सहमति और उचित सुरक्षा उपायों के साथ रात्रि पाली में काम करने तथा विभिन्न क्षेत्रों में रोजगार के अवसर प्रदान किए गए हैं।
नए कानूनों के तहत महिला श्रमिकों के लिए प्रमुख प्रावधान:
- समान वेतन और भेदभाव-रहित व्यवहार:
वेतन संहिता, 2019 यह सुनिश्चित करती है कि समान या समान प्रकृति के कार्य के लिए महिलाओं के साथ वेतन, भर्ती और सेवा शर्तों में किसी प्रकार का भेदभाव न हो। - रात्रि शिफ्ट और सुरक्षा:
महिलाएं अब अपनी सहमति से रात्रि शिफ्ट (सुबह 6 बजे से पहले और शाम 7 बजे के बाद) में काम कर सकती हैं। इसके लिए नियोक्ता द्वारा उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना आवश्यक है, जिसमें सुरक्षित परिवहन और अन्य आवश्यक सुविधाएं शामिल हैं। - सभी क्षेत्रों में रोजगार के अवसर:
नए नियमों के तहत महिलाओं को सभी प्रकार के प्रतिष्ठानों में काम करने की अनुमति दी गई है, जिसमें खनन और अन्य जोखिमपूर्ण उद्योग भी शामिल हैं। - मातृत्व लाभ और शिशु देखभाल:
महिलाओं को 26 सप्ताह का सवेतन मातृत्व अवकाश प्रदान किया गया है। साथ ही, कार्यस्थलों पर शिशुगृह (क्रेच) जैसी सुविधाओं की व्यवस्था भी सुनिश्चित की गई है। - स्वास्थ्य और कार्य परिस्थितियां:
व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य स्थितियां संहिता, 2020 के तहत कार्यस्थल पर स्वास्थ्य जांच और सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया है। - प्रतिनिधित्व और शिकायत निवारण:
शिकायत निवारण समितियों में महिलाओं की भागीदारी को अनिवार्य बनाया गया है, ताकि वे अपनी समस्याओं को प्रभावी ढंग से रख सकें।
इन सभी व्यवस्थाओं का उद्देश्य महिलाओं के लिए एक सुरक्षित, समान और गरिमापूर्ण कार्य वातावरण तैयार करना है, जहाँ वे बिना किसी भेदभाव के अपनी क्षमता के अनुसार कार्य कर सकें।
संवैधानिक प्रावधान
- अनुछेद 14: भारत के नागरिकों को समानता का अधिकार प्रदान करता है जो यह सुनिश्चित करता है की सभी नागरिको के साथ समान व्यवहार किया जाए।
- अनुछेद 15: धर्म, जाति, नस्ल, लिंग, या जन्म स्थान के आधार पर नागरिकों के साथ भेदभाव को प्रतिवंधित करता है और राज्य को महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष प्रावधान बनाने की अनुमति देता है।
- अनुछेद 16: सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर की गारंटी देता हे और यह सुनिश्चित करता है की भर्ती और रोजगार में महिलाओं के साथ किसी प्रकार का भेदभाव न किया जाये।
- अनुच्छेद 19(1)(g): सभी नागरिकों को किसी भी व्यवसाय को करने की स्वतंत्रता प्रदान करता है।
- अनुच्छेद 21: सभी व्यक्तियों को जीवन और व्यक्तिगति स्वतंत्र का अधिकार प्रदान करता है और सुनिश्चित करता है की सभी को गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार मिल सके।
- अनुच्छेद 39(क): राज्य को निर्देश देता है कि वह पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए समान रूप से आजीविका के पर्याप्त साधन सुनिश्चित करे।
- अनुच्छेद 39(घ): पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए समान काम के लिए समान वेतन अनिवार्य करता है।
- अनुच्छेद 39(ई): राज्य को यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि श्रमिकों (पुरुष और महिला) के स्वास्थ्य और शक्ति का दुरुपयोग न हो।
- अनुच्छेद 42 (न्यायपूर्ण और मानवीय परिस्थितियाँ): विशेष रूप से राज्य को न्यायपूर्ण और मानवीय कार्य परिस्थितियों को सुनिश्चित करने और मातृत्व राहत के लिए प्रावधान करने का आदेश देता है।
भारत में महिला श्रमिकों की भूमिका आर्थिक और सामाजिक विकास के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। हालांकि, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक बाधाओं के कारण उनकी भागीदारी अभी भी सीमित है। उनके अधिकारों की रक्षा और सशक्तिकरण के लिए कई श्रम कानून और संवैधानिक प्रावधान मौजूद हैं। समान वेतन, मातृत्व लाभ, सुरक्षित कार्यस्थल, यौन उत्पीड़न से सुरक्षा और भेदभाव रहित व्यवहार जैसे उपाय महिलाओं के लिए एक बेहतर और सुरक्षित कार्य वातावरण बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। इन कानूनों का प्रभाव तभी दिखेगा जब उनका सही तरीके से पालन हो, महिलाओं को अपने अधिकारों की जानकारी हो, और सामाजिक सोच में बदलाव आए। तभी यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि महिला श्रमिक सम्मान, सुरक्षा और समान अवसरों के साथ काम कर सकें और देश की प्रगति में अपना पूरा योगदान दे सकें।

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