ज़ैनब फातिमा:

कुछ इमारतें सिर्फ ईंट और सीमेंट का ढांचा नहीं होतीं, वे हमारी यादों और हमारी पहचान की नींव होती हैं। मेरे लिए ऐसी ही एक जगह है, दर्सगाह-ए-इस्लामी इंटर कॉलेज। यह स्कूल शहर के बीचों-बीच है और हमारे इलाके में बहुत मशहूर है, जहाँ आसपास और दूर के मुस्लिम समाज के ज़्यादातर बच्चे पढ़ने आते हैं। नर्सरी की पहली कच्ची लिखावट से लेकर 12वीं पास करने तक, मैंने अपनी ज़िंदगी के पूरे 14 साल इसी स्कूल में बिताए हैं।

जब मैं यहाँ पढ़ती थी, तब माहौल काफी सख्त था और नियम बहुत कड़े हुआ करते थे। पूरा स्कूल तीन अलग-अलग बिल्डिंग्स में बँटा हुआ था। एक बिल्डिंग छोटे बच्चों के लिए थी, एक लड़कों के लिए और एक हम लड़कियों के लिए। क्लास दो में पहुँचते ही लड़का-लड़की की पढ़ाई एकदम अलग हो जाती थी। नियम इतने सख्त थे कि कोई भी लड़की लड़कों की बिल्डिंग की तरफ कदम भी नहीं रख सकती थी और न ही लड़के हमारी तरफ आ सकते थे। लड़कियों का पहनावा भी बहुत सादा था, सभी सलवार-जंपर पहनकर और स्कार्फ लगाकर ही आती थीं। उस दौर में जेंट्स टीचर्स लड़कियों को पढ़ाने नहीं आते थे और सभी टीचर्स काफी सख्त मिज़ाज के हुआ करते थे। इंटरवल में किसी को भी मेन गेट से बाहर जाने की इजाज़त नहीं होती थी और न ही कभी हम लड़कियों को स्कूल की तरफ से किसी रैली या बाहरी चीज़ों में ले जाया जाता था। यहाँ तक कि छुट्टी के वक्त भी गेट पर भीड़ न हो, इसलिए लड़कियों के निकलने के 10 मिनट बाद ही लड़कों की छुट्टी की जाती थी।

उस समय ये सारे नियम बहुत भारी और सख्त लगते थे। लेकिन 2019 में जब मैंने 12वीं पास करके स्कूल छोड़ा, तो आँखें भर आई थीं। इतने सालों में वहाँ के क्लासरूम, दीवारों और लकड़ी के पुराने बेंचों से एक गहरा लगाव जो हो गया था।

2019 में स्कूल छोड़ने के बाद मैं अपनी पढ़ाई और ज़िंदगी में आगे बढ़ गई, लेकिन 2026 में किस्मत मुझे फिर से वहीं ले आई। मैं ‘अवध पीपल्स फोरम’ के ज़रिए एक लाइब्रेरी फैसिलिटेटर के रूप में वापस अपने ही स्कूल पहुँची। जिस स्कूल में मैंने 14 साल पढ़ाई की, आज उसी स्कूल के बच्चों के लिए काम करना मेरे लिए बहुत फक्र की बात थी। लेकिन इस बार जब मैंने स्कूल में कदम रखा, तो वहाँ का नज़ारा देखकर मुझे बहुत खुशी और हैरानी हुई।

इन सालों में स्कूल ने खुद को बहुत बदल लिया था। हमारे टाइम पर जिस डिजिटल पढ़ाई की बस शुरुआत होने वाली थी, आज वो यहाँ की हकीकत बन चुकी है। क्लासरूम्स में प्रोजेक्टर और स्मार्ट बोर्ड लग चुके हैं, जिनसे बच्चों को पढ़ाया जा रहा है। छोटे नर्सरी के बच्चों के लिए तो माहौल एकदम बदल गया है; उन्हें कविताओं पर डांस करवाकर, खेल-खेल में और अच्छी-अच्छी सुविधाओं के साथ पढ़ाया जा रहा है। अब पहले जैसी कड़ाई और सहमा हुआ माहौल नहीं रहा। लड़कियाँ अब आराम से काम के सिलसिले में दूसरी बिल्डिंग की तरफ भी आ-जा सकती हैं। लेडीज और जेंट्स टीचर्स भी आपस में आराम से बात कर लेते हैं और अब पुरुष टीचर्स भी लड़कियों को पढ़ा रहे हैं।

आज जब मैं अपने स्कूल के उन्हीं गलियारों में टहलती हूँ, तो मुझे पुरानी यादों के साथ-साथ एक बहुत अच्छा बदलाव महसूस होता है। स्कूल की उन पुरानी दीवारों और बेंचों से मेरा लगाव आज भी वैसा ही है, लेकिन अब उसमें एक अलग ही खुशी जुड़ गई है, अपने ही स्कूल को ज़माने के साथ आगे बढ़ते और संवरते हुए देखने की खुशी।

Author

  • ज़ैनब फ़ातिमा उत्तर प्रदेश के फैज़ाबाद, अयोध्या की रहने वाली हैं। उन्होंने उर्दू साहित्य में एम.ए. किया है और इसके बाद लगभग दो वर्षों तक शिक्षण कार्य से जुड़ी रही हैं। पढ़ाना और बच्चों के साथ सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में रहना उनके लिए हमेशा एक महत्वपूर्ण अनुभव रहा है। वर्तमान में वे अवध पीपुल्स फोरम के साथ लाइब्रेरी फैसिलिटेटर के रूप में काम कर रही हैं, जहाँ वे तीन इंटर कॉलेजों में लगभग 600 किशोरियों के साथ लाइब्रेरी एजुकेशन प्रोग्राम के ज़रिए जीवन कौशल और किताबों से जुड़ाव पर काम कर रही हैं।

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