जीनित सामाद:

भारत का ग्रामीण समाज लंबे समय से आजीविका, पलायन और असुरक्षा के त्रिकोण में फंसा रहा है। ऐसे समय में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA), 2005 ने एक ऐतिहासिक हस्तक्षेप करते हुए ग्रामीण परिवारों को न केवल रोजगार दिया, बल्कि उन्हें एक कानूनी अधिकार भी प्रदान किया।

लेकिन आज, जब भारत में ग्रामीण रोजगार की तस्वीर बदलने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने मनरेगा को निरस्त कर “विकसित भारत, रोज़गार और आजीविका के लिए गारंटी मिशन- (ग्रामीण)” यानि VB-G RAM-G Act 2025 लागू किया है तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है, क्या इस कानून में नाम परिवर्तन के साथ ग्रामीण रोजगार की पूरी व्यवस्था में भी एक बड़ा नीतिगत बदलाव किया जा रहा है? और यदि हाँ, तो इसका प्रभाव किन पर सबसे अधिक पड़ेगा?

जब हम महात्मा गांधी के नाम हटाए जाने पर विचार करते हैं तो यह केवल राजनीति का विषय नहीं रह जाता बल्कि यह भारतीय ग्रामीण दर्शन, संवैधानिक मूल्यों और इतिहास से जुड़ा मुद्दा बन जाता है। महात्मा गांधी ने कहा था “भारत की आत्मा गाँव में बसती है”। मनरेगा के साथ उनका नाम जोड़ना इस बात का प्रतीक था कि यह कानून समाज के अंतिम व्यक्ति (Antyodaya) के उत्थान के लिए है। नाम हटाना कहीं न कहीं उस ‘गांधीवादी ग्रामीण स्वावलंबन’ की विचारधारा से दूरी को दर्शाता है। सरकार का तर्क हो सकता है कि वे योजना को एक नई ऊर्जा और “लक्ष्य आधारित” (Mission Mode) देना चाहते हैं, जो 2047 के “विकसित भारत” के लक्ष्य से मेल खाता हो। पर गांधी जी ने “श्रम की गरिमा” (Dignity of Labour) पर जोर दिया था। अब चाहे नाम “महात्मा गांधी” के नाम पर हो या “विकसित भारत” के, श्रमिक की प्राथमिकता उसका समय पर भुगतान और काम का अधिकार है। यदि नाम बदलने से श्रमिक के अधिकार कम होते हैं, तो यह लोकतंत्र के लिए सही नहीं है। इसलिए हमें यह देखना समझना जरूरी है कि सरकार आखिर यह कानून को बदलने के पीछे क्या तर्क रखती है। केंद्र सरकार का कहना है कि 2011-12 के वित्तिय वर्ष में निर्धनता का स्तर 27.1 प्रतिशत था जो 2022-23 के वित्तीय वर्ष तक में निर्धनता का स्तर घटकर 5.3 प्रतिशत हो गया है। इसलिए सरकार का नज़रिया है कि यह कानून केवल गरीबी उन्मूलन न होकर “मज़दूरी से उद्यमिता” (from wage to wealth) की ओर बढ़े। इसलिए इस नए कानून के जरिए निम्न चार मुख्य विषयों पर काम करने की योजना रखी गई है:-

  • जल संबंधी कार्यों के माध्यम से जल सुरक्षा
  • मुख्य ग्रामीण अवसंरचना
  • आजीविका से संबंधित बुनियादी ढाँचा
  • जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने के लिए विशेष कार्य ।

इसलिए केंद्र सरकार के द्वारा VB-G RAM-G को एक लक्ष्य आधारित योजना के रूप में पेश किया गया है। जिसमें:-

  • रोज़गार की अवधि: मनरेगा में एक वित्तीय वर्ष के 365 दिनों में 100 दिनों की गारंटी थी, जबकि नए कानून में इसे बढ़ाकर 125 दिन कर दिया गया है पर यह सिर्फ एक वित्तीय वर्ष के 305 दिनों में ही मिलेगा क्योंकि इस कानून में कृषि सत्र के लिए 60 दिनों का काम न मिलने का प्रतिबंध का प्रस्ताव है।
  • वित्तीय आवंटन (फंडिंग) का ढाँचा: मनरेगा में केंद्र सरकार अकुशल श्रम और प्रशासनिक कार्य की 100 प्रतिशत एवं सामग्री संबंधित 75 प्रतिशत लागत वहन करती थी। वहीं राज्य सरकारों को सिर्फ सामग्री संबंधित 25 प्रतिशत लागत को वहन करना होता था। इससे केंद्र और राज्य के बीच के फंडिंग को 90:10 का अनुपात होता है पर नए कानून में केंद्र 60% और राज्यों को 40% की लागत देनी होगी जो कि केंद्र और राज्य के बीच अब 60:40 का अनुपात तय किया गया है। इसी तरह से वित्तीय आवंटन में केंद्र शासित प्रदेशों में 100% केंद्र सरकार का योगदान होगा और उत्तर पूर्वांचल के पहाड़ी क्षेत्रों के लिए 90% केंद्र सरकार और 10% राज्य सरकारों को वित्तिय व्यवस्था का दायित्व लेना होगा।
  • योजना का स्वरूप: मनरेगा माँग आधारित (Demand Driven) था जबकि नया कानून काफी हद तक केंद्र द्वारा नियंत्रित (Supply Driven) है। इस नए योजना को विकसित ग्राम पंचायत योजना जिसे “पी एम गति शक्ति” योजना से जोड़ा जाएगा।
  • डिजिटल अनिवार्यता: (GPS mapping, Geo tagging, AI और बायोमैट्रिक पहचान व्यवस्था माध्यम से निगरानी)

इस नए बदलाव के द्वारा श्रमिक अधिकारों पर प्रभाव:-

सकारात्मक प्रभाव:

  • बढ़ा हुआ रोजगार : 125 दिनों की गारंटी से वार्षिक आय में वृद्धि की संभावना है।
  • शीघ्र भुगतान : कानून में एक सप्ताह के भीतर मज़दूरी भुगतान और देरी होने पर ब्याज का प्रावधान है । जो मनरेगा कानून में भी थी कि मज़दूरी भुगतान में 15 दिनों से ज़्यादा विलंब होने पर दैनिक 0.05% की ब्याज दी जाएगी पर आज तक कभी भी कार्यान्वयन नहीं किया गया।
  • टिकाऊ संपति : इसका उद्देश्य केवल गड्ढे खोदना नहीं, बल्कि जलवायु अनुकूल और टिकाऊ ग्रामीण बुनियादी ढांचे का निर्माण करना है।

नकारात्मक प्रभाव और अधिकारों का हनन:

  • राज्यों पर बोझ: 40% खर्च राज्यों को उठाना होगा जिससे ओड़िशा जैसे पिछड़ा गरीब राज्यों पर वित्तीय दबाव बढ़ेगा और काम की उपलब्धता कम हो सकती है।
  • केंद्रीकरण: धारा 4(5) के तहत केंद्र सरकार तय करेगी कि किस राज्य को कितना काम मिलेगा। जिससे पंचायतों की स्वायत्तता कम हो सकती है।
  • तकनीकी बाधाएँ: अनिवार्य बायोमेट्रिक और आधार- आधारित भुगतान उन श्रमिकों के लिए बाधा बन सकती है जिनकी उँगलियों के निशान घिस चुके हैं या जो डिजिटल रूप से साक्षर नहीं है।
  • ओड़िशा के संदर्भ में प्रभाव: ओड़िशा जैसे राज्यों में जहाँ एक बड़ी आबादी कृषि और असंगठित श्रम पर निर्भर है, कानून के गहरे प्रभाव होंगे । धारा 6 के तहत बुआई और कटाई के समय (लगभग 60 दिन) काम बंद रखा जा सकता है। यह छोटे किसानों के लिए अच्छा हो सकता है लेकिन उन भूमिहीन श्रमिकों के लिए मुश्किल खड़ी करेगा जिनके पास उस दौरान कोई वैकल्पिक काम नहीं है । इसके साथ दादन/प्रवासन (migration) बढ़ेगी यदि ओड़िशा सरकार 40% फंड की व्यवस्था नहीं कर पाती है। कानूनी दृष्टिकोण से देखें तो खेती के समय काम न देने का प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 21(आजीविका का अधिकार) का उल्लंघन प्रतीत होता है। यह मज़दूर को बाजार की ताकतों और बड़े भूस्वामियों के रहमों-करम पर छोड़ सकता है।

इसलिए यह नए कानून विशेष रूप से ओडिशा के संदर्भ में अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।

मनरेगा (MGNREGA) केवल एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि ग्रामीण गरीबों के लिए एक “अधिकार का दस्तावेज” है। इसने पहली बार यह सुनिश्चित किया कि काम मांगना भी एक अधिकार है और सरकार की ज़िम्मेदारी है कि वह उसे उपलब्ध कराए। ओड़िशा राज्य के कई जिलों में, जहाँ सूखा, सीमित कृषि और रोज़गार के अवसरों की कमी आम बात है, मनरेगा ने हजारों परिवारों को पलायन से बचाया है। यह केवल मज़दूरी का साधन नहीं रहा, बल्कि ग्रामीण समाज में आत्मसम्मान और स्थिरता का आधार बना।

जब की VB-G RAM-G एक व्यापक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है, जिसमें रोज़गार के साथ-साथ कौशल विकास, स्वरोजगार, महिला स्वयं सहायता समूहों की भागीदारी और ग्रामीण उद्यमिता को बढ़ावा देने की बात की जाती है। पहली नज़र में यह मॉडल आधुनिक और संभावनाओं से भरा हुआ प्रतीत होता है। लेकिन इसका मूल अंतर यह है कि इसमें रोज़गार एक “अधिकार” नहीं, बल्कि एक “अवसर” बन जाता है। यही परिवर्तन इस पूरे विमर्श का सबसे संवेदनशील पहलू है।

अधिकार से अवसर तक: बदलाव का अर्थ मनरेगा ने जहाँ रोजगार को कानूनी गारंटी के रूप में स्थापित किया, वहीं नया मॉडल इसे योजनाओं और लक्ष्यों के दायरे में लाता है। इसका अर्थ यह है कि अब रोज़गार माँगने का अधिकार कमजोर हो सकता है और उसकी जगह चयनात्मक अवसर ले सकते हैं।

इस बदलाव के दूरगामी परिणाम हो सकते हैं:

  • जो लोग पहले से ही हाशिए पर हैं, वे और पीछे छूट सकते हैं
  • ग्रामसभा की भूमिका, जो अब तक निर्णय का केंद्र थी, सीमित हो सकती है
  • पारदर्शिता के पारंपरिक तंत्र कमजोर पड़ सकते हैं

ओड़िशा राज्य के कई जिला ऐसे हैं जो केवल प्रशासनिक जिले नहीं हैं, बल्कि वे ऐसे सामाजिक भूगोल का प्रतिनिधित्व करते हैं जहाँ आजीविका अभी भी प्रकृति, श्रम और सामुदायिक संरचनाओं पर निर्भर है।

इन क्षेत्रों में मनरेगा ने:

  • कठिन समय में न्यूनतम आय सुनिश्चित की
  • पलायन को कम किया
  • महिलाओं को कार्यक्षेत्र में लाया

यदि यह सुरक्षा कवच कमजोर होता है, तो इसका सीधा असर राज्य की सामाजिक-आर्थिक स्थिरता पर पड़ेगा।

वहीं इस नए कानून से महिला श्रमिकों को सशक्तिकरण के बजाय असुरक्षा की ओर ले जाने की संभावना है । मनरेगा ने ग्रामीण महिलाओं के जीवन में एक महत्वपूर्ण बदलाव लाया। वे न केवल श्रमिक बनीं, बल्कि परिवार की आर्थिक निर्णय प्रक्रिया में भी भागीदार बनीं।

लेकिन नए मॉडल में यह खतरा उभरता है कि:

  • स्थानीय स्तर पर उपलब्ध मज़दूरी कार्य कम हो सकते हैं
  • कौशल आधारित कार्यक्रमों में महिलाओं की भागीदारी सीमित रह सकती है
  • घरेलू जिम्मेदारियाँ उन्हें इन अवसरों से दूर कर सकती हैं

इस प्रकार, जो महिलाएँ अब तक सशक्त हो रही थीं, वे पुनः असुरक्षा की स्थिति में जा सकती हैं।

वहीं आदिवासी क्षेत्र की स्वशासन पर भी प्रश्न उठना स्वाभाविक है क्योंकि ओड़िशा राज्य के कुल 30 जिलों में से 6 जिला सम्पूर्ण 5वीं अनुसूचीत क्षेत्र हैं और 7 जिला के कुछ क्षेत्र 5वीं अनुसूचित क्षेत्र हैं। ओड़िशा की 22.8% आबादी जनजातीय है और 13 विशेष रूप से आर्थिक स्तर से कमजोर जनजातीय (PVTGs) हैं। ऐसे में जब हम VB-G RAM-G 2025 जैसे केंद्रीय कानून को पांचवीं अनुसूची (5th Schedule) और PESA (पंचायत उपबंध- अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम 1996 वाले क्षेत्रों में लागू करते हैं तो कई कानूनी और प्रशासनिक टकराव की संभावना बढ़ जाती है। जैसे:- 

  1. ग्राम सभा की स्वायत्तता का हनन (Dilution of Gramsabha Powers):-
  • PESA का प्रावधान: PESA कानून के अनुसार जनजातीय क्षेत्रों में किसी भी योजना या परियोजना की मंजूरी और लाभार्थियों का चयन करने का अंतिम अधिकार “ग्रामसभा” के पास है ।
  • VB-G RAM-G की समस्या: यदि नया कानून “कमांड आधारित” (Top Down) होता है जहाँ लक्ष्यों का निर्धारण जिला या राज्य स्तर से होगा, तो यह ग्राम सभा की निर्णय लेने की शक्ति को खत्म कर देगा। यह सीधे तौर पर PESA की भावना के खिलाफ है ।
  1. प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार का टकराव:-
  • पांचवीं अनुसूची और PESA: ये कानून आदिवासियों को जल, जंगल और जमीन के प्रबंधन का अधिकार देते हैं।
  • समस्या: नए कानून के तहत यदि सरकार “स्थायी संपत्ति” (Permanent Assets) बनाने के नाम पर जनजातीय क्षेत्रों में ऐसे निर्माण करती है जिससे वहाँ के प्राकृतिक ढांचे में बदलाव आए (जैसे बड़े चैक डैम या सड़कों का जाल) और इसमें ग्राम सभा की सहमति न ली जाए तो यह संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन होगा ।
  1. खेती सीजन प्रतिबंध और जनजातीय संस्कृति:-
  • समस्या: जनजातीय क्षेत्रों में खेती केवल (व्यवसाय नहीं बल्कि जीवन जीने का तरीका है। यहाँ “साझा श्रम” (Community Labour) की परम्परा है ।
  • टकराव: नए कानून में फसल के समय काम पर जो 60 दिनों का प्रतिबंध है, वह उन आदिवासियों के लिए संकट पैदा करेगा जिनके पास अपनी ज़मीन कम है और जो वनोपज (forest produce) या छोटे श्रम पर निर्भर हैं। यहाँ के छोटे किसान अक्सर अपनी खेती के साथ-साथ मनरेगा में भी काम करते हैं। सरकार का यह हस्तक्षेप उनके पारंपरिक जीवन चक्र में बाहरी दखल माना जाएगा और उनकी नकद आय (Cash flow) प्रभावित होगी।
  1. वन अधिकार अधिनियम (FRA) के साथ ताल मेल का अभाव:-
  • समस्या: ओड़िशा के लाखों आदिवासियों को वनाधिकार (Individual & Community Forest Rights) मिले हैं। मनरेगा का उपयोग इन जमीनों को उपजाऊ बनाने में होता था।
  • आशंका: यदि नए कानून में वन क्षेत्रों के लिए विशेष प्रावधान नहीं किए गए, तो ओड़िशा जैसे राज्य में FRA के तहत मिली ज़मीन का विकास रुक सकता है, क्योंकि नए कानून का ढांचा मुख्य रूप से ‘ इन्फ्रास्ट्रक्चर’ (सड़क, भवन) पर अधिक केंद्रित है ।
  1. डिजिटल अनिवार्यता और “PESA” क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति:-
  • समस्या: 5वीं अनुसूची वाले क्षेत्र अक्सर ऊबड़- खाबड़ और कम कनेक्टिविटी वाले होते हैं।
  • प्रभाव: अनिवार्य डिजिटल हाजिरी, “आधार-आधारित भुगतान” (ABPS) और ई- केवाईसी इन क्षेत्रों के लोगों को कानूनी तौर पर ‘अदृश्य ‘ कर देगी और ऐसी प्रक्रियाओं को इन लोगों पर थोपना सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित “पहुंच योग्य न्याय” (Access to Justice) के सिद्धांतों के विरुद्ध है । PESA क्षेत्र के लोग अपनी शिकायत लेकर ब्लॉक मुख्यालय तक नहीं पहुंच पाते, ऐसे में ऐप आधारित समाधान उनके लिए सजा बन सकते हैं और  लाखों मज़दूरी काम के हक़ से वंचित हो सकते हैं। इसे ‘तकनीकी निष्कासन’ कहा जा सकता है ।

विकास के नाम पर “समानता” का चश्मा पहनकर जनजातीय क्षेत्रों की “विशिष्टता” को खत्म नहीं किया जा सकता। VB-G RAM-G को PESA के साथ तालमेल बिठाना ही होगा, अन्यथा यह कानून केवल कागजों पर सफल दिखेगा, जबकि ज़मीन पर यह संघर्ष को जन्म देगा ।

इसलिए इस बदलते परिदृश्य में हम सब की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। हमें केवल योजनाओं के क्रियान्वयन तक सीमित नहीं रहना, बल्कि अधिकारों की रक्षा और जागरूकता के लिए भी सक्रिय होना होगा। यह स्पष्ट है कि विकास के नए मॉडल आवश्यक हैं, लेकिन वे तभी सार्थक होंगे जब वे मौजूदा अधिकारों को कमजोर न करें। क्योंकि ओड़िशा जैसे राज्य के लिए जहां जल, जंगल और जमीन ही जीवन का आधार है इसलिए इस कानून को मानवीय संवेदनाओं के साथ लागू करने की आवश्यकता है। सरकार को समझना होगा कि “आजीविका” (Livelihood) का महल तभी खड़ा हो सकता है जब “रोज़गार” (Employment) की नींव मजबूत हो।

कुछ महत्वपूर्ण कदम इस दिशा में हो सकते हैं:

  • MGNREGA की कानूनी गारंटी को बनाए रखना
  • VB-G RAM-G को पूरक के रूप में लागू करना
  • महिला और आदिवासी समुदायों के लिए विशेष प्रावधान
  • ग्रामसभा और सामाजिक अंकेक्षण को सशक्त बनाना

भारत के ग्रामीण भविष्य का निर्माण केवल योजनाओं से नहीं, बल्कि अधिकारों और सहभागिता से होगा। मनरेगा ने जो आधार तैयार किया है, उसे कमजोर करना न केवल आर्थिक बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी जोखिमपूर्ण होगा। आज आवश्यकता है कि हम विकास और अधिकार के बीच किसी एक को चुनने के बजाय दोनों को साथ लेकर चलें, तभी भारत के ग्रामीण क्षेत्र एवं ओड़िशा जैसे राज्य वास्तव में सशक्त और आत्मनिर्भर बन पाएंगे। विकास तभी सार्थक है जब वह केंद्रीकरण (Centralisation) के बजाय ग्राम सभाओं को सशक्त करे। यदि नया कानून श्रमिकों के अधिकारों का संरक्षण करने और उन्हें समय पर मज़दूरी दिलाने में विफल रहता है तो नाम बदलने की यह कवायद केवल एक प्रशासनिक श्रृंगार बन कर रह जाएगी। हमारा साझा उद्देश्य एक ऐसा विकसित भारत होना चाहिए जहां तकनीक सुविधा तो बने लेकिन किसी गरीब के काम मांगने के अधिकार में बाधा न बने। “संघर्ष जारी रहना चाहिए नाम के लिए नहीं, बल्कि काम और सम्मान के लिए।”

Author

  • जिनित / Jinit

    जिनित, ओडिशा के झारसुगड़ा ज़िले से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं। वह लोकमुक्ति संगठन के साथ जुड़कर स्थानीय मुद्दों पर काम कर रहे हैं।

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