भरत भट्ट:
वो गुज़र रही है धीरे से मेरी लाश के ऊपर से
चार क़दम चढ़े है मेरे, कफ़न के ऊपर से।।
एक तो महबूबा मेरी और एक उसका महबूब,
मैं अब ठीक से मर भी नहीं सकता उसके बेवफा होने से।।
मुझे, गुज़रे अभी चार पल भी नहीं हुए
आपने नया – नया कंधा ढूंढ लिया रोने के बहाने से।।
वो तीर जो उस दिन जंगल में छुटा
काश मैं मर गया होता उसी निशाने से।।
अब तो उठाने दो मेरे शरीर को मेरी जां
कांधे पर सर और आंसुओं के बहाने से।।
रूह तो मेरी तुम्हारे पास ही रह गई,
जिस्म को तो जाने दो जल जाने को।।
अब तुम रोना बंद करो, कंधा छोड़ो, गले मिलो
कब तक दूर रहोगी मेरे जाने के बहाने से।।
एक तो महबूबा मेरी, एक उसका महबूब
मैं अब ठीक से मर भी नहीं सकता उसके
बेवफा हो जाने से !!

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