मधुलिका:

हमारा संगठन मुख्यतः ग्रामीण क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं का संगठन है। ये नरेगा में काम करने वाले महिला साथी अपना समूह बनाकर पूरा काम का पूरा दाम/मज़दूरी  लेने के लिए संघर्ष करते हैं। ये महिलाएं अपने बीच में ही हाजिरी लेने के लिए “मेट” को तैयार करती हैं। वे अपनी हिम्मत का तिनका-तिनका जोड़कर मज़बूत एकता बनाती हैं और एक-दूसरे के साथ खड़े रहने का प्रयास करती हैं।

हम हर साल मई दिवस मनाते हैं, कभी पंचायत में, कभी ज़िले में, तो कभी राज्य स्तर के कार्यक्रम में। दुनिया के सभी मज़दूरों के संघर्षों को मनाने, प्रेरणा लेने और आगे का रास्ता तय करने की बात हर साल करते हैं। पर इस साल मज़दूरों के लिए यह समय बहुत उदासी भरा है। सब जगह मज़दूरों के संघर्षों को कुचला जा रहा है। चर्चा और सहमति के बिना मज़दूर विरोधी कानूनों को थोपा जा रहा है। व्यवस्था में संवेदनशीलता खत्म हो चुकी है। कई संघर्षशील साथी जेलों और घरों में बंद हैं। जो अधिकार श्रमिक संगठनों ने सालों के संघर्ष से जीते थे, वे धीरे-धीरे छीने जा रहे हैं। ऐसी स्थिति में मज़दूर अपनी निराशा को भीतर दबाकर अपने हक़ की एक नई और लंबी लड़ाई के लिए कमर कसकर तैयारी करने को मजबूर हैं।

हमारे लिए भी यह साल बहुत मुश्किल है। इस साल सरकार ने नरेगा की मज़दूरी का एक भी रुपया नहीं बढ़ाया है। पहले से बजट और तकनीक के नाम पर नरेगा को कमजोर किया जा रहा है। दिसंबर 2025 में केंद्र सरकार बिना किसी सूचना और चर्चा के नरेगा को खारिज करते हुए राम के नाम पर एक कानून लेकर आई, जिसमें काम का हक़ मिलना केंद्र सरकार की मनमर्जी पर निर्भर रहेगा।

साथ में श्रमिकों के ऊपर तकनीक की मार है। श्रमिकों को सशक्त बनाकर, उनके काम में मददगार होना और व्यवस्था को सुचारू रखना तकनीक का उद्देश्य होना चाहिए। लेकिन इसका ठीक उल्टा हो रहा है! तकनीक काम दिलाने के बजाय लोगों को काम से वंचित कर रही है, काम करने के बाद भी उन्हें भुगतान से वंचित कर रही है और कमज़ोर वर्गों को ज़्यादा असुरक्षा में धकेल रही है। यह नरेगा में हाजिरी लेने के लिए लाए गए NMMS ऐप के संदर्भ में बिल्कुल सच साबित हो रहा है।

NMMS में हाजिरी नहीं होने से 233 दिन की मज़दूरी का नुकसान झेले श्रमिक।

दिन के 281 रुपये कमाने वाले मज़दूरों की हाजिरी 10,000 से 15,000 रुपये के फोन में चलने वाली एक एप (NMMS) से होती है। ये खर्चा सरकारी नहीं है। दिन के 281/- कमाने वाले मेटों को ही फोन खरीदना है। जैसे-तैसे फोन लाए, तो भी उसके बाद में हाज़री होने की कोई गारंटी नहीं है।

यह समझा जा सकता है कि तकनीकी समस्याएं होती हैं, लेकिन इन विफलताओं का पूरा बोझ किस पर है? निर्णय लेने वाले, सॉफ्टवेयर बनाने वाले, लागू करने वाले या निगरानी करने वाले – किसी भी स्तर पर कोई ज़िम्मेदारी या जवाबदेही नहीं है। सारा बोझ और नुकसान श्रमिकों का है। उन्हें समय, मज़दूरी की हानि और अनिश्चितता का सामना करना पड़ रहा है। पूरा सिस्टम उन्हें एक ही बात कहता है – “ऐप काम करेगा तो आप काम करो, नहीं तो आपको मज़दूरी नहीं मिलेगी।” मशीन जैसे चलाए, मज़दूरों को वैसे ही नाचना पड़ रहा है। जो गिग वर्कर्स के संदर्भ में भी हम देख रहे थे, अब नरेगा श्रमिकों का भी यही हाल है।

इस ऐप में लगातार अपडेट होते रहते हैं, और हर बार तबाही मचती है। अपडेट करने के लिए रविवार का दिन चुना जाता है, जब श्रमिकों को मदद करने के लिए कोई उपलब्ध नहीं होता। सारे संदेश कोड भाषा और अंग्रेज़ी में होते हैं। “K-100” का मतलब आपका आधार में फोटो अपडेट करना है, ये उनको बताने वाला भी कोई नहीं है। श्रमिक और मेट ऐप को चलाने में ही समय लगा रहे हैं, और कई मामलों में पूरा कार्य दिवस खो रहे हैं।

Mobile app screen prompting user to capture a photo for attendance, showing a facial recognition interface.

ऐप अपडेट हुआ तो हाजिरी नहीं होगी। सर्वर डाउन हुआ तो हाजिरी नहीं होगी। नेटवर्क नहीं आया तो हाजिरी नहीं होगी। आपका फोन का वर्जन पुराना है, तो हाजिरी नहीं होगी। रोशनी ज़्यादा है तो आपकी फोटो नहीं आएगी। परिवार में मौत हुई है और आपने बाल कटवाए हैं, तो हाजिरी नहीं होगी। आपका चेहरा मैच करने में ऐप विफल होगा, तो आपकी हाजिरी नहीं होगी। ये सारी एप की विफलताएं हैं, श्रमिकों की नहीं। पर समय मज़दूरों का गया, मज़दूरी मज़दूरों की गई।

आप एकल महिला हैं, आपकी मज़दूरी से चूल्हा जलता है, आप धूप में 3 किमी चलकर आई हैं, आप भूखी हैं, आपके घर पर, बच्चे इंतज़ार कर रहे हैं, पशु प्यासे हैं – यह सब ऐप को नहीं पता, उसको इन सब से कोई लेना-देना ही नहीं है। जब ऐप चलेगी और कहेगी कि आप इंसान हो, आपका फोटो सही है, आपका अंगूठा सही है, तब ही आप काम करो, नहीं तो इंतज़ार करते रहो। यही नई दुनिया है।

इस नई दुनिया में हम क्या नारा दें – “दुनिया के मज़दूर एक हो, एक होकर तकनीक से लड़ो।”

मैं सोचती हूँ अगर गांधी जी आज होते तो क्या नारा देते, “तकनीक में मानवता जगाओ।”
अंबेडकर होते तो आज क्या जोड़ते, “स्वतंत्रता, समानता और बंधुता – इनके बिना कोई भी तकनीकी प्रगति अधूरी और अन्यायपूर्ण है”
भगत सिंह होते तो क्या नारा देते, “मज़दूर अपने श्रम का मालिक है। इंकलाब अब ऐप के खिलाफ भी होगा!”

नोट: यह लेख द वायर पर प्रकाशित हुआ है। मूल लेख को पढ़ने के लिए लिंक पर क्लिक करें

Author

  • मधुलिका, एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं। वे राजस्थान के डूंगरपुर जिले, और दक्षिण क्षेत्र में  राजस्थान असंगठित मज़दूर यूनियन और जंगल जमीन जन आंदोलन, के साथ जुड़ कर सक्रिय रूप से काम कर रही हैं। उनके कार्य का मुख्य केंद्र असंगठित मज़दूरों के अधिकारों की रक्षा और वनधिकार समुदायों के हितों को मज़बूत करना है।

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